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    सूरए नूर, आयतें 21-23, (कार्यक्रम 628)

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    आइये पहले सूरए नूर की आयत क्रमांक 21 की तिलावत सुनें।
    يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ وَمَنْ يَتَّبِعْ خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ فَإِنَّهُ يَأْمُرُ بِالْفَحْشَاءِ وَالْمُنْكَرِ وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ مَا زَكَا مِنْكُمْ مِنْ أَحَدٍ أَبَدًا وَلَكِنَّ اللَّهَ يُزَكِّي مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (21)
    हे ईमान वालो! शैतान के पद चिन्हों पर न चलो और जो कोई शैतान के पद चिन्हों पर चलेगा तो वह उसे अश्लीलता और बुराई का ही आदेश देगा। और यदि तुम पर ईश्वर की कृपा और उसकी दया न होती तो तुममें से कोई भी (पाप में ग्रस्त होने से) पवित्र नहीं रह सकता था किन्तु ईश्वर जिसे चाहता है, पवित्र बना देता है और ईश्वर सब कुछ सुनने वाला औरजानकार है। (24:21)

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की एक पत्नी पर अनुचित आरोप लगाए जाने की घटना से संबंधित आयतों की समाप्ति के बाद यह आयत एक मूल विषय की ओर संकेत करते हुए कहती है कि शैतान की ओर से सदैव सचेत रहना चाहिए क्योंकि वह धीरे-धीरे पथभ्रष्टता और पतन की ओर ले जाता है।
    इस आयत में प्रयोग होने वाला ख़ुतुवाते शैतान अर्थात शैतान के पद चिन्ह का शब्द क़ुरआने मजीद की चार आयतों में आया है ताकि लोगों को इस बड़े ख़तरे की ओर से सावधान करे कि शैतान, मनुष्य को क़दम-क़दम पाप के लिए उकसाता है। हर पाप, मनुष्य के विचार व उसकी आत्मा में पथभ्रष्टता पैदा करता है और उसे दोहराए जाने से अधिक बड़े पाप का मार्ग प्रशस्त होता है यहां तक कि मनुष्य पतन की खाई में गिर पड़ता है।
    क़ुरआने मजीद, शैतान के बहकावों और उसके कार्यों की पहचान के लिए एक स्पष्ट मानदंड प्रस्तुत करता है और वह यह कि हर वह कार्य बुरा है जिसकी बुराई को, स्वस्थ बुद्धि वाला व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति के आधार पर समझ लेता है, जैसे विश्वास घात, झूठा आरोप लगाना, चोरी, हत्या और इसी प्रकार के अन्य बुरे कर्म।
    अलबत्ता तत्वदर्शी एवं दयालु ईश्वर ने, शैतान के बहकावों और आंतरिक उकसावों को नियंत्रित करने के लिए मनुष्य को आंतरिक व बाहरी साधन प्रदान किए हैं। बुद्धि व प्रवृत्ति भीतर से और पैग़म्बर तथा ईश्वरीय किताब बाहर से निरंतर मनुष्य को सावधान करते रहते हैं और उसे जीवन का सही मार्ग दिखाते हैं। यदि ये न होते तो आंतरिक इच्छाएं भीतर से और शैतान के बहकावे बाहर से सदैव मनुष्य को बुरे कर्मों की ओर धकेलते रहते और सभी को पापों व अपराधों में ग्रस्त कर देते।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वाले अपने ईमान पर कभी भी घमंड न करें और स्वयं को मुक्ति प्राप्त न समझें क्योंकि मनुष्य सदैव ही शैतान के उकसावों और पथभ्रष्टता के ख़तरे में ग्रस्त रहता है।
    शैतान धीरे-2, क्रमशः और क़दम क़दम करके मनुष्य की आत्मा में पैठ बनाता है अतः हमें उसके प्रभाव के सभी मार्गों की ओर से सावधान रहना चाहिए और पहले ही क़दम से उसकी ओर से सचेत हो जाना चाहिए।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 22 की तिलावत सुनें।
    وَلَا يَأْتَلِ أُولُو الْفَضْلِ مِنْكُمْ وَالسَّعَةِ أَنْ يُؤْتُوا أُولِي الْقُرْبَى وَالْمَسَاكِينَ وَالْمُهَاجِرِينَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلْيَعْفُوا وَلْيَصْفَحُوا أَلَا تُحِبُّونَ أَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (22)
    और तुममें जो संपन्न और सामर्थ्यवान हैं, वे यह सौगंध न खाएं कि नातेदारों, ग़रीबों और ईश्वर के मार्ग में पलायन करने वालों को धन नहीं देंगे (बल्कि) उन्हें चाहिए कि (उनकी ग़लतियों को) क्षमा कर दें और उन्हें माफ़ कर दें। क्या तुम यह नहीं चाहते कि ईश्वर तुम्हें क्षमा करे? और ईश्वर तो बहुत क्षमाशील और अत्यन्त दयावान है। (24:22)

    पिछली आयतों में उन लोगों की कड़ी आलोचना की गई थी कि जिन्होंने पैग़म्बर की एक पत्नी पर अनुचित आरोप लगाया था और ईश्वर ने इस मामले में ढिलाई के कारण मुसलमानों के साथ कड़ा व्यवहार किया था। इसके बाद कुछ धन संपन्न लोगों ने यह निर्णय किया कि वे पैग़म्बर की पत्नी पर लगे आरोप को फैलाने वालों की किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं करेंगे चाहे वे उनके अपने परिजन ही क्यों न हों। ईश्वर ने यह आयत भेजी और उन्हें इस कार्य से रोका। शायद इसका कारण यह था कि ग़रीबों और वंचितों की सहायता रोकना, चाहे वे अपराधी ही क्यों न हों, उन्हें दंडित करने की सही शैली नहीं है बल्कि उनकी सहायता जारी रख कर और उनसे सामाजिक संबंधों को बनाए रख कर ऐसा कार्य करना चाहिए कि उन्हें अपनी ग़लती का आभास हो जाए और वे इस्लामी समाज की क्षमा के पात्र बन जाएं।
    आगे चल कर आयत एक महत्वपूर्ण बिंदु की ओर संकेत करती है और कहती है कि क्या अब तक तुमने कोई ग़लती नहीं की है? इस स्थिति में तुम्हें ईश्वर से क्या अपेक्षा है? तौबा व प्रायश्चित के लिए समय व मोहलत देने की अपेक्षा या शीघ्र ही कोप व दंड भेजने की अपेक्षा? यदि तुम्हें ईश्वर से क्षमा की आशा है तो तुम भी उसके ग़लती करने वाले बंदों को क्षमा करो।
    इस आयत से हमने सीखा कि जो दूसरों की ग़लतियों को क्षमा करता है और अपने धन से उनकी सहायता भी करता है, वह ईश्वरीय दया व क्षमा का पात्र बनता है।
    ग़लती करने वालों के संबंध में अत्यधिक कड़ाई से काम नहीं लेना चाहिए और उन पर सभी दरवाज़े नहीं बंद कर देने चाहिए।
    किसी का वंचित होना, उसकी आर्थिक सहायता के लिए पर्याप्त शर्त है, उसका सदकर्मी होना आवश्यक नहीं है।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 23 की तिलावत सुनें।
    إِنَّ الَّذِينَ يَرْمُونَ الْمُحْصَنَاتِ الْغَافِلَاتِ الْمُؤْمِنَاتِ لُعِنُوا فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ (23)
    निःसंदेह जो लोग पतिव्रता, (बुराई से पूर्णतः) अनभिज्ञ और ईमान वाली महिलाओं पर (व्यभिचार का) लांछन लगाते है उन पर लोक-परलोक में धिक्कार की गई है और उनके लिए बहुत बड़ा दंड (तैयार) है। (24:23)

    पैग़म्बर की एक पत्नी पर अनुचित आरोप लगाए जाने संबंधी आयतों के अंत में यह आयत सभी पतिव्रता व पाक दामन महिलाओं के संबंध में एक मूल सिद्धांत के रूप में कहती है कि किसी को भी इस बात का अधिकार नहीं है कि अनैतिक बुराई से दूर किसी ईमान वाली महिला पर अपने ग़लत विचारों या दूसरों से सुनी हुई निराधार बातों के आधार पर व्यभिचार का आरोप लगाए और उसे बेइज़्ज़त कर दे। इस प्रकार के व्यक्ति को जानना चाहिए कि उसका सामना ईश्वर से है और ईश्वर अत्याचाग्रस्त का समर्थन करते हुए उसे अत्यंत कड़ा दंड देगा। उसे लोक-परलोक में अपनी असीम दया से वंचित कर देगा और प्रलय में उसे स्थायी रूप से नरक में डाल देगा।
    इस आयत से हमने सीखा कि पतिव्रता महिलाओं के अधिकारों की रक्षा क़ुरआने मजीद और इस्लाम की शिक्षाओं में से है।
    महिलाओं को अपने पारिवारिक व सामाजिक संबंधों में ऐसे हर व्यवहार से दूर रहना चाहिए जो उन पर लांछन लगने का मार्ग प्रशस्त करे।

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