islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए निसा; आयतें 83-85 (कार्यक्रम 140)

    सूरए निसा; आयतें 83-85 (कार्यक्रम 140)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए निसा की आयत नंबर 83 की तिलावत सुनें।) وَإِذَا جَاءَهُمْ أَمْرٌ مِنَ الْأَمْنِ أَوِ الْخَوْفِ أَذَاعُوا بِهِ وَلَوْ رَدُّوهُ إِلَى الرَّسُولِ وَإِلَى أُولِي الْأَمْرِ مِنْهُمْ لَعَلِمَهُ الَّذِينَ يَسْتَنْبِطُونَهُ مِنْهُمْ وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ لَاتَّبَعْتُمُ الشَّيْطَانَ إِلَّا قَلِيلًا (83)और (मिथ्याचारियों की पद्धति यह है कि) जब भी उन्हें शांति या भय का समाचार मिलता है उसे फैला देते हैं जबकि यदि वे उसे पैग़म्बर या योग्य लोगों के पास ले जाएं तो वे लोग जो उसको जानने वाले हैं, उसकी वास्तविकता को समझ जाते हैं, और यदि तुम पर ईश्वर की कृपा न होती तो कुछ लोगों को छोड़कर तुम सब शैतान का अनुसरण करते। (4:83)पिछली आयतों में पैग़म्बर व इस्लाम के आरंभिक काल के मुसलमानों के साथ मिथ्याचारियों के अनुचित व्यवहारों का वर्णन करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में उनके एक अन्य व्यवहार का वर्णन करते हुए कहता है कि। अफ़वाहें फैलाना, विशेषकर युद्ध के समाचारों के बारे में जिनता बहुत महत्व होता है, मिथ्याचारियों की योजनाओं में से एक है। इस प्रकार की अफ़वाहें कभी लोगों के हृदयों में भय व आतंक उत्पन्न कर देती हैं तो कभी अनुचित रूप से उनके भीतर शांति व सुरक्षा की आशा जगा देती हैं।इसके पश्चात ईश्वर शासकों के प्रति जनता के कर्तव्य के संबंध में एक मूल सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहता हैः समाज की व्यवस्था से संबंधित मामलों में जनता का कर्तव्य यह है कि वो इस प्रकार के समाचारों को नेताओं व शासकों तक पहुंचा दे ताकि वे उसका सही विश्लेषण करके लोगों को वास्तविक्ताओं से अवगत कराएं।आगे चलकर आयत एक महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करते हुए कहती हैः मिथ्याचारियों की यह पद्धति मनुष्य को कुफ़्र एवं शैतान के अनुसरण की ओर ले जाती है और यदि ईश्वर की कृपा तथा पैग़म्बरों व अन्य ईश्वरीय मार्गदर्शकों का मार्गदर्शन न होता तो अधिकांश लोगों को मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता था और वे समाज की कठिनाइयों में शैतानी उकसावों और शैतानी विचारों से ग्रस्त हो जाते।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के बीच अफ़वाहें फैलाना, मिथ्याचारियों का काम है। अतः उनकी ओर से सचेत रहना चाहिए।सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समाचारों को नहीं फैलाना चाहिए बल्कि इस प्रकार के समाचारों को केवल शासक वर्ग तक सीमित रखना चाहिए।केवल सोचने, समझने तथा चिंतन करने वाले लोग ही वास्तिविक्ता तक पहुंचते हैं तथा अन्य लोगों को उन्हीं से संपर्क करना चाहिए। आइए अब सूरए निसा की आयत नंबर 84 की तिलावत सुनें।فَقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ لَا تُكَلَّفُ إِلَّا نَفْسَكَ وَحَرِّضِ الْمُؤْمِنِينَ عَسَى اللَّهُ أَنْ يَكُفَّ بَأْسَ الَّذِينَ كَفَرُوا وَاللَّهُ أَشَدُّ بَأْسًا وَأَشَدُّ تَنْكِيلًا (84)(हे पैग़म्बर!) ईश्वर के मार्ग में युद्ध करो और ईमान वालों को भी इस काम पर प्रोत्साहित करो। (परंतु यह जान लो कि) तुम केवल अपने कर्तव्यों के उत्तरदायी हो। आशा है कि ईश्वर काफ़िरों की शक्ति और सत्ता को रोक देगा और ईश्वर की शक्ति भी अधिक है और दंड भी। (4:84)ऐतिहासिक किताबों में वर्णित है कि ओहोद के युद्ध में मुसलमानों की पराजय के पश्चात अबू सुफ़ियान ने उन पर आक्रमण की अगली तारीख़ निर्धारित की। निश्चित समय पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मुसलमानों को आगे बढ़ने का आदेश दिया परंतु ओहद में होने वाली पराजय की कटु याद इस बात का कारण बनी कि अनेक लोग पैग़म्बर के आदेश की अवज्ञा करें। उसी समय यह आयत उतरी और पैग़म्बर को आदेश दिया गया कि यदि एक व्यक्ति भी तुम्हारे साथ न आए तब भी तुम पर युद्ध के लिए जाना आवश्यक है। अल्बत्ता तुम मुसलमानों को जेहाद का निमंत्रण देते रहो।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने भी ऐसा ही किया तथा बहुत कम लोग पैग़म्बर के साथ आगे बढ़े परंतु शत्रु निर्धारित समय पर युद्ध के लिए नहीं आया और युद्ध नहीं हुआ। इस प्रकार मुसलमानों को क्षति पहुंचाने से शत्रु को रोकने का ईश्वर का वचन पूरा हो गया।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों को कर्तव्य लोगों को धर्म और धार्मिक आदेशों की ओर बुलाना है न कि उन्हें इस कार्य के लिए विवश करना।ख़तरे और झड़प के समय नेता को सदैव समाज का अगुवा होना चाहिए। यहां तक कि यदि वह अकेला रह जाए तब भी उसे संघर्ष नहीं छोड़ना चाहिए कि ऐसी स्थिति में उसे ईश्वरीय सहायता प्राप्त होगी।हर कोई अपने काम का उत्तरदायी है। यहां तक कि पैग़म्बर भी लोगों के कामों के उत्तरदायी नहीं हैं बल्कि उन्हें केवल अपने कर्तव्यों का जवाब देना होगा। ईश्वरीय शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है। बस शर्त यह है कि लोग अपने दायित्वों का पालन करें। आइए अब सूरए निसा की आयत नंबर 85 की तिलावत सुनें।مَنْ يَشْفَعْ شَفَاعَةً حَسَنَةً يَكُنْ لَهُ نَصِيبٌ مِنْهَا وَمَنْ يَشْفَعْ شَفَاعَةً سَيِّئَةً يَكُنْ لَهُ كِفْلٌ مِنْهَا وَكَانَ اللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ مُقِيتًا (85)जो कोई भी भले कार्य के लिए मध्यस्थता और सिफ़ारिश करे उसे भी उसका एक भाग मिलेगा और जो कोई बुरे काम का साधन बने उसे भी उसके दंड का एक भाग मिलेगा और निःसंदेह ईश्वर हर चीज़ का हिसाब रखने वाला है। (4:85)इस आयत में ईश्वर एक मूल क़ानून की ओर संकेत करते हुए कहता है न केवल पैग़म्बर बल्कि सभी लोगों पर दूसरों को भले कर्मों का निमंत्रण देने का दायित्व है और वह भी भले ढंग से। अल्बत्ता हर कोई केवल अपने कर्मों के प्रति उत्तरदायी है परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि लोग दूसरों और समाज की अच्छी-बुरी बातों की ओर से निश्चेत रहें। इस्लाम व्यक्तिवाद का धर्म नहीं है कि हर कोई केवल अपने विचार में रहे और दूसरों को बुराई से संघर्ष और सत्य का निमंत्रण देने की ओर से आंखें मूंदे रहे।प्रत्येक दशा में भले कार्यों का आदेश देना और बुराइयों से रोकना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है जिसका उसे अपने जीवन, परिवार, मुहल्ले, कार्यस्थल इत्यादि में पालन करना चाहिए।पारितोषिक और दंड की दृष्टि से भी मनुष्य को न केवल यह कि अपने कर्मों का बदला मिलेगा बल्कि वह दूसरों के कर्मों में भी सहभागी है। यदि वह किसी भले काम का माध्यम बनेगा तो पारितोषिक का एक भाग उसे भी मिलेगा और यदि उसने किसी बुरे कर्म की भूमि समतल की तो उसके दंड में वो भी भागीदारी होगा।इस आयत से हमने सीखा कि दो व्यक्तियों के बीच मनमुटाव समाप्त कराना, समाज में भले कामों में सहयोग और सहायता करना तथा कुफ़्र के साथ युद्ध में मुसलमानों की सहायता करना, भली सिफ़ारिश के स्पष्ट उदाहरणों में से है जो प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है।समय व स्थान संबंधी सीमाओं के कारण मनुष्य स्वयं सभी भले कर्म नहीं कर सकता परंतु वह अच्छे कामों का माध्यम बन कर उनके पारितोषिक का कुछ भाग प्राप्त कर सकता है। {