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    सूरए निसा; आयतें 60-63 (कार्यक्रम 134)

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    आइये पहले सूरए निसा की 60वीं आयत की तिलावत सुनें।أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يَزْعُمُونَ أَنَّهُمْ آَمَنُوا بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ وَمَا أُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَ يُرِيدُونَ أَنْ يَتَحَاكَمُوا إِلَى الطَّاغُوتِ وَقَدْ أُمِرُوا أَنْ يَكْفُرُوا بِهِ وَيُرِيدُ الشَّيْطَانُ أَنْ يُضِلَّهُمْ ضَلَالًا بَعِيدًا (60)क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो दावा करते हैं कि वे उस चीज़ पर ईमान रखते हैं जो तुम पर और तुमसे पहले वाले पैग़म्बरों पर उतारी गई है? जबकि वे फ़ैसलों को तागूत अर्थात ग़लत शासकों के पास ले जाना चाहते हैं और उन्हें आदेश दिया गया है कि वे इसका अनादर करें और यह शैतान ही है जो उन्हें सही मार्ग से पथभ्रष्ट करके बहुत दूर ले जाना चाहता है। (4:60)पिछले कार्यक्रम में सूरए निसा की 59वीं आयत में हमने पढ़ा कि सभी विवादों और मतभेदों के समाधान का स्रोत ईश्वरीय किताब और पैग़म्बर का व्यवहार एवं उनकी परम्परा है। यह आयत उन लोगों की आलोचना करती है जो इन दो महान व पवित्र स्रोतों से संपर्क करने के स्थान पर ग़लत लोगों यहां तक कि सत्य के विरोधी शासकों के पास जाते हैं। पवित्र क़ुरआन इसे गहरी पथभ्रष्ठता बताता है।इस संबंध में इतिहास में वर्णित है कि मदीने में एक यहूदी और एक मुसलमान के बीच कुछ विवाद हो गया। यहूदी ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के न्याय और अमानदारी के कारण उन्हें पंच के रूप में पेश किया जबकि मुसलमान व्यक्ति ने, जो अपने अवैध हितों की पूर्ति चाहता था, एक यहूदी धर्मगुरू को पंच बनाया क्योंकि वह जानता था कि उपहार इत्यादि देकर यहूदी धर्मगुरू को अपने पक्ष में कर सकता है। यह आयत इसी अनुचित व्यवहार की आलोचना में आई।इस आयत से हमने सीखा कि असत्य और असत्यवादियों से दूरी के बिना ईमान, वास्तविक नहीं होता बल्कि वह खोखला ईमान है।जो लोग ईमान का दावा करते हैं किन्तु व्यवहार में ईश्वर नहीं बल्कि दूसरों से संपर्क करते हैं, वे वास्तव में शैतान के साथ मिलकर ईश्वर और पैग़म्बर के विरुद्ध मोर्चाबंदी करते हैं।असत्य पर चलने वालों के शासन की स्वीकारोक्ति समाज में शैतान की गतिविधियों की भूमि समतल कर देती है।आइये अब सूरए निसा 61वीं आयत की तिलावत सुनें।وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا إِلَى مَا أَنْزَلَ اللَّهُ وَإِلَى الرَّسُولِ رَأَيْتَ الْمُنَافِقِينَ يَصُدُّونَ عَنْكَ صُدُودًا (61)और जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज़ की ओर, जो ईश्चर ने उतारी है अर्थात किताब और पैग़म्बर की ओर आओ तो तुम मिथ्याचारियों को देखते हो कि वे लोगों को तुम्हारा निमंत्रण स्वीकार करने से कड़ाई से रोकते हैं। (4:61)यह आयत फ़ैसला कराने के लिए दूसरों से संपर्क को मिथ्या की निशानी बताते हुए कहती है, ये मुनाफिक़ अर्थात मिथ्याचारी हैं जो क़ुरआन और ईश्वरीय परंपरा से कतराते हैं और काफ़िरों के विचार उन्हें भले लगते हैं। वे न केवल यह कि स्वयं ईश्वरीय आदेशों को स्वीकार नहीं करते बल्कि दूसरों को भी ईमान लाने से रोकते हैं ताकि दूसरे भी उन्हीं की भांति कर्म करें और फिर कोई उन्हें रोकने वाला न रहे।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों को ईश्वर की ओर बुलाना हमारा कर्तव्य है चाहे हम जानते हों कि वे स्वीकार नहीं करेंगे और ईश्वरीय आदेश के समक्ष नतमस्तक नहीं होंगे। सत्य और सच्चे नेतृत्व का विरोध मिथ्याचारियों की सबसे स्पष्ट निशानियों में से एक है। आइये अब सूरए निसा की 62वीं और 63वीं आयतों की तिलावत सुनें।فَكَيْفَ إِذَا أَصَابَتْهُمْ مُصِيبَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ ثُمَّ جَاءُوكَ يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ إِنْ أَرَدْنَا إِلَّا إِحْسَانًا وَتَوْفِيقًا (62) أُولَئِكَ الَّذِينَ يَعْلَمُ اللَّهُ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَعِظْهُمْ وَقُلْ لَهُمْ فِي أَنْفُسِهِمْ قَوْلًا بَلِيغًا (63)तो उस समय उनका क्या होगा जब उन पर उनके कर्मों के कारण मुसीबत आयेगी और वे उससे निकलने के लिए तुम्हारे पास आकर ईश्वर की सौगन्ध खायेंगे कि असत्यवादी पंचों से संपर्क करने का हमारा लक्ष्य केवल दोनों पक्षों के बीच एकता उत्पन्न करना और उनके साथ भलाई करना था। (4:62) यही वे लोग हैं जिनके मन की भी बात ईश्वर जानता है तो हे पैग़म्बर! तुम उन्हें दंडित न करो, हां उन्हें उपदेश देते रहो और उनसे प्रभावी तथा दिल में बैठ जाने वाली बातें करो। (4:63)पिछली आयतों में मिथ्याचारियों के बुरे व्यवहार की आलोचना के पश्चात ईश्वर इन आयतों में स्वयं मिथ्याचारियों के साथ किये जाने वाले व्यवहार का वर्णन करते हुए कहता है कि उनको किसी भी प्रकार का शारीरिक दंड मत दो और केवल बातों द्वारा उनको उपदेश दो तथा उनके कर्मों के परिणामों की ओर से सचेत करो। उनके दंड को ईश्वर के हवाले कर दो।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के समीप फ़ैसलों के लिए मामले न ले जाने हेतु मिथ्याचारियों का एक बहाना यह था कि यदि हम पैग़म्बर के पास जाते तो वे स्वाभाविक रूप से एक के पक्ष में और दूसरे के विरुद्ध फ़ैसला करते जिसके कारण एक पक्ष पैग़म्बर से अप्रसन्न हो जाता जो कि पैग़म्बरी की शान के विरुद्ध है इसी कारण हम पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के सम्मान, उनकी स्थिति तथा लोकप्रियता की रक्षा के लिए अपने मामले उनके पास नहीं ले जाते।स्पष्ट है कि इस प्रकार के बहाने कर्तव्यों और दायित्वों से बचने के लिए होते हैं और यदि यही तै होता कि पैग़म्बर की लोकप्रियता की रक्षा इस प्रकार से जायेगी तो ईश्वर इस बात से अधिक अवगत है। इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य तथा समाज की अनेक समस्याओं की जड़ स्वयं मनुष्य के कर्म हैं चाहे वह उनका कारण न जाने या स्वयं को अनभिज्ञ प्रकट करे। इसी कारण दुर्घटनाओं और कठिनाइयों को ईश्वर के ज़िम्मे नहीं डालना चाहिये।ग़लत कार्यों का औचित्य दर्शाना मिथ्याचारियों की निशानी है जिस प्रकार से कि मिथ्याचारी पैग़म्बर की स्थिति की रक्षा के बहाने उन्हें कमज़ोर बना रहे थे।सौगन्ध खाना वह पर्दा है जिसे झूठे मिथ्याचारी अपने ग़लत कर्मों और लक्ष्यों पर डालते हैं। पापी और उल्लंघनकर्ता अपने कुकर्मों को भलाई, सुधार और उपकार जैसे पवित्र शब्दों की आड़ में छिपाते हैं ताकि उनके कर्मों पर कोई उन्हें रोक-टोक न सके। मिथ्याचारियों के साथ इस प्रकार व्यवहार करना चाहिये कि उनसे दूरी भी रहे और उन्हें उपदेश भी दिया जाये।