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    सूरए निसा; आयतें 77-79 (कार्यक्रम 138)

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    आइये पहले सूरए निसा की 77वीं आयत की तिलावत सुनें।أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ قِيلَ لَهُمْ كُفُّوا أَيْدِيَكُمْ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآَتُوا الزَّكَاةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ إِذَا فَرِيقٌ مِنْهُمْ يَخْشَوْنَ النَّاسَ كَخَشْيَةِ اللَّهِ أَوْ أَشَدَّ خَشْيَةً وَقَالُوا رَبَّنَا لِمَ كَتَبْتَ عَلَيْنَا الْقِتَالَ لَوْلَا أَخَّرْتَنَا إِلَى أَجَلٍ قَرِيبٍ قُلْ مَتَاعُ الدُّنْيَا قَلِيلٌ وَالْآَخِرَةُ خَيْرٌ لِمَنِ اتَّقَى وَلَا تُظْلَمُونَ فَتِيلًا (77)क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिनसे कहा गया था कि अभी मक्के में जेहाद से अपने हाथ रोके रखो और नमाज़ कायम रखो तथा ज़कात दो तो उन्हें आपत्ति हुई और वे युद्ध का आग्रह करने लगे परंतु जब मदीने में उन्हें जेहाद का आदेश दिया गया तो उनमें से एक गुट लोगों से इस प्रकार डरने लगा जिस प्रकार से ईश्वर से डरता हो या शायद उससे भी अधिक और उसने कहा कि प्रभुवर! तूने क्यों हम पर जेहाद अनिवार्य कर दिया? काश इसे थोड़े समय के लिए और टाल दिया होता। हे पैग़म्बर! आप उनसे कह दीजिये कि संसार की पूंजी थोड़ी है और ईश्वर का भय रखने वालों के लिए परलोक उत्तम स्थान है और जान लो कि तुम पर बाल बराबर भी अत्याचार नहीं होगा। (4:77)इस्लामी इतिहास की किताबों में वर्णित है कि मक्के में मुसलमान अनेकेश्वरवादियों के कड़े दबाव में थे। अत: पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आये और उनसे कहने लगे कि इस्लाम लाने से पूर्व हम बहुत सम्मानित थे परंतु अब हमारा सम्मान समाप्त हो चुका है और शत्रु हमें सदैव यातनाएं देते रहते हैं। आप हमें अनुमति दें कि हम उनसे युद्ध करके अपना सम्मान वापस ले लें। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि इस समय मुझे युद्ध का आदेश नहीं है और तुम लोग भी नमाज़ तथा ज़कात जैसे व्यक्तिगत एवं सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते रहो। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और मुसलमानों द्वारा मक्के से मदीने हिजरत के पश्चात जब ईश्वर की ओर से जेहाद का आदेश आया तो उन्हीं लोगों का एक गुट विभिन्न बहानों से जेहाद से आना कानी करने लगा तो यह आयत आई और उनके इस दोमुखी व्यवहार की आलोचना की। यद्यपि यह इस्लाम के आरंभिक काल के मुसलमानों के बारे में है परंतु इसके उदाहरण हर समय और काल में देखे जा सकते हैं। सदैव ऐसे लोग रहे हैं और अब भी हैं जो अपने सामाजिक व्यवहार में अतिशयोक्ति करते हैं। कभी तो वे समाज के नेताओं से आगे बढ़ जाते हैं और कभी समाज के साधारण लोगों से भी पीछे रह जाते हैं।वास्तव में इस प्रकार के लोग अपने कर्तव्य के निर्धारण और उसके पालन के लिए प्रयासरत नहीं रहते बल्कि कभी वे समुद्र की लहर की भांति उफनते हैं परंतु जब वे तट पर पहुंचते हैं तो झाग की भांति, जिसकी आयु कुछ क्षण से अधिक नहीं होती, उनका कोई फल नहीं होता और बहुत ही शीघ्र शांत हो जाते हैं। ऐसे लोग ढ़ोल की भांति भीतर से खाली होते हैं बाहर से तो बहुत आवाज़ देते हैं परंतु उनके भीतर किसी भी काम का साहस नहीं होता।इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक आदेश क्रमबद्ध होते हैं उसी में जेहाद और संघर्ष की क्षमता होगी जिसने पहले नमाज़ और ज़कात द्वारा अपना परीक्षण किया हो तथा अपनी आंतरिक इच्छाओं और शैतान से संघर्ष किया हो।सामाजिक समस्याओं और संकटों में भावनात्मक व्यवहार नहीं करना चाहिये बल्कि न्यायप्रेमी और दूरदर्शी नेताओं के दृष्टिकोणों के अधीन रहना चाहिये।आइये अब सूरए निसा की 78वीं और 79वीं आयतों की तिलावत सुनें।أَيْنَمَا تَكُونُوا يُدْرِكُكُمُ الْمَوْتُ وَلَوْ كُنْتُمْ فِي بُرُوجٍ مُشَيَّدَةٍ وَإِنْ تُصِبْهُمْ حَسَنَةٌ يَقُولُوا هَذِهِ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ وَإِنْ تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَقُولُوا هَذِهِ مِنْ عِنْدِكَ قُلْ كُلٌّ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ فَمَالِ هَؤُلَاءِ الْقَوْمِ لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ حَدِيثًا (78) مَا أَصَابَكَ مِنْ حَسَنَةٍ فَمِنَ اللَّهِ وَمَا أَصَابَكَ مِنْ سَيِّئَةٍ فَمِنْ نَفْسِكَ وَأَرْسَلْنَاكَ لِلنَّاسِ رَسُولًا وَكَفَى بِاللَّهِ شَهِيدًا (79)जान लो कि तुम जहां कहीं भी रहोगे मौत तुम्हें आ लेगी चाहे सुदृढ़ दुर्गों में ही क्यों न रहो। हे पैग़म्बर! इन मिथ्याचारियों की स्थिति यह है कि जब उन्हें कोई भलाई मिल जाती है तो कहते हैं कि यह ईश्वर की ओर से है और यदि कोई मुसीबत उनके सिर आ जाती है तो कहते हैं यह आपकी ओर से है। हे पैग़म्बर! उनसे कह दीजिये कि सब कुछ ईश्वर की ओर से है। तो इस गुट को क्या हो गया है यह कोई बात समझता ही नहीं है। (4:78) तुम तक जो भी भलाई पहुंचती है वह ईश्वर की ओर से है और जो कुछ बुराई व मुसीबत पहुंचती है वह स्वयं तुम्हारी ओर से है और हे पैग़म्बर! हम ने आपको सभी लोगों के लिए पैग़म्बर बनाकर भेजा है और इस बारे में ईश्वर की गवाही काफ़ी है। (4:79)पिछली आयतों की व्याख्या में कहा गया था कि कुछ डरपोक और कमज़ोर ईमान के मुसलमानों ने जेहाद का आदेश आने पर आपत्ति करते हुए उसे विलम्बित करने का आग्रह किया ताकि शायद उनकी जान बच जाये। इन आयतों में ईश्वर कहता है कि यह मत सोचो कि जेहाद से भाग कर तुम्हें मौत से भी मुक्ति मिल जायेगी। जान लो कि यदि मज़बूत से मज़बूत दरवाज़ों के पीछे भी जाकर छिप जाओ तब भी मौत तुम्हें आ लेगी। शाबाश है उन लोगों पर जो जेहाद जैसे सार्थक और मूल्यवान मार्ग में अपनी जान की भेंटे देते हैं और ईश्वर के मार्ग में शहीद होकर अपने अनंत जीवन को सुनिश्चित बना लेते हैं।आगे चलकर ये आयतें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से मित्थाचारियों के ग़लत और अपमानजनक व्यवहार की ओर संकेत करते हुए कहती हैं। जब भी युद्ध में उन्हें विजय प्राप्त होती है तो वे उसे ईश्वर की कृपा मानते हैं पंरतु यदि उन्हें पराजय होती है तो वे उसे पैग़म्बर की अयोग्यता का परिणाम बताते हैं। उनके उत्तर में आयत कहती है इस संसार की हर वस्तु ईश्वर की इच्छा से है और उनके इरादे के बिना कोई बात नहीं होती चाहे विजय हो या पराजय किन्तु उसकी इच्छा भी बिना तर्क और हिसाब के नहीं होती। यदि तुम अपने कर्तव्यों का पालन करो तो ईश्वर भी तुम्हारे लिए भलाई और विजय का इरादा करता है यदि तुम बद्र के युद्ध की भांति ही सुस्ती करोगे तो ईश्वर तुम्हारे भाग्य में पराजय लिख देगा।ईश्वर से मनुष्य का संबंध सूर्य से धरती के समान है। सूर्य के चारों ओर अपने परिक्रमण में धरती जहां कहीं अपना मुख सूर्य की ओर करती है वहां वो उसके प्रकाश और उष्मा से लाभांवित होती है और जहां कहां वह सूर्य की ओर से मुंह घुमा लेती है वहां वह अंधकार में ग्रस्त हो जाती है। मनुष्य भी इसी प्रकार से है जब भी वह ईश्वर की ओर मुख करता है और उसकी ओर आकृष्ट होता है तब वह ईश्वर की कृपा से लाभांवित होता है और जब कभी भी वह ईश्वर से मुंह मोड़ लेता है तो स्वयं को जीवन के स्रोत से वंचित कर लेता है।अलबत्ता इस वास्तविकता को केवल पवित्र हृदय वाले लोग ही समझते और स्वीकार करते हैं परंतु रोगी हृदय वाले या तो इसे समझते नहीं या स्वीकार करना नहीं चाहते। क्योंकि वे ईश्वर को नहीं बल्कि स्वयं को केन्द्र समझते हैं। वे केवल स्वयं को सत्य पर समझते हैं और जो कोई उनके मुक़ाबले पर आता है उसे असत्य पर मानते हैं जबकि सत्य और असत्य का मापदंड ईश्वर है न कि वे।इन आयतों से हमने सीखा कि जब मौत निश्चित है तो फिर युद्ध और जेहाद से भागने का क्या अर्थ है?अपने पापों को दूसरों की गर्दन में नहीं डालना चाहिये और स्वयं को कर्तव्यहीन बताकर अपनी ग़लतियों का औचित्य नहीं दर्शाना चाहिये।जीवन व मृत्यु, अच्छी व बुरी घटनायें सबकी सब ईश्वर के तत्वदर्शी नियमों के आधार पर हैं।ईश्वरीय दृष्टि में, जो कुछ सुन्दरता और परिपूर्णता है, वह ईश्वर की ओर से है और जो कुछ कमी व अवगुण है वह हमारी ओर से है।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी विश्वव्यापि है और किसी भी जाति या क्षेत्र से विशेष नहीं है।