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    सूरए नूर, आयतें 15-20, (कार्यक्रम 627)

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    आइये पहले सूरए नूर की आयत क्रमांक 15 और 16 की तिलावत सुनें।
    إِذْ تَلَقَّوْنَهُ بِأَلْسِنَتِكُمْ وَتَقُولُونَ بِأَفْوَاهِكُمْ مَا لَيْسَ لَكُمْ بِهِ عِلْمٌ وَتَحْسَبُونَهُ هَيِّنًا وَهُوَ عِنْدَ اللَّهِ عَظِيمٌ (15) وَلَوْلَا إِذْ سَمِعْتُمُوهُ قُلْتُمْ مَا يَكُونُ لَنَا أَنْ نَتَكَلَّمَ بِهَذَا سُبْحَانَكَ هَذَا بُهْتَانٌ عَظِيمٌ (16)
    जब तुम उस (झूठ बात) को एक दूसरे से (सुन कर) अपनी ज़बानों पर लाते रहे और अपने मुँह से वह कुछ कहते रहेजिसके विषय में तुम्हें कोई ज्ञान ही न था और तुम उसे एक साधारण बात समझ रहे थेजबकि ईश्वर के निकट वह एक भारी बात है। (24:15) और क्यों जब तुमने उस (आरोप) को सुना तो यह नहीं कहा किहमारे लिए उचित नहीं कि हम ऐसी बात ज़बान पर लाएँ। (प्रभुवर!) तू (हर त्रुटि से) पवित्र है। यह तो एक बड़ा लांछन है? (24:16)

    इससे पहले हमने कहा था कि मदीने के मिथ्याचारियों के एक गुट ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की एक पत्नी पर बड़ा आरोप लगाया और मुसलमानों ने भी इस प्रकार का आरोप लगाने और अफ़वाह फैलाने वालों के साथ कड़ा व्यवहार करने के बजाए, इस बात को दूसरों तक स्थानांतरित किया। इससे पैग़म्बर और उनकी पत्नी को बहुत अधिक दुख हुआ।
    ईश्वर इन आयतों में कहता है कि जब तुम्हें उस बात पर विश्वास नहीं था तो तुमने क्यों उसे एक दूसरे को बताया और दूसरों के सम्मान के साथ खिलवाड़ किया? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं था कि दूसरों के बारे में जो बातें तुम सुनते हो उन्हें अकारण दूसरों को नहीं बताना चाहिए और वह भी इतना बड़ा लांछन जो तुम्हारे पैग़म्बर की पत्नी पर लगाया जा रहा था?
    यह आयत दो महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्वों की ओर संकेत करती है, प्रथम तो यह कि जो कुछ तुम सुनते हो उसे अकारण स्वीकार न कर लिया करो ताकि समाज में अफ़वाहें फैलाने वालों को रोका जा सके क्योंकि संभव है कि इससे कुछ लोगों की इज़्ज़त ख़तरे में पड़ जाए कि यह इस्लाम की दृष्टि में बड़ा निंदनीय कार्य है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि जो बात लोगों की ज़बान पर होती है उसे बिना जांचे परखे स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए।
    आरोपों को दूसरों तक पहुंचना और किसी के सम्मान को मिट्टी में मिलाना बड़ा सरल कार्य है किंतु ईश्वर की दृष्टि में यह अत्यंत बुरा व निंदनीय है।
    दूसरों के सम्मान की रक्षा, समाज के सभी सदस्यों का दायित्व है। सुनी हुई बातों को फैलाने के बजाए, अफ़वाह फैलाने वाले के साथ कड़ा व्यवहार करना चाहिए।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 17 और 18 की तिलावत सुनें।

    يَعِظُكُمَ اللَّهُ أَنْ تَعُودُوا لِمِثْلِهِ أَبَدًا إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (17) وَيُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآَيَاتِ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (18)
    ईश्वर तुम्हें नसीहत करता है कि यदि तुम मोमिन हो तो फिर कभी ऐसा न करना।(24:17) और ईश्वर अपनी आयतों को तुम्हारे लिए स्पष्ट रूप से बयान करता है। और ईश्वर तो अत्यंत ज्ञानी वतत्वदर्शी है। (24:18)

    चूंकि ईश्वर के निकट दूसरों पर आरोप लगाना और वह भी नैतिक मामलों में, अत्यंत महत्वपूर्ण बात है इस लिए यह आयत एक बार फिर उसकी ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वर एक दयालु व कृपालु पिता की भांति, जो अपने बच्चे को समझाता है ताकि वह पुनः ग़लती न कर बैठे, तुम्हें नसीहत करता है कि ध्यान रखो कि इस्लामी समाज में इस प्रकार की ग़लती पुनः न होने पाए क्योंकि यह कार्य ईमान के प्रतिकूल है।
    यदि अतीत में तुमने अज्ञानता या निश्चेतना के चलते इस प्रकार की ग़लती कर दी तो अब जबकि तुम्हें उसका पता चल गया है तो न केवल उससे तौबा करो बल्कि यह संकल्प भी करो कि अब भविष्य में कभी ऐसी ग़लती नहीं करोगे और जान लो कि ईश्वर तुम्हारे कार्यों, विचारों और नीयत से अवगत है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य को नसीहत व उपदेश की आवश्यकता होती है और क़ुरआने मजीद उपदेश की सबसे अच्छी किताब है अतः हमें उसे पढ़ना चाहिए और उसकी आयतों से नसीहत लेनी चाहिए।
    दूसरों पर आरोप लगाना, जिसका मुख्य कारण उनके बारे में बुरे विचार हैं, ईमान की कमज़ोरी का चिन्ह है।
    सबसे अच्छी नसीहत, पापों से तौबा करना है कि जो पिछले पापों को भी धो देती है और भविष्य में भी पापों को दोहराने से मनुष्य को रोक देती है।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 19 और 20 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ الَّذِينَ يُحِبُّونَ أَنْ تَشِيعَ الْفَاحِشَةُ فِي الَّذِينَ آَمَنُوا لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (19) وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ وَأَنَّ اللَّهَ رَءُوفٌ رَحِيمٌ (20)
    निःसंदेह जो लोग यह चाहते है कि ईमान वालों के बीचअश्लीलता फैल जाए, उनके लिए लोक परलोक में पीड़ादायक दंड है और (इसे) ईश्वर जानता है और तुम नहीं जानते। (24:19) और यदि तुम पर ईश्वर का अनुग्रह और उसकी दया न होती और यह कि ईश्वर बड़ा करुणामयव अत्यन्त दयावान है (तो अवश्य ही तुम इसी संसार में कड़े दंड में ग्रस्त हो जाते।) (24:20)

    इन आयतों में ईश्वर दूसरों पर आरोप लगाने की बुराई को बहुत बड़ा पाप बताते हुए कहता है कि न केवल यह कि दूसरों पर आरोप लगाना और समाज में इस आरोप को प्रचलित करना बड़ा पाप है बल्कि यदि कोई दिल से यह चाहता हो कि किसी ईमान वाले का अनादर करे ताकि लोगों के बीच उसे बुराई के साथ याद किया जाए तो यह आंतरिक इच्छा भी पाप है, चाहे वह इसके लिए व्यवहारिक रूप से कुछ भी न करे।
    यद्यपि इस्लामी संस्कृति में पाप करने के इरादे को पाप नहीं समझा जाता किंतु दो मामलों में क़ुरआने मजीद ने आंतरिक इच्छा और इरादे को भी पाप बताया है। प्रथम दूसरों के बारे में बुरे विचार रखना कि इस संबंध में वह कहता है कि निश्चित रूप से कुछ बुरे विचार, पाप हैं। और दूसरे, अन्य लोगों के अनादर पर मन से राज़ी रहना कि यदि व्यक्ति इस संबंध में कुछ न भी करे तब भी उसने पाप किया है।
    स्वाभाविक है कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी लोगों के आंतरिक इरादों से अवगत नहीं है और हम उन लोगों को नहीं पहचानते जो दूसरों का अपमान व अनादर करना चाहते हैं किंतु ईश्वर अपनी दया व कृपा के चलते उन्हें दंडित करने में जल्दी नहीं करता कि शायद वे तौबा करके सुधर जाएं।
    अलबत्ता जो लोग व्यवहारिक क़दम उठाते हुए दूसरों का अपमान करते हैं और उन पर व्यभिचार का आरोप लगाते हैं उन्हें इस संसार में भी दंडित किया जाता है और अस्सी कोड़े मारे जाते हैं तथा प्रलय में भी अत्यंत कड़ा दंड उनकी प्रतीक्षा में है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पाप की इच्छा रखना, पाप की भूमिका है। सभी पापों के बीच वह एकमात्र पाप जिसकी इच्छा रखना भी बड़ा पाप है, दूसरों पर व्यभिचार का आरोप लगाना और उनका अपमान करना है।
    इस्लामी समाज में बुराइयों का प्रसार, चाहे वह कथन द्वारा हो या व्यवहार द्वारा, मनुष्य के लोक-परलोक दोनों को तबाह कर देता है।

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