islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए निसा; आयतें 95-99 (कार्यक्रम 144)

    सूरए निसा; आयतें 95-99 (कार्यक्रम 144)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए निसा की आयत संख्या 95 और 96 की तिलावत सुनते हैं।لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ وَالْمُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ فَضَّلَ اللَّهُ الْمُجَاهِدِينَ بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ عَلَى الْقَاعِدِينَ دَرَجَةً وَكُلًّا وَعَدَ اللَّهُ الْحُسْنَى وَفَضَّلَ اللَّهُ الْمُجَاهِدِينَ عَلَى الْقَاعِدِينَ أَجْرًا عَظِيمًا (95) دَرَجَاتٍ مِنْهُ وَمَغْفِرَةً وَرَحْمَةً وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِيمًا (96)शारीरिक रूप से अपंग लोगों के अतिरिक्त जो ईमान वाले जेहाद के लिए नहीं जाते और घर में बैठे रहते हैं वे कदापि उन लोगों के समान नहीं हो सकते जो ईश्वर के मार्ग में अपनी जान औन अपने माल से जेहाद करते हैं। निःसन्देह, ईश्वर ने अपने माल तथा अपनी जान से जेहाद करने वालों को बैठे रहने वालों पर श्रेष्ठता के दर्जे दिये हैं यद्यपि ईश्वर ने हर एक (मोमिन) से भले बदले का वादा किया है और ईश्वर ने जेहाद करने वालों को बैठ रहने वालों के मुक़ाबले में महान बदला दिया है।(4:95) ईश्वर की ओर से मिलने वाले दरजों तथा उसकी ओर से क्षमा व दया के साथ बड़ा बदला है और निःसन्देह, ईश्वर अतयंत क्षमाशील और दयावान है। (4:96) पिछली आयतों में ईश्वर, ईमान वालों को शत्रुओं के संबंध में हर प्रकार की जल्दबाज़ी से रोकने के पश्चात इस आयत में उन्हें शत्रु के साथ जेहाद के मैदान में व्यापक और सक्रिय उपस्थिति का आहृवान करता है तथा डरपोक या आराम पसंद मोमिनों को प्रोत्साहित करने के लिए आरंभ में कहता है कि मोर्चों पर लड़ने वाले मुजाहिदों तथा घर में बैठ कर केवल नमाज़ व प्रार्थना करने वालों का स्थान एक नहीं है। फिर वह कहता है कि जेहाद करने वालों के लिए श्रेष्ठ दर्जे हैं तथा आयत के अंत में ईश्वर कहता है कि न केवल श्रेष्ठ दर्जे बल्कि अत्यंत महान बदला और पारितोषिका भी उनकी प्रतीक्षा में है जो ईश्वर की विशेष दया व कृपा के साथ होगा। अलबत्ता यहां पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि ईश्वर किसी भी मनुष्य पर इसके सामर्थ्य व क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालता अतः जिन लोगों के साथ कोई शारीरिक समस्या है उन्हें रणक्षेत्र न जाने की छूट है और यदि वे अपने धन या ज़बान से मुजाहिदों का दें तो वे भी उनके बदले व पारितोषिक में शामिल होंगे। यद्यपि इस आयत में तीन बार, घर बैठे रहने वालों पर जेहाद करने वालों की श्रेष्ठता की घोषणा की गई है परन्तु इसका अर्थ अन्य लोगों की सेवाओं की उपेक्षा नहीं है, इसी कारण आयत बल देकर कहती है कि ईश्वर ने सभी ईमान वालों से भले बदले का वादा किया है। जेहाद करने वालों की श्रेष्ठता अपने स्थान पर, किंतु अन्य लोगों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लामी समाज में न्याय का अर्थ सभी ईमान वालों को समान समझना नहीं है बल्कि जेहाद में उपस्थिति जैसी मान्यताएं श्रेष्ठता का मानदण्ड हैं तथा अधिकारियों और जनता को इनका पालन करना चाहिए। अलबत्ता मुजाहिदों को भी अनुचित आशाएं नहीं रखनी चाहिए। ईश्वरीय दया व कृपा से लाभान्वित होने की शर्त पवित्र होना और पवित्र रहना है। ईश्वर ने पहले क्षमा की बात कही है फिर दया व कृपा की बात। यद्यपि ईश्वर क्षमाशील और दयावान है परन्तु उसकी क्षमा और दया से लाभान्वित होना स्वयं मनुष्य के हाथों में और उसके कर्मों पर निर्भर है।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 97 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ تَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ ظَالِمِي أَنْفُسِهِمْ قَالُوا فِيمَ كُنْتُمْ قَالُوا كُنَّا مُسْتَضْعَفِينَ فِي الْأَرْضِ قَالُوا أَلَمْ تَكُنْ أَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةً فَتُهَاجِرُوا فِيهَا فَأُولَئِكَ مَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ وَسَاءَتْ مَصِيرًا (97)जिन लोगों ने अपने आप पर अत्याचार किया जब फ़रिश्ते उनकी जान लेते हैं तो उनसे पूछते हैं, तुम किस स्थिति में थे? वे कहते हैं, हमें अपनी धरती में कमज़ोर बना दिया गया था। फ़रिश्ते उनसे कहेंगे, क्या ईश्वर की धरती फैली हुई और व्यापक नहीं थी कि तुम उसमें पलायन कर जाते? निःसन्देह, ऐसे लोगों का ठिकाना नरक है और वह कितना बुरा ठिकाना है! (4:97) इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि मक्के में रहने वाले कुछ मुसलमान अपनी जान के भय से कभी-कभी काफ़िरों का साथ देते थे यहां तक कि कुछ युद्धों में काफ़िरों की ओर से मुसलमानों के विरुद्ध लड़ते थे और मारे जाते थे। ईश्वर ने यह आयत भेजकर उन्हें ग़लती पर और पापी बताया। आयत में शत्रु के सहयोग के लिए राष्ट्रीयता की भावना के औचित्य को भी अस्वीकार्य बताते हुए धर्म की रक्षा को मूल आधार कहा गया है चाहे उसके लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पलायन ही करना पड़े। यहां पर रोचक बात यह है कि इस आयत के अनुसार मृत्यु के समय मनुष्य, ईश्वर के फ़रिश्तों को देखता है और वे मनुष्य से बातें करते हैं तथा बुरे कर्मों पर उसकी आलोचना करते हैं। इस आयत से हमने सीखा कि न केवल ईश्वर बल्कि फ़रिश्ते भी मनुष्य के कर्मों से अवगत हैं। कुफ़्र व पाप के वातावरण में पलायन, अनिवार्य व आवश्यक है जैसाकि कुफ़्र की सेना का भाग बनाना वर्जित है। जीवन का मूल सिद्धांत ईश्वर प्रेम है न कि देशप्रेम। ग़लत वातावरण को या तो परिवर्तित कर देना चाहिए या फिर वहां से पलायन कर जाना चाहिए।आइए अब सूरए निसा की आयत संख्या 98 और 99 की तिलावत सुनते हैं।إِلَّا الْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَاءِ وَالْوِلْدَانِ لَا يَسْتَطِيعُونَ حِيلَةً وَلَا يَهْتَدُونَ سَبِيلًا (98) فَأُولَئِكَ عَسَى اللَّهُ أَنْ يَعْفُوَ عَنْهُمْ وَكَانَ اللَّهُ عَفُوًّا غَفُورًا (99)सिवाए उन कमज़ोर महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के, जिनके अधिकार में कोई युक्ति न थी और न वे अपनी मुक्ति का कोई मार्ग निकाल सकते थे। (4:98) तो यही लोग हैं जिन्हें ईश्वर क्षमा कर देगा कि वह अत्यंत क्षमाशील और दयावान वाला है। (4:99) पिछली आयत में धर्म की रक्षा के लिए हिजरत या पलायन को आवश्यक बताने के पश्चात इस आयत में ईश्वर, उन ईमान वालों को अपवाद बताता है जिनमें पलायन की क्षमता न हो और जिन्हें अपनी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं मिल रहा हो। ईश्वर एसे लोगों पर एसा कोई दायित्व नहीं डालता जिसमें वे सक्षम न हों। मूल रूप से इस्लाम में धार्मिक आदेशों के पालन की शर्त सामर्थ्य है और क्षमता। और जिन लोगों में शारीरिक या मानसिक क्षमता नहीं होती उनपर ईश्वरीय दायित्व लागू नहीं होते, जैसाकि इस आयत में ऐसे पुरुषों और महिलाओं को बच्चों की श्रेणी में रखा गया है और उन्हें कमज़ोर बताया गया है। इन आयतों से हमने सीखा कि हिजरत या पलायन केवल पुरूषों के लिए नहीं है बल्कि परिवार के सभी सदस्यों के लिए है, चाहे वे महिलाएं हों या बच्चे आवश्यक है। सिवाए इसके कि उनमें क्षमता ही न हो। ईश्वर के दरबार में वास्तविक औचित्य स्वीकार है न कि झूठे बहाने।