islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए निसा; आयतें 64-68 (कार्यक्रम 135)

    सूरए निसा; आयतें 64-68 (कार्यक्रम 135)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए निसा की 64वीं आयत की तिलावत सुनें।وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ رَسُولٍ إِلَّا لِيُطَاعَ بِإِذْنِ اللَّهِ وَلَوْ أَنَّهُمْ إِذْ ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ جَاءُوكَ فَاسْتَغْفَرُوا اللَّهَ وَاسْتَغْفَرَ لَهُمُ الرَّسُولُ لَوَجَدُوا اللَّهَ تَوَّابًا رَحِيمًا (64)और हमने किसी भी पैग़म्बर को नहीं भेजा सिवाए इस उद्देश्य से कि ईश्वर की अनुमति से उसका अनुसरण किया जाए और यदि वे विरोधी, जब उन्होंने अपने आप पर अत्याचार किया और ईश्वरीय आदेश की अवज्ञा की, तुम्हारे पास आते और ईश्वर से क्षमा याचना करते और पैग़म्बर भी उन्हें क्षमा करने की सिफ़ारिश करते तो नि:संदेह वे ईश्वर को बड़ा तौबा स्वीकार करने वाला और दयावान पाते। (4:64)पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा था कि कुछ मिथ्याचारी मुसलमानों ने अपने सामाजिक विवादों के निवारण के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के बजाए असत्यवादी शासकों से संपर्क किया। यह आयत कहती है कि लोगों का कर्तव्य है कि वे विभिन्न मामलों में पैग़म्बर का अनुसरण करें। पैग़म्बर केवल ईश्वर का संदेश पहुंचाने के लिए नहीं आये हैं बल्कि वे शासन के अधिकारी हैं तथा दूसरों को नहीं बल्कि मुसलमानों को उनका आज्ञापालन करना चाहिये।अलबत्ता पैग़म्बर का आज्ञापालन भी ईश्वर के आदेश से है अन्यथा किसी का भी यहां तक कि पैग़म्बर का भी अनुसरण यदि ईश्वर की अनुमति से न हो तो कुफ्र और अनेकिश्वरवाद है। आगे चलकर आयत कहती है कि पैग़म्बर की अवज्ञा के पाप की तौबा पैग़म्बर से संपर्क है और यह तौबा केवल उसी स्थिति में स्वीकार होगी जब पैग़म्बर उसकी तौबा को स्वीकार कर लें और उसके लिए ईश्वर से क्षमा याचना करें।स्पष्ट है कि यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल से विशेष नहीं है और जिस काल में जो कोई भी ईश्वर और पैग़म्बर का विरोध करे यदि वह पैग़म्बर की क़ब्र की ज़ियारत के लिए जाए और उनसे ईश्वर के समक्ष अपने लिए क्षमा याचना का अनुरोध करे तो पैग़म्बर के माध्यम से उसके पाप की क्षमा स्वीकार होने की भूमि समतल हो जाती है।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों का मार्गदर्शन ईश्वरीय पथप्रदर्शकों के अनुसरण पर निर्भर है। केवल ईमान पर्याप्त नहीं है बल्कि व्यवहार में आज्ञापालन भी आवश्यक है।पैग़म्बरों की शिक्षाओं से दूरी और असत्यवादी शासकों से संपर्क पवित्र व भले लोगों पर नहीं बल्कि अपने आप पर अत्याचार है।ईश्वर के पवित्र बंदों की क़ब्रों की ज़ियारत के लिए यात्रा और ईश्वर के समक्ष क्षमा याचना के लिए उनसे अनुरोध करना क़ुरआन की सिफ़ारिश है।आइये अब सूरए निसा की 65वीं आयत की तिलावत सुनें।فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّى يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُوا فِي أَنْفُسِهِمْ حَرَجًا مِمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا تَسْلِيمًا (65)तुम्हारे पालनहार की सौगन्ध कि वे वास्तविक ईमान तक नहीं पहुंचेगे जब तक कि वे अपने विवादों में केवल तुम्हें पंच न बनायें और फिर हृदय में भी तुम्हारे फ़ैसले से अप्रसन्न न हों और तुम्हारे फ़ैसले के समक्ष पूर्णत: नतमस्तक रहें। (4:65) पिछली आयतों में विवादों के फ़ैसले के लिए पैग़म्बर के पास जाने और दूसरों के पास न जाने की सिफारिश की गई है। यह आयत कहती है कि न केवल यह कि तुम पैग़म्बर से संपर्क करो बल्कि उनके फ़ैसले का पूर्णरूप से आज्ञापालन भी करो और न केवल यह कि ज़बान से कुछ न हो बल्कि हृदय में अप्रसन्नता का आभास न करो क्योंकि संभवत: पैग़म्बर का फ़ैसला तुम्हारे विरुद्ध हो सकता है।इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के दो साथियों में अपने खजूरों के बाग़ों की सिंचाई के मामले पर मतभेद हो गया। वे दोनों पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में आए और उनसे फ़ैसला करने को कहा परंतु जब उन्होंने पैग़म्बर का फ़ैसला सुना तो जिसके विरुद्ध फ़ैसला हुआ था उसने पैग़म्बर पर आरोप लगाया कि चूंकि दूसरा पक्ष उनका रिश्तेदार था इसलिए उन्होंने उसके हित में फ़ैसला दिया है। पैग़म्बरे इस्लाम इस बात से अत्यंत अप्रसन्न हुए और उनके चेहरे का रंग बदल गया। इसी अवसर पर यह आयत उतरी और उसने मुसलमानों को चेतावनी दी। इस आयत से हमने सीखा कि ईमान, नतमस्तक हुए बिना नहीं प्राप्त होता। सच्चा मोमिन वह है जो ईश्वर और पैग़म्बर के आदेशों का पालन भी करता है और उनके आदेशों से अप्रसन्नता का आभास भी नहीं करता तथा दिल से भी उनके आदेशों को स्वीकार करता है।लोगों के बीच फ़ैसला करना, पैग़म्बरों और ईश्वरीय मार्गदर्शकों की एक विशेषता रही है। धर्म केवल कुछ शुष्क उपासनाओं के कुछ आदेशों का नाम नहीं है बल्कि लोगों की सामाजिक समस्याओं का निवारण भी धार्मिक नेताओं के कर्तव्यों में से एक है।आइये अब सूरए निसा की 66वीं 67वीं और 68वीं आयतों की तिलावत सुनें।وَلَوْ أَنَّا كَتَبْنَا عَلَيْهِمْ أَنِ اقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ أَوِ اخْرُجُوا مِنْ دِيَارِكُمْ مَا فَعَلُوهُ إِلَّا قَلِيلٌ مِنْهُمْ وَلَوْ أَنَّهُمْ فَعَلُوا مَا يُوعَظُونَ بِهِ لَكَانَ خَيْرًا لَهُمْ وَأَشَدَّ تَثْبِيتًا (66) وَإِذًا لَآَتَيْنَاهُمْ مِنْ لَدُنَّا أَجْرًا عَظِيمًا (67) وَلَهَدَيْنَاهُمْ صِرَاطًا مُسْتَقِيمًا (68)और यदि हम इन मिथ्याचारियों को यह आदेश देते कि वे अपनी हत्या कर लें या अपने घरों को छोड़कर निकल जायें तो कुछ लोगों के अतिरिक्त कोई भी आज्ञापालन न करता जबकि इन्हें जो उपदेश दिया गया है उसका पालन करते तो उन्हीं के हित में अच्छा होता और इनका ईमान अधिक सुदृढ़ होता। (4:66) और हम अपनी ओर से बड़ा बदला भी देते। (4:67) और सीधे रास्ते की ओर इनका मार्गदर्शन भी कर देते। (4:68)पिछली आयतों को पूर्ण करते हुए ये आयतें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के न्यायपूर्ण फ़ैसलों से अप्रसन्न होने वालों से कहती हैं हमने तुम पर कोई कड़ा और जटिल दायित्व नहीं डाला है कि तुम इस प्रकार का आभास कर रहे हो। हमने पिछले समुदायों और जातियों को जैसे यहूदी जाति को जब उन्होंने गाए के बछड़े की उपासना आरंभ कर दी थी उनके पापों के प्रायश्चित के लिए एक दूसरे की हत्या और अपनी धरती से बाहर निकल जाने का आदेश दिया था। निश्चित रूप से यदि इस प्रकार का आदेश तुम्हें दिया जाता तो केवल कुछ ही लोग उसका पालन करते।आगे चलकर आयत मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है यदि तुम ईश्वरीय आदेशों को मानो तो यह स्वयं तुम्हारे लिए बेहतर है सही रास्ते पर तुम्हारा मार्गदर्शन भी होगा तथा तुम्हारा ईमान दृढ़ हो जायेगा और प्रलय में भी तुम्हें ईश्वर की ओर से बड़ा बदला मिलेगा। इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान के दावेदार तो बहुत हैं पंरतु ईश्वरीय परीक्षाओं में सफल होने वाले बहुत कम हैं। ईश्वरीय आदेश ऐसे उपदेश हैं जिनका लाभ स्वयं हमें मिलता है। इससे ईश्वर को कोई लाभ नहीं है। ईश्वर के मार्ग में जितना आगे बढ़ते जायेंगे उतना ही हमारा ईमान बढ़ता और सुदृढ़ होता जायेगा।