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    सूरए निसा; आयतें 80-82 (कार्यक्रम 139)

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    आइये पहले सूरए निसा की आयत नम्बर 80 की तिलावत सुनें।مَنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ وَمَنْ تَوَلَّى فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا (80)जिसने भी पैग़म्बर का आज्ञापालन किया तो निसंदेह उसने ईश्वर का आज्ञापालन किया और जिसने अवज्ञा की तो हे पैग़म्बर! जान लीजिए कि हमने आपको उन लोगों का रखवाला बनाकर नहीं भेजा है। (4:80)किसी भी समाज के संचालन के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक सरकारी पदों के क्रम का निर्धारण और लोगों द्वारा उनका आज्ञापालन है। जैसाकि इस कार्यक्रम में हम अनेक बार कह चुके हैं कि इस्लाम केवल व्यक्तिगत उपासना संबंधी कुछ आदेशों का नाम नहीं है बल्कि इस्लाम व्यक्ति के कल्याण को समाज के कल्याण और विभिन्न सामाजिक मंचों पर उसकी उपस्थिति पर निर्भर समझता है।ज़कात, हज और जेहाद जैसे आदेश इन सामाजिक सिद्धांतों का स्पष्ट उदाहरण हैं तथा इन सिद्धांतों और आदेशों के क्रियान्वयन के लिए शासन व्यवस्था की आवश्यकता है जिसे इस्लाम ने पूर्णरूप से पेश किया है।क़ुरआन की दृष्टि से पैग़म्बर का दायित्व केवल ईश्वरीय आदेशों को पहुंचाना नहीं है बल्कि वे स्वयं इस्लामी समाज के शासक हैं और उनका आज्ञापालन ईश्वर का आज्ञापालन है तथा उनकी अवज्ञा ईश्वर के इंकार के समान है। न केवल पैग़म्बर के प्रशासनिक आदेशों बल्कि उनके कथनों का भी विशेष महत्व है और उन्हें सुन्नत कहा जाता है।यह आयत जिस रोचक बात की ओर संकेत करती है वह समाज के प्रति पैग़म्बर यहां तक कि शासक के रूप में उनके दायित्वों की सीमा है और वह यह कि पैग़म्बर लोगों को सत्य स्वीकार करने और उस पर कार्यबद्ध होने पर विवश करने के उत्तरदायी नहीं हैं उनका कर्तव्य और दायित्व केवल समाज का मार्गदर्शन तथा नेतृत्व है न कि ईश्वरीय आदेशों के पालन के लिए लोगों को विवश करना।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर का आज्ञापालन केवल नमाज़, रोज़ा करने के अर्थ में नहीं है बल्कि समाज के ईश्वरीय नेताओं का आज्ञापालन भी धर्म का दायित्व है।पैग़म्बरों का कर्तव्य धर्म को लोगों पर थोपना नहीं बल्कि उसका प्रचार है और मनुष्य को स्वेच्छा और अपने चयन से धर्म अपनाना चाहिये।आइये अब सूरए निसा की 81वीं आयत की तिलावत सुनें।وَيَقُولُونَ طَاعَةٌ فَإِذَا بَرَزُوا مِنْ عِنْدِكَ بَيَّتَ طَائِفَةٌ مِنْهُمْ غَيْرَ الَّذِي تَقُولُ وَاللَّهُ يَكْتُبُ مَا يُبَيِّتُونَ فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ وَكَفَى بِاللَّهِ وَكِيلًا (81)और (हे पैग़म्बर! जब मिथ्याचारी आपके पास होते हैं तो) कहते हैं कि हम आज्ञापालन करने वाले हैं परंतु जब वे आपके पास से चले जाते हैं तो उनका एक गुट अपने कहे के विपरीत रातों की बैठकों में षड्यंत्र रचता है और उन बैठकों में वे जो कहते हैं ईश्वर उसे लिख रहा है तो तुम उनसे दूरी करो और ईश्वर पर भरोसा करो कि ईश्वर सहायता करने के लिए काफ़ी है। (4:81)यह आयत भी मिथ्याचारियों की ओर से ख़तरों की ओर से सचेत करती है और पैग़म्बर तथा मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है होशियार रहो कि तुम्हारे बीच कमज़ोर ईमान वालों तथा मिथ्याचारियों का एक ऐसा गुट मौजूद है जो विदितरूप से तुम्हारे साथ होने और आज्ञापालन करने का दावा करता है परंतु रात की अपनी गुप्त बैठकों में वे कुछ और निर्णय लेते हैं तथा तुम्हारे कार्यक्रमों को विफल बनाने के लिए षड्यंत्र रचते हैं। ऐसे लोगों से मुक़ाबले का मार्ग उन्हें पहचान कर उनसे दूर रहना है। उनके अलग हो जाने या उनके उल्लंघनों से घबराना नहीं चाहिये क्योंकि ईश्वर उनकी बातों और निर्णयों को जानता है और उचित समय पर उन्हें विफल बना देगा तो केवल ईश्वर पर भरोसा करना चाहिये और उसी से सहायता मांगनी चाहिये।इन आयतों से हमने सीखा कि आंतरिक शत्रुओं के षड्यंत्रों की ओर से निश्चेत नहीं रहना चाहिये और यह नहीं सोचना चाहिये कि शत्रु केवल सीमा पार ही है।मनुष्य को भोला नहीं होना चाहिये और किसी की भी ओर से प्रेम के दावे पर शीघ्र ही भरोसा नहीं कर लेना चाहिये बल्कि इसके विपरीत जहां अधिक चापलूसी, मक्खनबाज़ी और प्रशंसा हो वहां घुसपैठ का ख़तरा अधिक समझना चाहिये।ईश्वर वास्तविक ईमान वालों का रक्षक और समर्थक है तथा अपनी प्रत्यक्ष और परोक्ष सहायताओं से उनका समर्थन करता है।आइये अब सूरए निसा की 82वीं आयत की तिलावत सुनें।أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآَنَ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِنْدِ غَيْرِ اللَّهِ لَوَجَدُوا فِيهِ اخْتِلَافًا كَثِيرًا (82)क्या वे क़ुरआन में सोच विचार नहीं करते कि यदि वह ईश्वर के अतिरिक्त किसी और की ओर से होता तो वे उसमें बहुत मतभेद पाते। (4:82)इस्लाम के विरोधी, जिनके पास पैग़म्बरे इस्लाम के स्पष्ट तर्कों का कोई जवाब नहीं होता था, विभिन्न प्रकार के आरोप लगाते थे। उनमें से एक यह था कि क़ुरआन हज़रत मोहम्मद के विचारों का परिणाम या दूसरे से प्राप्त की हुई उनकी शिक्षाओं का फल है। इस आरोप के उत्तर में ईश्वर इस आयत में कहता है क्यों तुम लोग कुरआन की आयतों पर विचार नहीं करते? क़ुरआन 20 वर्षों से भी अधिक की अवधि में युद्ध और शांति की विभिन्न परिस्थितियों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर उतरा है, यदि यह मानव के विचारों का परिणाम होता तो स्वाभाविक रूप से इसमें अनेक मतभेद होते चाहे विषय की दृष्टि से या कथन की पद्धति व क्रम की दृष्टि से।मूल रूप से क़ुरआन के ईश्वरीय चमत्कार होने के तर्कों में से एक इतनी बड़ी अवधि में भी क़ुरआन के विषयों में समानता व समन्वय है क्योंकि बड़े से बड़े लेखक के आज के और २० वर्ष के बाद के लेखों में समानता नहीं होती और उसमें परिवर्तन आता रहता है क्योंकि मनुष्य की परिस्थितियों, ज्ञान और प्रकृति का प्रभाव पड़ता रहता है और इस प्रकार उसके सोचने और लिखने में विभिन्न प्रकार के अंतर और मतभेद आते ही रहते हैं परन्तु ईश्वर का कथन इन सब बातों से बहुत ऊपर है इसीलिए २३वर्षों में भी उसके विषयों और अन्दाज़ में कोई अंतर दिखाई नहीं देता।इस आयत से हमने सीखा कि उन लोगों के विपरीत, जो धर्म को ज्ञान व विचार का विरोधी बताते हैं यह आयत स्पष्ट रूप से सभी को क़ुरआन की आयतों पर विचार का निमंत्रण देती है ताकि इस प्रकार वे इस्लाम की सहायता को समझ सकें।क़ुरआन हर काल व हर पीढ़ी के लिए समझने योग्य है और सभी ईमान वालों का कर्तव्य है कि उस पर विचार करें।यदि लोग क़ुरआन के ध्रुव पर एकत्रित हो जायें तो हर प्रकार के मतभेद और विवाद समाप्त हो जायेंगे क्योंकि क़ुरआन में ऐसी कोई चीज़ नहीं जो मतभेद का कारण हो।