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    सूरए नूर, आयतें 1-5, (कार्यक्रम 625)

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    आइये सूरए नूर की पहली आयत की तिलावत सुनें।
    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ سُورَةٌ أَنْزَلْنَاهَا وَفَرَضْنَاهَا وَأَنْزَلْنَا فِيهَا آَيَاتٍ بَيِّنَاتٍ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ (1)
    अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। यह एक सूरा है, जिसे हमने उतारा है और इस (के आदेशों के पालन) को अनिवार्य किया है, और हमने इसमें स्पष्ट आयतें उतारी हैं कि शायद तुम शिक्षा प्राप्त करो। (24:1)

    क़ुरआने मजीद के चौबीसवें सूरे अर्थात सूरए नूर की चौंसठ आयतें हैं और यह मदीना नगर में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर उतारा गया। इस सूरे की पैंतीसवीं आयत में ईश्वर को आकाशों व धरती का नूर अर्थात प्रकाश बताया गया है और इसी लिए इस सूरे का नाम नूर रखा गया है। इस सूरे की पैंतीसवीं आयत तक ईमान वालों को विवाह करने, गृहस्ती बसाने, नैतिक पवित्रता, अवैध संबंधों से दूरी और इसी प्रकार की बातों की सिफ़ारिश की गई है।
    इसके बाद के भाग में ईश्वर की पहचान के बारे में धार्मिक शिक्षाओं, ईश्वरीय पैग़म्बरों के अनुसरण, भले लोगों के शासन की स्थापना, कुछ पारिवारिक मामलों और इसी प्रकार की कुछ अन्य बातों का उल्लेख किया गया है। यद्यपि क़ुरआने मजीद के सभी सूरे और आयतें, ईश्वर की ओर से ही आई हैं किंतु इस सूरे के आरंभ में इस बात को याद दिलाए जाने से उन आयतों और बातों के महत्व का पता चलता है जो सूरए नूर में वर्णित हैं। इनमें से कुछ बातें एकेश्वरवाद से संबंधित हैं जबकि कुछ अन्य पारिवारिक और सामाजिक संबंधों के बारे में ईमान वाले पुरुषों व महिलाओं से संबंधित हैं।
    स्वाभाविक है कि ईश्वर पर ईमान की सुदृढ़ता, सामाजिक स्तर पर पथभ्रष्ट व्यवहार में कमी का मार्ग प्रशस्त करती है और जीवन के मामलों में सुधार का कारण बनती है।
    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद, मुसलमानों के क़ानून की किताब है और उसके आदेशों व शिक्षाओं का पालन अनिवार्य है।
    क़ुरआनी शिक्षाएं, निश्चेतना के पर्दों को हटा देती हैं और मनुष्य को उन बातों की याद दिलाती हैं जो उसकी बुद्धि व प्रवृत्ति के अनुकूल होती हैं।
    आइये अब सूरए नूर की दूसरी और तीसरी आयतों की तिलावत सुनें।
    الزَّانِيَةُ وَالزَّانِي فَاجْلِدُوا كُلَّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا مِئَةَ جَلْدَةٍ وَلَا تَأْخُذْكُمْ بِهِمَا رَأْفَةٌ فِي دِينِ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَائِفَةٌ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ (2) الزَّانِي لَا يَنْكِحُ إلَّا زَانِيَةً أَوْ مُشْرِكَةً وَالزَّانِيَةُ لَا يَنْكِحُهَا إِلَّا زَانٍ أَوْ مُشْرِكٌ وَحُرِّمَ ذَلِكَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ (3)
    व्यभिचारी महिला और व्यभिचारी पुरुष दोनों में से प्रत्येक को सौ कोड़े मारो और यदि तुम ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखते हो तो अल्लाह के धर्म (के क़ानून) के पालन में तुम्हें उन पर तरस न आए। और उन्हें दंड देते समय मोमिनों में से कुछ लोग उपस्थित रहें। (24:2) व्यभिचारी पुरुष किसी व्यभिचारी स्त्री या अनेकेश्वरवादी स्त्री से ही निकाह करे और (इसी प्रकार) व्यभिचारी महिला, किसी व्यभिचारी या अनेकेश्वरवादी पुरुष से ही विवाह करे और (उनसे) यह (विवाह) ईमान वालों के लिए वर्जित है। (24:3)

    इस्लाम में दंड व पारितोषिक का आधार प्रलय है और सभी को उनके कर्मों का बदला प्रलय में ही दिया जाएगा किंतु ईश्वर ने समाज को पथभ्रष्टताओं व बुराइयों से सुरक्षित रखने हेतु संसार में भी अपराधियों के लिए कुछ दंड निर्धारित कर रखे हैं ताकि समाज में बुराइयों व अराजकता को फैलने से रोका जा सके। इन आदेशों में हत्यारे की जान लेना और चोर की उंगलियां काटना इत्यादि शामिल हैं।
    ये आयतें उन लोगों को, जो अवैध यौन संबंधों से दूषित हो चुके हैं, सचेत करती है कि यद्यपि इस अपराध पर उनको प्रलय में दंड दिया जाएगा किंतु ईश्वर ने आदेश दिया है कि इस संसार में भी लोगों के सामने उन्हें कड़ा दंड दिया जाए ताकि अन्य लोगों के लिए पाठ रहे।
    अलबत्ता जब तक पाप खुल कर सामने नहीं आ जाता तब तक ईश्वर किसी की बदनामी का इच्छुक नहीं है और वह किसी की टोह में रहने की भी अनुमति नहीं देता किंतु उन लोगों को, जिन्हें अवैध संबंधों पर किसी प्रकार की शर्म नहीं आती, दंडित न किया जाए तो फिर वे समाज में बुराई और अनैतिकता फैलाने लगते हैं। यही कारण है कि ईश्वर ने इस प्रकार के लोगों के लिए कड़ा दंड निर्धारित किया है ताकि यह दंड उनके लिए भी और अन्य लोगों के लिए भी पाठ बन जाए।
    आगे चल कर आयतों में व्यभिचारी पुरुषों व स्त्रियों से भले व पवित्र पुरुषों व महिलाओं के विवाह से रोका गया है। इसका कारण यह है कि पवित्र लोग, व्यभिचारी लोगों की संगत से पथभ्रष्ट और पापों से दूषित हो सकते हैं। एक अन्य कारण यह है कि अवैध संबंधों के कारण अस्तित्व में आने वाले विभिन्न रोगों को समाज में फैलने से रोका जा सके।
    इस बात पर ध्यान रहना चाहिए कि इस आयत में व्यभिचारियों को जो सौ कोड़े मारने का आदेश है वह उन महिलाओं व पुरुषों के लिए है जिनके पति अथवा पत्नी नहीं हैं अन्यथा पति या पत्नी होने के बावजूद व्यभिचार करने वालों को मृत्युदंड देने का आदेश है। जिस प्रकार से कि कोई किसी से बलात्कार करे या अपने निकट परिजन से अवैध संबंध स्थापित करे तो उसे भी मृत्युदंड दिया जाता है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लाम की दृष्टि में अवैध यौन संबंध, बहुत बड़ा पाप है जिसकी सज़ा मृत्युदंड भी हो सकती है।
    समाज में अनैतिकता, अश्लीलता व व्यभिचार का प्रचार करने वालों को कड़ा दंड दिया जाना चाहिए और इस संबंध में दया व कृपा की भावनाओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
    अपराधी को दिया जाने वाला दंड उसे पाठ सिखाने और समाज में सार्वजनिक पवित्रता की रक्षा के लिए होता है।
    व्यभिचार, किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराने के समान है और मनुष्य को ईमान के मार्ग से हटा देता है।
    पति या पत्नी के चयन में उसकी नैतिक पवित्रता मूल शर्तों में से एक है।
    आइये अब सूरए नूर की चौथी और पांचवीं आयतों की तिलावत सुनें।
    وَالَّذِينَ يَرْمُونَ الْمُحْصَنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَأْتُوا بِأَرْبَعَةِ شُهَدَاءَ فَاجْلِدُوهُمْ ثَمَانِينَ جَلْدَةً وَلَا تَقْبَلُوا لَهُمْ شَهَادَةً أَبَدًا وَأُولَئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ (4) إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ وَأَصْلَحُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (5)
    और जो लोग पतिव्रता महिलाओं पर (व्यभिचार का) लांछन लगाएँ, (और) फिर चार गवाह (भी) न लाएँ, तो उन्हें अस्सी कोड़े मारो और उनकी गवाही कभी भी स्वीकार न करो कि यही लोग वास्तविक अवज्ञाकारी हैं। (24:4) सिवाय उन लोगों के जो इसके पश्चात तौबा कर लें और (अपने आपको) सुधार लें। तो निश्चित रूप से ईश्वर अत्यंत क्षमाशील वदयावान है। (24:5)

    व्यभिचारी पुरुषों व महिलाओं को दिए जाने वाले दंड के उल्लेख के बाद संभव था कि यह आदेश कुछ लोगों के हाथों बहाना बन जाए और वे लोगों के निजी जीवन में खोज-बीन करते तथा केवल कल्पना व पूर्वाग्रह के आधार पर पवित्र महिलाओं व पुरुषों पर व्यभिचार का आरोप लगाते, इसी लिए ये आयतें, इस आदेश का दुरुपयोग करके दूसरों पर व्यभिचार का लांछन लगाने वालों के लिए कड़े दंड का उल्लेख करती हैं। इन आयतों में कहा गया है कि इस प्रकार के आरोप को सिद्ध करने के लिए ऐसे चार लोगों की गवाही आवश्यक है जिनका न्यायवादी होना सिद्ध हो अन्यथा आरोप लगाने वाले लोगों को अस्सी कोड़े लगाए जाएंगे।
    कुल मिला कर यह कि इस प्रकार के लोगों की बातें मूल्यहीन हैं और भविष्य में भी किसी भी मामले में उनकी गवाही स्वीकार नहीं की जाएगी सिवाय यह कि वे अपने बुरे कर्म को छोड़ दें, ईश्वर के समक्ष तौबा करें और अतीत के पापों का प्रायश्चित करें।
    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से पूछा गया कि हत्या की गवाही के लिए दो लोग ही काफ़ी हैं किंतु व्यभिचार की गवाही के लिए चार लोगों की आवश्यकता क्यों है? तो उन्होंने कहा कि हत्या का गवाह, एक व्यक्ति को दंडित करने के लिए गवाही देता है जबकि व्यभिचार का गवाह दो लोगों अर्थात व्यभिचारी महिला व पुरुष को दंडित करने के लिए गवाही देता है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि पतिव्रता महिलाओं पर लांछन लगाने का अधिक कड़ा दंड है।

    पवित्र लोगों पर व्यभिचार का आरोप लगाने वाले का दंड अर्थात अस्सी कोड़े, व्यभिचारी को दिए जाने वाले दंड अर्थात सौ कोड़े से बहुत कम नहीं है।
    ईश्वर के निकट लोगों का सम्मान इतना मूल्यवान है कि जब तक किसी की नैतिक बुराई के चार गवाह न हों, ईश्वर तीन लोगों को उसके पाप को सामने लाने की अनुमति नहीं देता बल्कि स्वयं इन लोगों को दंडित करने का आदेश देता है।

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