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    सूरए निसा; आयत 34 (कार्यक्रम 127)

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    आइये पहले सूरए निसा की 34वीं आयत की तिलावत सुनें।الرِّجَالُ قَوَّامُونَ عَلَى النِّسَاءِ بِمَا فَضَّلَ اللَّهُ بَعْضَهُمْ عَلَى بَعْضٍ وَبِمَا أَنْفَقُوا مِنْ أَمْوَالِهِمْ فَالصَّالِحَاتُ قَانِتَاتٌ حَافِظَاتٌ لِلْغَيْبِ بِمَا حَفِظَ اللَّهُ وَاللَّاتِي تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ وَاضْرِبُوهُنَّ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلَا تَبْغُوا عَلَيْهِنَّ سَبِيلًا إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلِيًّا كَبِيرًا (34)पुरुष, महिलाओं के अभिभावक हैं इस दृष्टि से कि ईश्वर ने कुछ को कुछ अन्य पर वरीयता दी है और इस दृष्टि से कि पुरुष अपने माल में से महिलाओं का ख़र्च देते हैं। तो भली महिलाएं वही हैं जो पति का आज्ञापालन करने वाली तथा उसकी अनुपस्थिति में उसके रहस्यों की रक्षा करने वाली होती हैं कि ईश्वर रहस्यों की रक्षा करता है और हे पुरुषो! तुम्हें जिन महिलाओं की अवज्ञा का भय हो उन्हें आरंभ में समझा दो, फिर उन्हें बिस्तर में अकेला छोड़ दो और यदि फिर भी उन पर प्रभाव न हो तो उन्हें मारो फिर यदि वे तुम्हारी बात मानने लगें तो उनके विरुद्ध ज़ियादती का कोई मार्ग मत खोजो। नि:संदेह ईश्वर अत्यंत महान और सबसे उच्च है। (4:34)इस आयत से, जो पारिवारिक संबंधों और पति पत्नी के मामले में क़ुरआन की सबसे महत्वपूर्ण आयतों में से एक है, अज्ञानी धार्मिकों या अधर्मी शत्रुओं ने क़ुरआन मजीद की अनेक अन्य आयतों की भांति ग़लत लाभ उठाया है। कुछ अज्ञानी व धर्मांधी पुरुष क़ुरआन की इस आयत को उद्धरित करके स्वयं को मालिक और पत्नी को दासी के समान समझते हैं जिसे आंख बंद करके अपने पति का आज्ञा पालन करना चाहिये तथा उसकी कोई अपनी मर्ज़ी नहीं होनी चाहिये। मानो हर बात में पति का आदेश ईश्वरीय आदेश है और यदि पत्नी उसकी अवहेलना करती है तो अत्यंत कड़े दण्ड का पात्र बन जाती है।यही ग़लत व अनुचित धारणा व व्यवहार इस बात का कारण बना है कि कुछ अज्ञानी शत्रु उपहास व तुच्छता का व्यवहार करते हुए क़ुरआन व इस्लाम पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दें तथा इस आयत को महिला अधिकारों की विरोधी बतायें जबकि उन लोगों ने इस आयत के अर्थ और व्याख्या पर ध्यान नहीं दिया है बल्कि अपनी समझ के हिसाब से इसका अर्थ निकाला है। इस आयत को पूर्ण रूप से स्पष्ट करने के लिए हम इसके दो भाग करके हर भाग के बारे में विस्तार से बतायेंगे।आयत का पहला भाग पुरुषों को महिलाओं के मामलों की देख-भाल करने वाला बताता है। आजकल समाज शास्त्र में परिवार को समाज की सबसे पहली और मूल इकाई माना जाता है जिसका मूल महत्व होता है। हर परिवार एक स्त्री और पुरुष के बीच विवाह के समझौते से अस्तित्व में आता है और बच्चों के जन्म से उसमें विस्तार होता है। बहुत ही स्पष्ट सी बात है कि इस छोटी सी इकाई को अपने विभिन्न मामलों के संचालन के लिए एक अभिभावक की आवश्यकता है अन्यथा इसमें अराजकता फैल जायेगी। जैसा कि किसी छात्रावास में रहने वाले छात्र यदि अपने में से ही किसी को वार्डन न बना लें तो वहां की व्यवस्था भंग हो जायेगी।इस आधार पर परिवार का काम चलाने के लिए अभिभावक के रूप में किसी का निर्धारण एक अपरिहार्य बात है और स्पष्ट सी बात है कि बच्चे अपने परिवार और माता-पिता के मामलों का संचालन नहीं कर सकते। क़ुरआन मजीद दो कारणों से पति और पत्नी के बीच पति को परिवार का अभिभावक घोषित करता है प्रथम तो यह कि पुरुष शारीरिक दृष्टि से महिलाओं से अधिक सशक्त होते हैं अत: उनमें काम काज की अधिक क्षमता होती है और दूसरे यह कि जीवन के सभी खर्चों की पूर्ति का दायित्व पुरुषों पर है जैसे आहार, वस्त्र, आवास आदि। जबकि इस्लाम की दृष्टि से महिलाओं पर जीवन के किसी ख़र्च की आपूर्ति का कोई दायित्व नहीं है। यहां तक कि यदि उसके पास कमाई का साधन हो तब भी। दूसरे शब्दों में इस्लाम ने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति और उसके आराम का ध्यान रखने के भारी दायित्व के बदले में परिवार के मामलों का अधिकार पुरुष को सौंपा है और इस संबंध में उसके पास उत्तरदायित्व है न कि शासन और ज़ोर ज़बरदस्ती का अधिकार और उसके उत्तरदायित्व की सीमा परिवार के मामलों के संचालन तक है न कि अपने काम कराने के लिए पत्नी को दासी बनाने और उस पर अत्याचार करने में। अत: जब भी पुरुष अपने दायित्वों का उल्लंघन करे और अपनी पत्नी का ख़र्चा न दे और पत्नी तथा बच्चों का जीना हराम कर दे तो पत्नी की इच्छा से धर्मगुरू इसमें हस्तक्षेप कर सकता है और आवश्यकता पड़ने पर वह पुरुष को अपने दायित्वों के निर्वाह के लिए प्रतिबद्ध कर सकता है। संक्षिप्त रूप से कहें कि इस बात पर ध्यान रखना चाहिये कि परिवार में पुरुष के संचालन का अधिकार कदापि पत्नी पर उसकी श्रेष्ठता के अर्थ में नहीं है बल्कि श्रेष्ठता का मानदण्ड ईमान और पवित्रता है। आयत के दूसरे भाग में महिलाओं के दो गुटों की ओर संकेत किया गया है। प्रथम वह भलि महिलाएं जो पारिवारिक व्यवस्था के प्रति कटिबद्ध हैं और न केवल पति की उपस्थिति में बल्कि उसकी अनुपस्थिति में भी उसके व्यक्तित्व, रहस्यों और अधिकारों की रक्षा करती हैं। ऐसी महिलाएं सराहनीय हैं।दूसरा गुट ऐसी महिलाओं का है जो दाम्पत्य जीवन के संबंध में पति का आज्ञापालन नहीं करतीं। इनके बारे में क़ुरआन कहता है कि यदि तुम्हें इनकी ओर से अवज्ञा का भय हो तो पहले उन्हें समझाओ, बुझाओ और यदि इसका प्रभाव न हो तो कुछ समय तक उनसे नाराज़ रहो और दाम्पत्य जीवन में उनकी अनदेखी और उपेक्षा करके अपनी नाराज़गी व्यक्त करो परंतु यदि पत्नी फिर भी अपने दाम्पत्य संबंधी दायित्वों का निर्वाह न करे और कड़ाई के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग न बचे तो पति को अनुमति दी गई है कि वह अपनी पत्नी को शारीरिक दंड दे। इस प्रकार से कि उसे अपनी ग़लती का आभास हो जाये।ये तीनों चरण पत्नी द्वारा दाम्पत्य जीवन में पति के अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर है। कभी पत्नी द्वारा पति की इच्छा की अवज्ञा केवल बात की सीमा तक होती है कि ऐसे में उसे ज़बान से समझाना चाहिये। कभी पत्नी द्वारा पति की इच्छा का विरोध व्यवहारिक होता है ऐसे में पति को भी उसके साथ व्यवहारिक बर्ताव करना चाहिये तथा उसके साथ एक बिस्तर पर नहीं सोना चाहिये परंतु कभी-कभी पत्नी की अवज्ञा सीमा से बढ़ जाती है, ऐसी अवस्था में उसे शारीरिक दण्ड देना चाहिये।स्पष्ट है कि यदि पति भी अपने दायित्वों का निर्वाह न करे तो धर्मगुरू या न्यायाधीश उस पर मुक़द्दमा चलाएगा और आवश्यक होने पर उसे दंडित भी करेगा क्योंकि पत्नी का ख़र्चा न देना एक अदालती व दीवानी मामला है और इसे न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है परंतु चूंकि पति और पत्नी के निकट संबंध गोपनीय तथा पारिवारिक हैं अत: इस्लाम इस बात को प्राथमिकता देता है कि यथासंभव उनका मामला घर में सुलझ जाये और बात घर से बाहर न जाने पाये। इसी कारण इस मामले में शिकायत रखने वाला पति आवश्यक क़दम उठा सकता है ताकि परिवार की इज़्ज़त बची रहे। अलबत्ता शारीरिक दंड, जैसाकि हमने बताया, बहुत कड़ा नहीं होना चाहिये जिससे शरीर का कोई भाग टूट-फूट जाये कि ऐसी स्थिति में पुरुष को उसका तावान देना होगा।यदि इस्लाम के इस क़ानून पर गहन विचार करें तो हमें पता चलेगा कि इस्लाम बड़े ही अच्छे और सूक्ष्म ढंग से तथा क्रमश: परिवार को बर्बादी तथा विघटन के ख़तरे से मुक्ति दिलाता है।इस आयत से हमने सीखा कि दो लोगों के एक समूह में भी एक व्यक्ति का उत्तरदायी के रूप में चयन होना चाहिये तथा जीवन के ख़र्चों की पूर्ति करना जिस व्यक्ति के ज़िम्मे हो उसे इसमें प्राथमिकता प्राप्त है।पत्नी द्वारा पति का आज्ञापालन कमज़ोरी की निशानी नहीं है बल्कि यह परिवार के सम्मान और उसकी सुरक्षा के लिए है।