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    सूरए निसा; आयतें 86-88 (कार्यक्रम 141)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 86 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا حُيِّيتُمْ بِتَحِيَّةٍ فَحَيُّوا بِأَحْسَنَ مِنْهَا أَوْ رُدُّوهَا إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ حَسِيبًا (86)और जब कभी तुम्हें सलामती की दुआ दी जाए तो तुम भी जवाब में उससे बेहतर या कम से कम उस जैसी ही दुआ दो। निसन्देह, ईश्वर हर चीज़ का हिसाब रखने वाला है। (4:86) यह आयत मुसलमानों को आपसी बर्ताव की ओर संकेत करते हुए कहती है, दूसरों के संबंध में मूल सिद्धांत प्रेम और दुआ है, चाहे बात करने में हो या व्यवहार में। एक-दूसरे से भेंट के समय सलाम करना तथा परिजनों और मित्रों से भेंट के समय उपहार देना, उन बातों में से है जिनकी इस्लाम ने बहुत सिफ़ारिश की है। जैसाकि इस आयत में सलाम और उपहार को एक निश्चित बात बताते हुए कहा गया है कि जब कभी तुम्हें दूसरों की ओर से शांति या सलामती की दुआ दी जाए तो तुम उससे बेहतर ढंग से उसका उत्तर दो या कम से कम उसी की भांति जवाब दो। दूसरे शब्दों में सलाम का उत्तर अधिक प्रसन्नता के साथ देना चाहिए तथा उनके उपहार के बदले में उससे अच्छा उपहार देना चाहिए। इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम के नाती इमाम हसन अलैहिस्सलाम की एक दासी ने एक दिन उन्हें एक गुलदस्ता उपहार में दिया। उत्तर में आपने उसे स्वतंत्र कर दिया और अपने इस काम के लिए क़ुरआने मजीद की इसी आयत को उद्धरित किया। इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों की ओर से अपने प्रति इस प्रकार के प्रेम की अभिव्यक्ति का उससे बेहतर ढंग से और कम से कम समय में उत्तर देना चाहिए। लोगों की भलाई को अस्वीकार करना एक अनुचित कार्य है। उपहार स्वीकार करना चाहिए और उचित ढंग से उसका उत्तर देना चाहिए। दूसरों के सलाम व उपहार की अनेदखी के कुछ कुपरिणाम हैं जिनमें मनुष्य लोक व परलोक में ग्रस्त होता है। आइए अब सूरए निसा की 87वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ لَيَجْمَعَنَّكُمْ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ لَا رَيْبَ فِيهِ وَمَنْ أَصْدَقُ مِنَ اللَّهِ حَدِيثًا (87)एकमात्र ईश्वर जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है, वह तुम्हें प्रलय के दिन, जिसमें कोई संदेह नहीं है, एकत्रित करेगा (और हे लोगो!) ईश्वर से बढ़कर अपने कथनों में कौन सच्चा है? (4:87) पिछली आयत के अन्तिम भाग में इस बात की ओर संकेत किया गया था कि ईश्वर सभी कर्मों का हिसाब रखने वाला है और कोई भी भलाई और बुराई उससे छिपी हुई नहीं है। यह आयत कहती है कि वही ईश्वर जिसने इस ब्रहमाण्ड की रचना की है, उसी के हाथों में इसका अंत भी है। और वह तुम सबको मरने के पश्चात एक समय और एक स्थान पर एकत्रित करेगा और फिर हर एक को उसके कर्मों का बदला दिया मिलेगा। इसके पश्चात आयत कहती है कि क्यों कुछ लोग प्रलय के बारे में संदेह करते हैं? क्या वे ईश्वर से बढ़कर किसी सच्चे को जानते हैं? और ईश्वर को झूठ बोलने की आवश्यकता ही क्या है? झूठ या भय आवश्यकता के कारण होता है या अनभिज्ञता के कारण या अज्ञानता के कारण। तो आवश्यकतामुक्त, हर बात में सक्षम और हर बात से अवगत, ईश्वर को झूठ बोलने की क्या आवश्यकता है कि वह अकारण ही तुमसे प्रलय का वादा करे। इस आयत से हमने सीखा कि हमें अभी से प्रलय के विचार में रहना चाहिए तथा ईश्वर को प्रसन्न करना चाहिए तथा उसके अतिरिक्त किसी और की उपासना नहीं करनी चाहिए। ईश्वर के वचन और उसके न्याय जैसे अनेक तर्कों के पश्चात प्रलय के बारे मंक संदेह का कोई तर्क नहीं रह जाता। वह जिसने हमें शून्य से बनाया है क्या हमें पुनः जीवित नहीं कर सकता?आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 88 की तिलावत सुनते हैं।فَمَا لَكُمْ فِي الْمُنَافِقِينَ فِئَتَيْنِ وَاللَّهُ أَرْكَسَهُمْ بِمَا كَسَبُوا أَتُرِيدُونَ أَنْ تَهْدُوا مَنْ أَضَلَّ اللَّهُ وَمَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَنْ تَجِدَ لَهُ سَبِيلًا (88)तो (हे ईमान वालो!) तुम मिथ्याचारियों के बारे में दो गुटों में क्यों बंट गए हो, जबकि ईश्वर ने उनके कर्मों के चलते (उनके विचारों को) पलट दिया है। क्या तुम चाहते हो कि उन लोगों का मार्गदर्शन करो जिन्हें ईश्वर ने उनके कर्मों के कारण पथभ्रष्ट कर दिया है जबकि ईश्वर जिसे पथभ्रष्ट करदे, उसके मोक्ष का तुम्हें कोई मार्ग नहीं मिलेगा। (4:88) पिछली आयतों में मिथ्याचारियों के विचारों और कर्मों का वर्णन करने के पश्चात, मोमिनों के साथ उनके व्यवहार की ओर संकेत करते हुए इस आयत में ईश्वर कहता है कि तुममें से एक गुट क्यों इतना भोला और जल्दी विश्वास करने वाला है जो यह सोचता है कि तुम मिथ्याचारियों के साथ और वे तुम्हारे साथ हैं। वे कभी भी तुम्हारे साथ नहीं रहे। वे कभी भी हृदय से ईमान नहीं लाए बल्कि वे केवल मौखिक रूप से इस्लाम प्रकट करते हैं। मूल रूप से देखा जाए तो ईमान की वास्तविक निशानी, ईश्वर व पैग़म्बर के आदेशों का व्यवहारिक पालन है न कि केवल ज़बान से साथ होने का दावा। बल्कि इस प्रकार के मिथ्याचारी और दोमुखी लोग, अपने इन्हीं कर्मों के कारण ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होकर कल्याण, मोक्ष व मार्गदर्शन की संभावना समाप्त कर देते हैं। वे सोचते हैं कि वे लोगों को धोखा दे रहे हैं जबकि वे स्वयं को धोखा दे रहे होते हैं। यह आयत स्पष्ट रूप से बताती है कि जो भी दिखावे के लिए और लोगों को धोखा देकर तथा धर्म से खिलवाड़ करके स्वयं को ईमान वाला दिखाना चाहता है, उसके लिए मार्गदर्शन की संभावना समाप्त हो जाती है और पैग़म्बर तक उसका मार्गदर्शन नहीं कर सकते। यद्यपि इस आयत में पथभ्रष्ट करने का संबंध दो बार ईश्वर से दिया गया था परन्तु आरंभ में ही आयत ने चेतावनी दे दी कि ये सब कुछ स्वयं लोगों के कर्मों के कारण है। ईश्वर ने सभी लोगों के लिए समान रूप से मार्ग दर्शन की भूमि प्रशस्त की है परन्तु जो मार्गदर्शन स्वीकार करने के स्थान पर उसका व ईश्वर के आदेशों का उपहास करता है, उसका न केवल यह कि मार्गदर्शन नहीं होता बल्कि वह आगे भी मार्गदर्शन की सभी संभावनाओं को समाप्त कर देता है, और ईश्वर द्वारा पथभ्रष्ट करने का अर्थ यही है वरना ईश्वर किसी को भी पथभ्रष्ट नहीं करना चाहता। इस बात की आशा किस प्रकार रखी जा सकती है कि जिन लोगों के विचार उलटे, हृदय मिथ्या से भरे और कर्म शत्रुओं के हित में हों, उन्हें ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त हो जाएगा। यह एक अनुचित और तर्कहीन आशा है। इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य के पतन का कारण स्वयं उसके कर्म हैं, ईश्वर अकारण किसी को पथभ्रष्ट नहीं करता। मिथ्याचारियों के संबंध में हमें भोला व जल्दी विश्वास करने वाला नहीं होना चाहिए और बिना किसी कारण के उनपर कृपा नहीं करनी चाहिए और उनका दिल जीतने का प्रयास नहीं करना चाहिए।