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    सूरए निसा; आयतें 7-10 (कार्यक्रम 120)

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    आइये पहले सूरए निसा की 7वीं आयत की तिलावत सुनें।لِلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ مِمَّا قَلَّ مِنْهُ أَوْ كَثُرَ نَصِيبًا مَفْرُوضًا (7)माता-पिता और निकट परिजन मृत्यु के पश्चात जो माल छोड़ जाते हैं उसमें पुरुषों का भाग है और महिलाओं के लिए (भी) उस माल में भाग है जो माता-पिता या निकट परिजन मृत्यु के पश्चात छोड़ जाते हैं चाहे कम हो या अधिक। यह भाग ईश्वर की ओर से निर्धारित किया गया है। (4:7)हमने पिछले कार्यक्रमों में कहा था कि सूरए निसा परिवार के विभिन्न मामलों के बारे में है जिनमें से एक बेसहारा और अनाथ बच्चों का मामला है। इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के एक साथी का निधन हो गया और यद्यपि उनकी पत्नी और बच्चे भी थे परन्तु उनके भतीजों ने सारा माल आपस में बांट लिया और उनकी पत्नी व बच्चों को कुछ न दिया क्योंकि इस्लाम से पूर्व अरबों में नियम था कि केवल युद्ध करने वाले पुरुष ही किसी के उत्तराधिकारी हो सकते हैं न कि महिलाएं और बच्चे। उस समय ईश्वर की ओर से यह आयत उतरी और उसमें महिला अधिकारों की रक्षा में कहा गया कि जिस प्रकार विरासत में पुरुषों का भाग है उसी प्रकार महिलाओं का भी भाग है, चाहे विरासत में छोड़ी गई सम्पत्ति कम हो या अधिक, हर का भाग ईश्वर की ओर से निर्धारित है।इस आयत से हमने सीखा की इस्लाम केवल नमाज़-रोज़े का धर्म नहीं है बल्कि वह सांसारिक जीवन को भी महत्व देता है और इसी कारण वह आर्थिक मामलों, महिलाओं तथा अनाथों के अधिकारों की रक्षा को ईमान की शर्त समझता है।मीरास या विरासत को ईश्वरीय आदेशों के अनुसार बांटना चाहिये न कि सामाजिक प्रथाओं व चलन के आधार पर और न ही मरने वाले की वसीयत व इच्छा के आधार पर।मीरास की मात्रा की उसके बांटने में कोई भूमिका नहीं है। महत्वपूर्ण बात उत्तराधिकारियों के अधिकारों की रक्षा और न्याय का पालन है। मीरास के कम होने के कारण उत्तराधिकारियों के अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिये।आइये अब सूरए निसा की आठवीं आयत की तिलावत सुनें।وَإِذَا حَضَرَ الْقِسْمَةَ أُولُو الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينُ فَارْزُقُوهُمْ مِنْهُ وَقُولُوا لَهُمْ قَوْلًا مَعْرُوفًا (8)और यदि मीरास बांटते समय ऐसे नातेदार जिनका मीरास में कोई अधिकार न हो और अनाथ व दरिद्र उपस्थित हो जायें तो उस मीरास से उन्हें भी लाभान्वित करो और उनके साथ अच्छाई से बात करो। (4:8)चूंकि पारिवारिक संबंधों और रिश्तेदारी को सुदृढ़ बनाने और उनकी रक्षा के लिए प्रेमपूर्ण व्यवहार आवश्यक है। अत: पिछली आयत में मीरास के एक क़ानून के उल्लेख के पश्चात ईश्वर इस आयत में दो शिष्टाचारिक आदेशों का वर्णन करते हुए कहता है।प्रथम तो यह कि मीरास बांटते समय उपस्थित होने वाले नातेदारों विशेषकर अनाथों और दरिद्रों को, जिनका मीरास में कोई भाग नहीं है, उत्तराधिकारियों की सहमति से कुछ न कुछ देना चाहिये ताकि मीरास से वंचित रहने से उनमें ईर्ष्या की भावना उत्पन्न न हो बल्कि पारिवारिक संबंध मज़बूत हों।दूसरे यह कि उनके साथ प्रेमपूर्वक और अच्छे ढंग से बात करनी चाहिये ताकि उन्हें यह आभास न होने पाये कि दरिद्रता और वंचितता के कारण रिश्तेदार उनकी उपेक्षा कर रहे हैं।इस आयत से हमने सीखा कि वंचित की स्वाभाविक आशाओं और अपेक्षाओं का ध्यान रखना चाहिये और अनिवार्य मात्रा के अतिरिक्त भी विभिन्न बहानों से उनकी सहायता करनी चाहिये।उपहार देकर और प्रेमपूर्वक व्यवहार द्वारा पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ बनाना चाहिये। भौतिक उपकारों और प्रेमपूर्ण आध्यात्मिक संबंधों द्वारा परिवार में ईर्ष्या व द्वेष को रोका जा सकता है।आइये अब सूरए निसा की 9वीं आयत की तिलावत सुनें।وَلْيَخْشَ الَّذِينَ لَوْ تَرَكُوا مِنْ خَلْفِهِمْ ذُرِّيَّةً ضِعَافًا خَافُوا عَلَيْهِمْ فَلْيَتَّقُوا اللَّهَ وَلْيَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا (9)जो लोग अपने पश्चात कमज़ोर संतान छोड़ जाते हैं और उनके भविष्य से डरते रहते हैं उन्हें अनाथ बच्चों पर अत्याचार से डरना चाहिये तथा ईश्वर से भयभीत रहना चाहिये एवं ठोस बात करनी चाहिये। (4:9)अनाथों के बारे में लोगों में प्रेम भावना उभारने के लिए क़ुरआन मजीद स्वयं उन्हीं के बेआसरा बच्चों का चित्रण करता है जो उनके पश्चात कठोर हृदय के लोगों की अभिभावकता में आ गये हैं जो न उनकी भावनाओं पर ध्यान देते हैं न उनके माल को ख़र्च करने में न्याय करते हैं। इसके पश्चात क़ुरआन कहता है कि यदि तुम अपने बच्चों के भविष्य की ओर से भयभीत हो कि तुम्हारे पश्चात लोग उनके साथ क्या करेंगे तो तुम भी दूसरों के अनाथ बच्चों के साथ व्यवहार में ईश्वर को दृष्टिगत रखो और न केवल यह कि उन पर अत्याचार न करो बल्कि उचित व अच्छी बातों व व्यवहार द्वारा दिल जीतो और उनके साथ प्रेम करके उनकी प्रेम संबंधी वंचितता को दूर करो। इस आयत से हमने सीखा कि समाज के अनाथों और वंचितों से वैसा व्यवहार करना चाहिये जैसा हम चाहते हैं कि दूसरे हमारे बच्चों के साथ करें। समाज में हमारे अच्छे या बुरे व्यवहार का प्रतिउत्तर मिलता है और न केवल हमारे जीवन में बल्कि मृत्यु के पश्चात भी उसके अच्छे या बुरे परिणाम हमारे बच्चों तक पहुंचते हैं। अत: हमें अपने सामाजिक व्यवहार की ओर से निश्चेत नहीं रहना चाहिये। अनाथ बच्चों की आवश्यकताएं केवल खाने पहनने तक सीमित नहीं हैं बल्कि उनकी प्रेम भावना को संतुष्ट करना अधिक महत्वपूर्ण है। आइये अब सूरए निसा की 10वीं आयत की तिलावत सुनें।إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَى ظُلْمًا إِنَّمَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ نَارًا وَسَيَصْلَوْنَ سَعِيرًا (10)निसंदेह जो लोग अनाथों का माल अत्याचारपूर्वक खाते हैं वास्तव में वे लोग अपने पेटों में आग पहुंचा रहे हैं और शीघ्र ही वे भड़कती हुई आग में पहुंच जायेंगे। (4:10)यह आयत अनाथों पर अत्याचार करने का परोक्ष चेहरा दिखाते हुए कहती है कि अनाथ का माल खाना वास्तव में आग निगलने जैसा है और अनाथों का माल खाने वाला प्रलय में इसी रूप में प्रकट होगा। मूल रूप से इस संसार में हमारे कर्मों का एक विदित चेहरा है जिसे हम आंखों से देखते हैं और दूसरा वास्तविक चेहरा है जो इस संसार में हमारी आंखों से ओझल है परंतु प्रलय में वह प्रकट होगा तथा प्रलय में हमें दिये जाने वाले दंड वास्तव में हमारे ही कर्मों का साक्षात रूप हैं। जिस प्रकार अनाथ का माल खाना उसका दिल जलाता है और उसकी आत्मा को यातना पहुंचाता है उसी प्रकार इस कर्म का वास्तविक चेहरा दहकती हुई आग खाना है जो अत्याचारी के पूरे अस्तित्व को जला देगी। पिछली आयत में अनाथों पर अत्याचार के सामाजिक परिणामों की ओर संकेत किया गया था और इस आयत में उसके परोक्ष परिणामों का उल्लेख किया गया है ताकि ईमान वाले अनाथों के माल की ओर हाथ बढ़ाते समय इन परिणामों की ओर ध्यान दें और यह काम न करें।इस आयत से हमने सीखा कि हराम माल विशेषकर अनाथों का माल खाना यद्यपि विदित रूप से अच्छा व स्वादिष्ट लगता है परंतु वास्तव में यह आत्मा को यातना देने वाला तथा मनुष्य की भली आदतों को नष्ट करने वाला है। नरक की आग हमारे उन्हीं बुरे कर्मों की आग है जो हम प्रलय में ले गये हैं। ईश्वर अपने बंदों को जलाना पसंद नहीं करता बल्कि यह हम ही हैं जो स्वयं को अपने पापों की आग में जलाते हैं।