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    सूरए निसा; आयतें 89-91 (कार्यक्रम 142)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 89 की तिलावत सुनते हैं।وَدُّوا لَوْ تَكْفُرُونَ كَمَا كَفَرُوا فَتَكُونُونَ سَوَاءً فَلَا تَتَّخِذُوا مِنْهُمْ أَوْلِيَاءَ حَتَّى يُهَاجِرُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَإِنْ تَوَلَّوْا فَخُذُوهُمْ وَاقْتُلُوهُمْ حَيْثُ وَجَدْتُمُوهُمْ وَلَا تَتَّخِذُوا مِنْهُمْ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا (89)(हे ईमान वालो!) यह मिथ्याचारी चाहते हैं कि तुम भी उन्हीं की भांति काफ़िर हो जाओ और सब एक समान हो जाएं, तो देखों उनमें से किसी को मित्र न बनाना जब तक कि वे (तौबा करके) ईश्वर के मार्ग में हिजरत न करें। तो यदि उन्होंने इन्कार किया (और काफ़िरों से सहयोग करते रहे) तो वे जहां भी मिलें पकड़ कर उनकी हत्या कर दो और कभी भी उनमें से मित्र व सहायक न बनाना। (4:89) पिछले कार्यक्रमों में हमने यह बताया था कि कुछ भोले मुसलमानों ने मिथ्याचारियों को क्षमा करने की सिफ़ारिश करते हुए उनका समर्थन किया था। ये आयत कहती है कि मिथ्याचारी इतनी बुरी प्रवृत्ति के हैं कि ने केवल वे स्वंय काफ़िर हैं बल्कि तुम्हें भी अपनी ही भांति काफ़िर बनाना चाहते हैं। इनमें तुमसे मित्रता की योग्यता नहीं है और तुम्हें, इन लोगों को अपना मित्र नहीं बनाना चाहिए जब तक कि यह अपनी इस पद्धति को छोड़ न दें और कुफ़्र व मिथ्या के केन्द्र से, इस्लाम के केन्द्र की ओर पलायन न कर लें। और यदि इन्होंने ऐसा न किया तो जान लो कि इन्होंने कुफ़्र को नहीं छोड़ा है और चूंकि यह लोग इस्लाम के नाम से ग़लत लाभ उठा रहे हैं अतः यह तुम्हें जहां भी मिलें इन्हें बंदी बना लो और यदि आवश्यक हो तो इनकी हत्या कर दो। रोचक बात यह है कि क़ुरआन की दृष्टि में इस्लामी शासन में जीवन व्यतीत करने वाले यहूदी और ईसाई पूर्ण रूप से सम्मान और समर्थन के पात्र हैं और किसी को भी उनसे भिड़ने का अधिकार नहीं है, परन्तु इस्लाम के भेस में छिपे हुए मिथ्याचारी जो क्षति पहुंचाने के चक्कर में रहते हैं, सबसे बड़े दण्ड के पात्र हैं। इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्याचारियों के ख़तरों की ओर से निश्चेत रहना चाहिए और उनसे मित्रता नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे काफ़िर शत्रु से भी अधिक बुरे हैं। वास्तविक ईमान की निशानी, ईश्वर के मार्ग में हिजरत या पलायन है। जो धर्म के मार्ग में हिजरत के लिए तैयार नहीं है वह वास्वतिक मोमिन नहीं है। हर पाप की तौबा, उसी पाप की क्षतिपूर्ति करके होती है, हिजरत न करने की तौबा हिजरत न करना है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 90 की तिलावत सुनते हैं।إِلَّا الَّذِينَ يَصِلُونَ إِلَى قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ مِيثَاقٌ أَوْ جَاءُوكُمْ حَصِرَتْ صُدُورُهُمْ أَنْ يُقَاتِلُوكُمْ أَوْ يُقَاتِلُوا قَوْمَهُمْ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَسَلَّطَهُمْ عَلَيْكُمْ فَلَقَاتَلُوكُمْ فَإِنِ اعْتَزَلُوكُمْ فَلَمْ يُقَاتِلُوكُمْ وَأَلْقَوْا إِلَيْكُمُ السَّلَمَ فَمَا جَعَلَ اللَّهُ لَكُمْ عَلَيْهِمْ سَبِيلًا (90)सिवाए उन मिथ्याचारियों के जो किसी ऐसी जाति से मिल गए हैं, जिसके और तुम्हारे बीच कोई संधि है, या वे लोग जो तुम्हारे पास ऐसी दशा में आते हैं कि उनके सीने अर्थात हृदय तुमसे या अपनी जाति से युद्ध करने से तंग आ गए हों (और वे किसी से भी युद्ध करना न चाहते हों) और यदि ईश्वर चाहता तो उन्हें तुम्हारे ऊपर ला खड़ा करता और वे तुमसे युद्ध करते, तो यदि वे तुमसे अलग रहें और तुमसे युद्ध न करें और शांति का प्रस्ताव दें तो ईश्वर ने तुम्हारे लिए उनके ऊपर कोई मार्ग नहीं रखा है। (4:90) इस आयत ने मिथ्याचारियों के साथ कड़े बर्ताव में उनके दो गुटों को अपवाद बताया है। एक वह गुट जो मुसलमानों के साथ संधि करने वाली जातियों से संपर्क रखता है और उनसे संधि कर चुका है। और दूसरा वह गुट जो मूल रूप से युद्ध और लड़ाई से अलग हो गया है यहां तक कि शांति का प्रस्ताव भी देता है। स्पष्ट है कि पहला गुट संधि और समझौते के कारण अपवाद है जबकि दूसरे गुट ने चूंकि निष्पक्षता की घोषणा कर दी है, अतः उसे छेड़ना या दण्डित करना न्याय तथा साहस के विरुद्ध है। इस आयत से हमने सीखा कि अपने राजनैतिक या सैनिक समझौतों का सम्मान करना चाहिए, चाहे वह काफ़िर के साथ ही क्यों न हों, सिवाए इसके कि दूसरा पक्ष समझौतों का उल्लंघन कर दे। इस्लाम में जेहाद और संघर्ष प्रतिशोध या वरचस्व के लिए नहीं है। यदि शत्रु संधि या शांति समझौते को स्वीकार करके, युद्ध समाप्त कर दे तो किसी को भी उसपर चढ़ाई का अधिकार नहीं है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 91 की तिलावत सुनते हैं।سَتَجِدُونَ آَخَرِينَ يُرِيدُونَ أَنْ يَأْمَنُوكُمْ وَيَأْمَنُوا قَوْمَهُمْ كُلَّ مَا رُدُّوا إِلَى الْفِتْنَةِ أُرْكِسُوا فِيهَا فَإِنْ لَمْ يَعْتَزِلُوكُمْ وَيُلْقُوا إِلَيْكُمُ السَّلَمَ وَيَكُفُّوا أَيْدِيَهُمْ فَخُذُوهُمْ وَاقْتُلُوهُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوهُمْ وَأُولَئِكُمْ جَعَلْنَا لَكُمْ عَلَيْهِمْ سُلْطَانًا مُبِينًا (91)शीघ्र ही तुम मिथ्याचारियों के एक अन्य गुट को पाओगे जो (इस्लाम प्रकट करके) तुमसे भी सुरक्षित रहना चाहता है और (कुफ़्र व्यक्त करके) अपनी जाति से भी सुरक्षित रहना चाहता है। जब भी यह लोग बिगाड़ की ओर पलटते हैं तो उसमें औंधे मुंह गिर पड़ते हैं तो यदि यह तुमसे अलग न हों जाएं और तुम्हें शांति प्रस्ताव न दें तथा हाथ न रोकें तो इन्हें गिरफ़्तार कर लो और जहां पाओ इनकी हत्या कर दो और यही वह लोग हैं जिनपर हमने तुम्हें स्पष्ट प्रभुत्व दिया है। (4:91) मक्के के लोगों का एक गुट जब भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आता था तो वह मिथ्यापूर्ण ढंग से स्वयं को मुसलमान प्रकट करता था, परन्तु जब मक्के से पलटकर जाता तो मूर्तिपूजा करता और काफ़िरों के साथ होने की घोषणा करता था ताकि उसे उनकी ओर से यातनाएं न मिलें। इस प्रकार वो दोनों गुटों के हितों से लाभान्वित होता था और दोनों पक्षों के ख़तरों से सुरक्षित था। अलबत्ता हृदय से वह काफ़िरों के ही साथ था और मुसलमानों के विरुद्ध उनके षड्यंत्रों में शामिल रहता था। यह आयत आई और इसने इस गुट के प्रति कड़े व्यवहार का आदेश दिया क्योंकि इस प्रकार के लोग शत्रु के घुसपैठियों की भांति मुसलमानों के मोर्चे में हैं और इनका ख़तरा उन काफ़िरों से कहीं अधिक है जिन्होंने खुल्लम-खुल्ला युद्ध की घोषणा कर दी है। यह गुट उस गुट के विपरीत, जिनसे संधि का आदेश पिछली आयत में दिया गया है, अत्यंत धूर्त, षड्यंत्रकारी और धोखेबाज़ है जो न केवल यह कि निष्पक्षता की घोषणा नहीं करता बल्कि युद्ध की आग भी भड़काना है। इसी कारण इस गुट का दण्ड, उस गुट के दण्ड से अलग है, और इस गुट के लोग जहां मिलें उन्हें बंदी बना लेना चाहिए और प्रतिरोध की स्थिति में उनकी हत्या कर देनी चाहिए। इस आयत से हमने सीखा कि मुसलमानों को अपने विभिन्न प्रकार के शत्रुओं को पहचान कर हरएक के साथ उचित बर्ताव करना चाहिए। जो लोग इस्लामी सरकार का तख़्ता उलटना चाहते हैं या उसके विरुद्ध षड्यंत्र करते हैं, उनके साथ अत्यंत कड़ा और दमनकारी व्यवहार करना चाहिए। मिथ्याचारी की निशानी यह है कि वह अपने ईमान व आस्था की रक्षा के बजाए केवल जीवन के ऐश्वर्य और आराम के चक्कर में रहता है।