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    सूरए निसा; आयतें 74-76 (कार्यक्रम 137)

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    आइये पहले सूरए निसा की 74वीं आयत की तिलावत सुनें।فَلْيُقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ الَّذِينَ يَشْرُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآَخِرَةِ وَمَنْ يُقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَيُقْتَلْ أَوْ يَغْلِبْ فَسَوْفَ نُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا (74)तो जिन लोगों ने संसार के जीवन को प्रलय के बदले बेच दिया है उन्हें ईश्वर के मार्ग में युद्ध करना चाहिये और जान लेना चाहिये कि जो भी ईश्वर के मार्ग में युद्ध करेगा चाहे वह मारा जाए या विजयी हो हम उसे शीघ्र ही महान बदला देंगे। (4:74)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मिथ्याचारी व्यक्ति की एक निशानी यह है कि वह विभिन्न बहानों से जेहाद में शामिल होने से बचता रहता है और न केवल यह कि स्वयं सुस्ती करता है बल्कि दूसरों को भी मोर्चों पर जाने से रोकता है।इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए यह आयत कहती है युद्ध से भागना ईश्वर और प्रलय पर ईमान न होने की निशानी है और यदि कोई परलोक में मिलने वाले बदले पर ईमान रखता हो और संसार की अस्थाई ज़िन्दगी को परलोक के स्थाई जीवन के लिए एक खेती की भांति समझता हो तो वह बड़ी सरलता से ईश्वर के मार्ग में संघर्ष और युद्ध करता है क्योंकि ऐसा ईमान वाला व्यक्ति जानता है कि उसका कर्तव्य ईश्वर के शत्रुओं से उसके धर्म की सुरक्षा करना है तथा वह अपना कर्तव्य पालन करना चाहता है परिणाम चाहे जो भी हो। विजय या पराजय से उसे कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि ईश्वर के मार्ग में रहना और उसकी प्रसन्नता के लिए काम करना महत्वपूर्ण है न कि शत्रु को पराजित करने के लिए।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम में जेहाद का लक्ष्य ईश्वरीय धर्म की रक्षा है न कि विस्तारवाद, प्रतिशोध, साम्राज्य या भूमि विस्तार।ईमान की परीक्षा का एक मंच रणक्षेत्र है जो ईमान वाले को मित्थाचारी से अलग कर देता है। सत्य के मोर्चे पर फ़रार या पराजय का अस्तित्व नहीं है; या शहादत मिलेगी या विजय।आइये अब सूरए निसा की 75वीं आयत की तिलावत सुनें।وَمَا لَكُمْ لَا تُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَاءِ وَالْوِلْدَانِ الَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْ هَذِهِ الْقَرْيَةِ الظَّالِمِ أَهْلُهَا وَاجْعَل لَنَا مِنْ لَدُنْكَ وَلِيًّا وَاجْعَل لَنَا مِنْ لَدُنْكَ نَصِيرًا (75)हे ईमान वालो! तुम उन अत्याचारग्रस्त पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की मुक्ति के लिए युद्ध क्यों नहीं करते जो कहते हैं कि प्रभुवर! हमें इस नगर से निकाल दे जिसके लोग अत्याचारी हैं और तू अपनी ओर से हमारे लिए कोई अभिभावक पैदा कर और अपनी ओर से किसी को हमारा सहायक बना। (4:75)जिस प्रकार से कि पिछली आयतें मोमिनों को प्रलय पर ईमान पर भरोसा और लोक व परलोक की तुलना करके ईश्वर के मार्ग में जेहाद में निमंत्रण देती थीं उसी प्रकार यह आयत मानवीय भावनाओं से लाभ उठाते हुए ईमान वालों से कहती है कि वे अत्याचारियों के चंगुल में फंसे हुए लोगों की मुक्ति के लिए उठ खड़े हों और चुप न बैठें।यह आयत भलि-भांति स्पष्ट करती है कि अत्याचारियों के चंगुल से अत्याचारग्रस्तों की मुक्ति और स्वतंत्रता इस्लामी जेहाद के लक्ष्यों में से है और इस मार्ग में युद्ध ईश्वर के मार्ग में युद्ध है। वास्तविक ईमान वालों का अपने धर्म और देश वालों के प्रति दायित्व होता है और वे ऐसी स्थिति में केवल अपने और अपने परिजनों के आराम का ध्यान नहीं रख सकते कि जब वे लोग संकट में हों।इस आयत से हमें यह पाठ मिलता है कि इस्लाम में जेहाद ईश्वरीय होने के साथ मानवीय भी है और मनुष्यों की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष ईश्वरीय संघर्ष है।पीड़ितों की चीख़ व पुकार की उपेक्षा पाप है। साहस और शक्ति के साथ उनकी सहायता करनी चाहिये।अत्याचारियों से छुटकारे के लिए ईश्वर और उसके प्रिय दासों से सहायता मांगनी चाहिये न कि हर एक से हर रूप में।अब सूरए निसा की 76वीं आयत की तिलावत सुनें।الَّذِينَ آَمَنُوا يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ كَفَرُوا يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ الطَّاغُوتِ فَقَاتِلُوا أَوْلِيَاءَ الشَّيْطَانِ إِنَّ كَيْدَ الشَّيْطَانِ كَانَ ضَعِيفًا (76)धर्म पर निष्ठा रखने वाले ईश्वर के मार्ग में संघर्ष करते हैं और नास्तिक, बुराई के प्रतीक के मार्ग में लड़ाई करते हैं तो हे ईमान लाने वालो शैतान के अनुयाइयों और चेलों से लड़ो तथा डरो मत, शैतान की योजना कमज़ोर है। (4:76)इस्लाम में जेहाद के अर्थ को अधिक स्पष्ट करने के लिए इस आयत में धर्म पर निष्ठा रखने वालों और नास्तिकों के युद्ध के लक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया है। आयत में कहा जाता है कि ईमान लाने वाले ईश्वर के धर्म की सुदृढ़ता और सुरक्षा के लिए जेहाद करते हैं न कि सत्ता और पद के लिए। उनका लक्ष्य ईश्वर होता है जबकि ईश्वर का इन्कार करने वाले अत्याचारियों और बुराइयों के प्रतीकों की सत्ता को मज़बूत करने के लिए युद्ध करते हैं और उनका लक्ष्य अन्य लोगों पर वर्चस्व जमाना तथा देश की सीमा बढ़ाना होता है। इसके बाद इस आयत में इस प्रकार के वर्चस्व वादी गुटों से युद्ध करने पर मोमिनों को प्रोत्साहित करते हुए कहा गया है।यह न सोचो कि वे शक्तिशाली हैं और तुम कमज़ोर बल्कि इसके विपरीत तुम ईश्वर पर विश्वास के कारण सबसे बड़ी शक्ति के स्वामी हो और वे शैतान के अनुसरण के कारण अत्यंत कमज़ोर हैं तो फिर शैतान व बुराइयों के प्रतीकों की सेना के विरुद्ध लड़ाई से न डरो और अपनी पूरी शक्ति के साथ उनका मुक़ाबला करो और जान लो कि तुम ही श्रेष्ठ हो क्योंकि वे शैतान के अनुयायी हैं कि जो स्वयं ईश्वर के संकल्प के आगे कमज़ोर है।इस आयत से हमें यह पाठ मिलता है कि ईश्वर के मार्ग में होना अर्थात ईश्वर के लिए होना इस्लामी समाज में समस्त कार्यवाहियों और गतिविधियों का प्रतीक व चिन्ह है।उपेक्षा और वैराग्य मोमिन के लिए उचित नहीं होता बल्कि ईमान व ईश्वर पर विश्वास का चिन्ह बुराइयों का आदेश देने वाली इच्छाओं के विरुद्ध संघर्ष है।ईश्वर का इन्कार बुराइयों के प्रतीक और शैतान के त्रिभुज के तीन आयाम हैं जिनमें से प्रत्येक का जीवन एक दूसरे पर निर्भर है। इसीलिए इनमें से हर एक दूसरे को शक्ति प्रदान करने की दिशा में प्रयासरत रहता है।शैतान के अनुसरण का परिणाम विफलता होता है क्योंकि शैतान और उसके अनुयाइयों को प्राप्त होने वाला समर्थन कमज़ोर व कम होता है।