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    सूरए निसा; आयतें 69-73 (कार्यक्रम 136)

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    आइये पहले सूरए निसा की 69वीं और 70वीं आयतों की तिलावत सुनें।وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَالرَّسُولَ فَأُولَئِكَ مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مِنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ وَحَسُنَ أُولَئِكَ رَفِيقًا (69) ذَلِكَ الْفَضْلُ مِنَ اللَّهِ وَكَفَى بِاللَّهِ عَلِيمًا (70)जो लोग ईश्वर और पैग़म्बर का अनुसरण करें तो वे उन लोगों के साथ रहेंगे जिन्हें ईश्वर ने अपनी विभूतियां दी हैं जैसे; पैग़म्बर, सच बोलने वाले, शहीद और भलाई करने वाले और ये लोग कितने अच्छे साथी हैं। (4:69) ये सब कृपायें ईश्वर की ओर से हैं और बंदों के भले कामों को जानने के लिए ईश्वर काफ़ी है। (4:70)पिछली आयतों में हमें पता चला कि जो लोग ईश्वरीय आदेशों का पालन करते हैं उन्हें इसी संसार में अपने कर्मों का फल दिया जाता है और ईश्वर सदैव उन्हें अपने विशेष मार्गदर्शन की छाया में रखता है। इन आयतों में ईश्वर कहता है कि ऐसे लोग प्रलय में भी पैग़म्बर और पवित्र लोगों के साथ रहेंगे और वहां भी उनके अस्तित्व से लाभान्वित होते रहेंगे।सूरए हम्द में, जिसे हर नमाज़ में पढ़ा जाता है, हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें सीधे मार्ग पर बाक़ी रखे, उन लोगों के मार्ग पर जिन्हें उसने अपनी विशेष अनुकम्पायें प्रदान की हैं। सूरए निसा की इस आयत में हम पैग़म्बरों, सच्चे, शहीद और पवित्र लोगों के सबसे अच्छे प्रतीकों को पहचानते हैं। तो हम हर नमाज़ में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वो हमें स्वर्ग में ऐसे ही लोगों के साथ रखे।इन आयतों से हमने सीखा कि लोक-परलोक में अच्छे मित्र और साथी प्राप्त करने का मार्ग ईश्वर व पैग़म्बर के आदेशों का पालन है।मित्र के चयन में ईमान और पवित्रता मूल शर्त है।इस बात पर ईमान कि ईश्वर हमारे समस्त कर्मों से अवगत है, भले कर्म करने के लिए सबसे अच्छा प्रोत्साहन है।आइये अब सूरए निसा की 71वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا خُذُوا حِذْرَكُمْ فَانْفِرُوا ثُبَاتٍ أَوِ انْفِرُوا جَمِيعًا (71)हे ईमान वालो! अपने शस्त्र ले लो और पूर्ण रूप से सचेत व तैयार रहो, फिर बंटे हुए गुटों में या एक साथ मिलकर शत्रु की ओर बढ़ो। (4:71)चूंकि इस्लाम जीवन का धर्म है और जीवन के विभिन्न व्यक्तिगत व सामाजिक पहलू होते हैं इसी लिए क़ुरआन मजीद के आदेश, उपासना और व्यक्तिगत कर्तव्यों के अतिरिक्त समाज के विभिन्न मामलों पर आधारित हैं। हर समाज के महत्वपूर्ण मामलों में से एक आंतरिक और बाहरी शत्रु से निपटने की पद्धति है। क़ुरआन मजीद ने अनेक आयतों में ईमान वालों को इस्लामी क्षेत्रों, धर्म और इस्लामी मान्यताओं का निमंत्रण दिया है और इस मार्ग में हर प्रकार की हानि और ख़तरे को अत्यंत मूल्यवान बताया है।जैसा कि पिछली आयतों में क़ुरआने मजीद ने शहीदों का स्थान पैग़म्बरों के समान बताया था जहां पहुंचने की कामना हर ईमान वाले के हृदय में होती है। इस आयत में भी ईमान वालों से कहा गया है कि अपनी सैनिक क्षमता में वृद्धि करें ताकि उनमें शत्रु के हर प्रकार के आक्रमण का मुक़ाबला करने की तैयारी रहे। इस आयत में प्रयोग होने वाले शब्द हिज़्र का अर्थ है रक्षा का साधन। अर्थात तुम्हें दूसरों पर आक्रमण नहीं करना चाहिये पंरतु यदि दूसरों ने तुम पर आक्रमण किया तो तुममें अपनी प्रतिरक्षा की तैयारी होनी चाहिये ताकि तुम्हारा सम्मान और तुम्हारी सत्ता सुरक्षित रहे।इस आयत से हमने सीखा कि मुसलमानों को शत्रु की सैनिक योजनाओं, पद्धतियों तथा संभावनाओं से अवगत रहना चाहिये ताकि वे उन्हीं के अनुसार अपनी प्रतिरक्षा के साधन तैयार कर सकें और मुक़ाबले के लिए तैयार रहें।इस्लामी समाज के किसी विशेष गुट को नहीं बल्कि सभी को सैनिक प्रशिक्षण लेना चाहिये ताकि शत्रु के आक्रमण के समय सभी एकजुट होकर अपने देश और धर्म की रक्षा कर सकें।आइये अब सूरए निसा की 72वीं और 73 वीं आयतों की तिलावत सुनें।وَإِنَّ مِنْكُمْ لَمَنْ لَيُبَطِّئَنَّ فَإِنْ أَصَابَتْكُمْ مُصِيبَةٌ قَالَ قَدْ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيَّ إِذْ لَمْ أَكُنْ مَعَهُمْ شَهِيدًا (72) وَلَئِنْ أَصَابَكُمْ فَضْلٌ مِنَ اللَّهِ لَيَقُولَنَّ كَأَنْ لَمْ تَكُنْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُ مَوَدَّةٌ يَا لَيْتَنِي كُنْتُ مَعَهُمْ فَأَفُوزَ فَوْزًا عَظِيمًا (73)निसंदेह तुम्हारे बीच लोगों का ऐसा गुट भी है जो स्वयं भी सुस्त है और दूसरों को भी सुस्ती पर उकसाता है। तो जब युद्ध में तुम पर कोई संकट आता है तो वह कहता है कि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की जो मैं उनके साथ उपस्थित नहीं था (4:72) और जब ईश्वर की ओर से तुम्हें कोई कृपा प्राप्त हो जाती है और तुम विजयी हो जाते हो तो कहता है, काश मैं भी उनके साथ होता ताकि मुझे भी महान कल्याण प्राप्त हो जाता। वह इस प्रकार से कहता है मानो तुम्हारे और उनके बीच कोई प्रेम और संबंध था ही नहीं और तुम्हारी विजय उनकी विजय नहीं है। (4:73)पिछली आयत में बाहरी शत्रु के मुक़ाबले में मुसलमानों की तैयारी की ओर संकेत किया गया था। ये आयतें मिथ्याचारियों और आंतरिक शत्रुओं की ओर से सचेत करती हैं। अवसर वादी लोग, जो केवल अपने हितों को दृष्टिगत रखते हैं न केवल यह कि धर्म के मार्ग में कठिनाइयां झेलने के लिए तैयार नहीं होते बल्कि दूसरों को भी इस प्रकार के कार्यों से रोकने का प्रयास करते हैं ताकि वे स्वयं बदनाम न हों। ये आयतें ऐसे लोगों की निशानी इस प्रकार बताती हैं कि जब इस्लामी समाज पर संकट और कठिनाइयां पड़ती हैं तो वे स्वयं को अलग कर लेते हैं और अपनी जान बच जाने पर ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करते हैं तथा आराम और विजय के समय स्वयं के वंचित रह जाने के कारण खेद प्रकट करते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि युद्ध और जेहाद का मैदान ईमान वालों तथा मिथ्याचारियों की पहचान व परीक्षा का सबसे अच्छा स्थान है।रणक्षेत्र तथा मोर्चों पर मिथ्याचारियों की उपस्थिति, लड़ने वालों की भावनाएं कमज़ोर पड़ने का कारण हैं। अत:ऐसे लोगों को पहचानना चाहिये और उन्हें मोर्चे पर नहीं भेजना चाहिये।युद्ध और इस्लामी समाज की कठिनाइयों के मैदान से भागना मिथ्या की निशानी है। ऐसे आराम का मूल्य है जो समाज के अन्य लोगों के आराम के साथ हो, न यह कि दूसरे कठिनाई में रहें और हम आराम से।मिथ्याचारियों की दृष्टि में मोक्ष और कल्याण सांसारिक और भौतिक ऐश्वर्य की प्राप्ति है हमें ऐसा नहीं होना चाहिये।जो व्यक्ति ईमान वालों के दुख में भाग नहीं लेता परंतु उनके लाभों में शामिल होना चाहता है वह मिथ्याचारी प्रवृत्ति का है।