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    सूरए निसा; आयतें 92-94 (कार्यक्रम 143)

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    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 92 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ أَنْ يَقْتُلَ مُؤْمِنًا إِلَّا خَطَأً وَمَنْ قَتَلَ مُؤْمِنًا خَطَأً فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مُؤْمِنَةٍ وَدِيَةٌ مُسَلَّمَةٌ إِلَى أَهْلِهِ إِلَّا أَنْ يَصَّدَّقُوا فَإِنْ كَانَ مِنْ قَوْمٍ عَدُوٍّ لَكُمْ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مُؤْمِنَةٍ وَإِنْ كَانَ مِنْ قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ مِيثَاقٌ فَدِيَةٌ مُسَلَّمَةٌ إِلَى أَهْلِهِ وَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مُؤْمِنَةٍ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ تَوْبَةً مِنَ اللَّهِ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا (92)और किसी भी ईमान वाले को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे किसी ईमान वाले की हत्या कर दे, सिवाए इसके कि ग़लती से हो, और जिस किसी ने किसी ईमान वाले की ग़लती से हत्या कर दी हो तो उसे चाहिए कि वह एक ईमान वाला दास स्वतंत्र करे और मृतक के वारिसों को हर्जाना दे, सिवाए इसके कि मृतक के वारिस हरजाने को माफ़ कर दें। फिर यदि मृतक ऐसी जाति से है जो तुम्हारी शत्रु है परन्तु वह स्वयं ईमान वाला है तो केवल एक ईमान वाला दास स्वतंत्र करना चाहिए और यदि मृतक किसी ऐसी जाति का है जिससे तुम्हारी संधि है तो उसके वारिसों को हर्जाना देना होगा और एक ईमान वाला दास भी स्वतंत्र करना होगा। फिर यदि (स्वतंत्र करने के लिए दास या उसे ख़रीदने के लिए पैसा) न मिले तो निरंतर दो महीने तक रोज़ा रखना होगा। यही ईश्वर की ओर से तौबा का मार्ग है। और ईश्वर जानने वाला भी है और तत्वदर्शी भी। (4:92) इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि मक्के में वर्षो तक कुछ अनेकेश्वरवादियों की ओर से यातनाएं सहन करने वाले एक मुस्लिम व्यक्ति को मदीने पलायन के पश्चात, मदीना नगर में उनमें से एक व्यक्ति दिखाई दिया। इस बात से अनभिज्ञ कि वह भी मुसलमान हो चुका है, इस व्यक्ति ने उसकी यातनाएं देने वाले के रूप में हत्या कर दी। इस बात की सूचना जब हज़रत मुहम्मद सल्ललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को मिली तो ईश्वर की ओर से उनके पास वहि भेजी गई। जैसाकि हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि इस प्रकार के काफ़िर व अत्याचारी लोगों के संबंध में आदेश यह है कि उन्हें बंदी बना लिया जाए और यदि आवश्यक हो तो उनकी हत्या कर दी जाए परन्तु स्पष्ट है कि यह कार्य छानबीन के पश्चात और इस्लामी समाज के शासन की देख-रेख में होना चाहिए न यह कि हर कोई अपनी मर्ज़ी और विचार से किसी की भी हत्या कर दे। अतः उस मुस्लिम व्यक्ति का काम भी ग़लत था और उसे उसका दण्ड भुगतना होगा अर्थात हत्या का हर्जाना देना होगा। अलबत्ता कुछ विशेष आदेशों और परिस्थितियों के साथ जिनका वर्णन इस आयत में किया गया है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि मनुष्य के परिजन और वारिस, इस्लाम के शत्रु हों तो उनको हर्जाना नहीं दिया जाएगा ताकि शत्रु का आर्थिक आधार सुदृढ़ न होने पाए। हां यदि शत्रु ने मुसलमानों के साथ शांति की संधि कर रखी है तो एसी स्थिति में मृतक के वारिसों को हर्जाना दिया जाएगा। मृतक के वारिसों को हर्जाना दिये जाने के कई परिणाम हैं। उदाहरण स्वरूप हत्या के कारण उत्पन्न होने वाली आर्थिक कठिनाइयों की कुछ क्षतिपूर्ति हो जाती है। इसके अतिरिक्त लोगों की लापरवाही को रोकने का एक मार्ग है कि हर कोई यह न कर सके कि मैंने ग़लती से हत्या कर दी। इसी प्रकार से लोगों की जान और सामाजिक सुरक्षा के प्रति सम्मान को भी दर्शाता है। इस आयत से हमने सीखा कि लोगों का ख़ून बहाना, ईश्वर पर ईमान से मेल नहीं खाता और यदि कोई ग़लती से भी यह काम कर बैठे तो उसे भारी बदला चुकाना होगा। इस्लाम ने न केवल यह कि दास प्रथा का प्रचार नहीं किया बल्कि उसने दासों की स्वतंत्रता के लिए अनके मार्ग भी खोल रखे हैं। जैसाकि एक मनुष्य का जीवन छीनने के कारण हत्यारे को एक अन्य मनुष्य को दासता से स्वतंत्र करवाकर उसे नया जीवन देना चाहिए। इस्लाम में केवल उपासना के ही आदेश नहीं हैं बल्कि उसमे समय के सही संचालन और न्याय व सुरक्षा की स्थापना के लिए दण्ड और हर्जाने के क़ानून भी हैं, जिनका एक उदाहरण इस आयत में वर्णित आदेश है। आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 93 की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ يَقْتُلْ مُؤْمِنًا مُتَعَمِّدًا فَجَزَاؤُهُ جَهَنَّمُ خَالِدًا فِيهَا وَغَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِ وَلَعَنَهُ وَأَعَدَّ لَهُ عَذَابًا عَظِيمًا (93)और जिस किसी ने जान-बूझ कर किसी ईमान वाले की हत्या की, उसका बदला नरक हैं जिसमें वह सदैव रहेगा। ईश्वर उस पर कोप और लानत करता है तथा उसने ऐसे व्यक्ति के लिए अत्यंत कड़ा दण्ड तैयार कर रखा है। (4:93)इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि ओहद के युद्ध में एक मुसलमान ने निजी शत्रुता के चलते दूसरे मुसलमान व्यक्ति की हत्या कर दी थी। ईश्वर के विशेष संदेश वहि द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम सल्ललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को इस बात का पता चल गया और ओहद से वापसी के मार्ग में उन्होंने हत्यारे को मृत्युदण्ड देने का आदेश दिया और उसकी क्षमायाचना पर कोई ध्यान नहीं दिया। पिछली आयत में ग़लती से की गई हत्या के आदेश के वर्णन के पश्चात यह आयत जान-बूझ कर की गई हत्या के बदले का उल्लेख करती है कि हत्यारा ईश्वरीय कोप का पात्र बनकर सदा के लिए नरक की आग में चला जाता है। अलबत्ता, इस अपराध का सांसारिक दण्ड क़ेसास अर्थात मृत्युदण्ड है जो दूसरी आयतों में वर्णित है और उनका उल्लेख हम पहले कर आए हैं। इस आयत से हमने यह सीखा कि अपराधियों को दण्डित करने में ग़लती से अपराध करने वालों और जान बूझकर अपराध करने वालों में अंतर है। समाज में बुराई तथा अशान्ति को रोकने का एक मार्ग, अपराधों पर कड़े दण्ड देने के क़ानून बनाना है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 94 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِذَا ضَرَبْتُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَتَبَيَّنُوا وَلَا تَقُولُوا لِمَنْ أَلْقَى إِلَيْكُمُ السَّلَامَ لَسْتَ مُؤْمِنًا تَبْتَغُونَ عَرَضَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا فَعِنْدَ اللَّهِ مَغَانِمُ كَثِيرَةٌ كَذَلِكَ كُنْتُمْ مِنْ قَبْلُ فَمَنَّ اللَّهُ عَلَيْكُمْ فَتَبَيَّنُوا إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا (94)हे ईमान वालो! जब तुम ईश्वर के मार्ग में (जेहाद के लिए) क़दम उठाओ तो (शत्रु के बारे में पूर्णतः) जांच-पड़ताल कर लो और जो तुम्हारे समक्ष इस्लाम प्रकट करे उससे मत कहो कि तू ईमान वाला नहीं है कि इस प्रकार तुम सांसारिक जीवन की थोड़ी सी पूंजी प्राप्त करना चाहते हो जबकि ईश्वर के पास अत्यधिक लाभ है। (आख़िर) तुम भी तो पहले ऐसे ही काफ़िर थे तो ईश्वर ने तुम पर उपकार किया (कि तुम्हारे इस्लाम को स्वीकार कर लिया) तो तुम (कार्यवाही से पहले) जांच करो कि तुम जो कुछ करते हो, ईश्वर उससे अवगत है। (4:94) इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि मुसलमानों तथा मदीने के समीपवर्ती यहूदियों के बीच होने वाले ख़ैबर नामक युद्ध के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कुछ मुसलमानों को क्षेत्र के एक देहात में भेजा ताकि वे वहां के लोगों को इस्लाम या इस्लामी सरकार को स्वीकार करने का निमंत्रण दें। इस्लामी सेना के आगमन का समाचार पाकर एक यहूदी अपनी संपत्ति और परिवार को एक पहाड़ के समीप छोड़कर मुसलमानों के स्वागत के लिए आया। एक मुसलमान ने यह सोचकर कि वह भय के कारण इस्लाम स्वीकार कर रहा है उसकी हत्या कर दी और उसकी संपत्ति पर क़ब्ज़ा कर लिया। उसी समय यह आयत उतरी और इसने उस मुसलमान के ग़लत कार्य की निंदा की और आदेश दिया कि इस्लाम में हथियार उठाने का लक्ष्य सांसारिक धन या माल की प्राप्ति नहीं है बल्कि वास्तविक लक्ष्य इस्लाम का निमंत्रण देना या मुसलमानों और काफ़िरों के बीच शांति एवं सुरक्षा स्थापित करना है। इस आयत से हमने सीखा कि युद्ध और जेहाद, शत्रु के उद्देश्यों और स्थिति की पूरी जानकारी और सूचना के आधार पर होना चाहिए न कि भावनाओं, संसारमोह या धन प्राप्ति के लिए। जो लोग इस्लाम व्यक्त करते हैं उनका खुले दिल से स्वागत करना चाहिए, सिवाए इसके कि उनका झूठ या धोखा सिद्ध हो जाए। सत्ता में आने के पश्चात अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और अकारण ही विरोधी लोगों की संपत्ति ज़ब्त करने या उनकी हत्या का आदेश नहीं देना चाहिए। संसार मोह का ख़तरा उन लोगों के लिए भी मौजूद है जो अपनी जान पर खेलकर युद्ध के अग्रिम मोर्चे पर जाते हैं अतः अपनी भावनाओं और प्रेरणाओं का ध्यान रखना चाहिए। दूसरों के बारे में बुरे विचार नहीं रखने चाहिए। उनकी बातों को आंख मूंदकर मान भी नहीं लेना चाहिए। हर स्थिति में संतुलन और उदारवाद का पालन करना चाहिए, चाहे सामने वाला हमारा शत्रु ही क्यों न हो।