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    सूरए नूर, आयतें 24-29, (कार्यक्रम 629)

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    नूर की आयत क्रमांक 24 और 25
    يَوْمَ تَشْهَدُ عَلَيْهِمْ أَلْسِنَتُهُمْ وَأَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُمْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (24) يَوْمَئِذٍ يُوَفِّيهِمُ اللَّهُ دِينَهُمُ الْحَقَّ وَيَعْلَمُونَ أَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ الْمُبِينُ (25)
    जिस दिन कि उनकी ज़बानें, उनके हाथ और उनके पाँव उनके विरुद्ध उन (कर्मों) की गवाही देंगे, जो वे करते रहे थे। (24:24) उस दिन ईश्वर उन्हें उनका ठीक-ठीक बदला पूर्ण रूप से दे देगा और वे जान लेंगे कि निःसंदेह ईश्वर ही खुला हुआ सत्य है।(24:25)

    इससे पहले कहा गया कि जो लोग इस संसार में दूसरों पर ग़लत आरोप लगाते हैं, उस संसार में उनका ठिकाना नरक है। ये आयतें कहती हैं कि प्रलय के न्यायालय में न केवल ज़बान, पापों को स्वीकार नहीं करेगी बल्कि ईश्वर की इच्छा से अपराधियों के शरीर के अंग भी बोलने लगेंगे और स्वयं द्वारा किए गए पापों को स्वीकार करेंगे मानो उन्होंने संसार में जो कुछ भी किया था उसे अपने भीतर संजो कर रख लिया था और आज ईश्वर की इच्छा पर उन्हें सुना रहे हैं।
    अपराधियों की इच्छा के विपरीत, उनके अंगों द्वारा पापों की इसी स्वीकारोक्ति के आधार पर ही ईश्वर के न्यायालय में उन्हें दंडित किया जाएगा और वे अपने किए की पूरी-2 सज़ा भुगतेंगे, उनको दिए जाने वाले दंड में तनिक भी कमी या बेशी नहीं होगी। यहीं पर अपराधी, उस वास्तविकता को, जिसका वे संसार में इन्कार किया करते थे या जिसकी ओर से निश्चेत थे, स्पष्ट रूप से समझ जाएंगे किंतु इसका कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि तौबा व प्रायश्चित का समय बीत चुका होगा।
    इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में मनुष्य अपने शरीर के अंगों का भी स्वामी नहीं होगा बल्कि संभव है कि वे अंग स्वयं उसी के विरुद्ध गवाही दें।
    संपूर्ण सृष्टि यहां तक कि जड़ वस्तुओं में भी एक प्रकार का विवेक पाया जाता है और वे अपने आस-पास घटित होने वाली बातों को समझती हैं।
    केवल प्रलय में ही मनुष्य के अच्छे व बुरे कर्मों का संपूर्ण बदला दिया जाएगा।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 26 की तिलावत सुनें।
    الْخَبِيثَاتُ لِلْخَبِيثِينَ وَالْخَبِيثُونَ لِلْخَبِيثَاتِ وَالطَّيِّبَاتُ لِلطَّيِّبِينَ وَالطَّيِّبُونَ لِلطَّيِّبَاتِ أُولَئِكَ مُبَرَّءُونَ مِمَّا يَقُولُونَ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَرِيمٌ (26)
    बुरी महिलाएं, बुरे पुरुषों के लिए हैं और बुरे पुरुष, बुरी महिलाओं के लिए हैंऔर पवित्र महिलाएं, पवित्र पुरुषों के लिए हैं और पवित्र पुरुष, पवित्र महिलाओं के लिए हैं। ये (पवित्र) लोग उन बातों से विरक्त हैं, जो वे (बुरे) लोग उनके बारे में कह रहे हैं। इनके लिए क्षमा और सम्मानित आजीविका है। (24:26)

    यह आयत एक स्वाभाविक एवं प्राकृतिक परंपरा की ओर जिसकी पुष्टि ईश्वरीय शिक्षाएं भी करती हैं, संकेत करते हुए कहती है कि सभी लोग स्वाभाविक रूप से दंपति के चयन में समान विचार और समान प्रवृत्ति के व्यक्ति की खोज करते हैं। पवित्र लोगों की प्रवृत्ति इस प्रकार की है कि वे पवित्र व भली वस्तुओं की ओर उन्मुख होते हैं और पवित्र लोगों की ही कामना करते हैं जबकि इसके विपरीत बुरे लोग, बुराइयों और भ्रष्ट लोगों की ओर आकर्षित होते हैं। धार्मिक क़ानूनों के अनुसार भी ईश्वर ने इस बात की अनुमति नहीं दी है कि पवित्र प्रवृत्ति वाले, अपवित्र व बुरे लोगों को अपना जीवन साथी बनाएं और बुराइयों में ग्रस्त हो जाएं। उसने बुरे व अपवित्र लोगों को उनकी स्थिति पर छोड़ दिया है जब तक कि वे तौबा व प्रायश्चित नहीं कर लेते।

    रोचक बात यह है कि इस आयत में जीवन साथी के चयन का सबसे महत्वपूर्ण मानदंड, हर प्रकार की बुराई व अपवित्रता से दूरी बताते हुए विचार व व्यवहार की पवित्रता पर बल दिया गया है। कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद की बुराई से पवित्रता, बुरी व ग़लत बातों से पवित्रता और ईमान वालों को शोभा न देने वाले हर प्रकार के अभद्र व्यवहार से पवित्रता।
    स्वाभाविक है कि ईश्वर की दया व कृपा और सम्मानित आजीविका के पात्र भी इसी प्रकार के पवित्र लोग हैं जिन्होंने अपने परिवार की आधारशिला पवित्रता पर रखी है और इसी आधार पर अपना दांपत्य जीवन आरंभ किया है।
    इस आयत से हमने सीखा कि हमें अपनी विदित पवित्रता के साथ ही आंतरिक पवित्रता के लिए भी प्रयास करना चाहिए कि जीवन के मार्ग में जीवन साथी एवं मित्र इत्यादि का चयन हमारी प्रवृत्ति को अपवित्र लोगों की ओर उन्मुख और पवित्र लोगों से दूर न कर दे।
    पवित्र वंश, पवित्र जीवन साथी के चयन पर निर्भर है और पवित्र लोगों को अपने वंश की पवित्रता को बाक़ी रखने के लिए व्यापक कार्यक्रम बनाने चाहिए।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 27, 28 और 29 की तिलावत सुनें।
    يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتًا غَيْرَ بُيُوتِكُمْ حَتَّى تَسْتَأْنِسُوا وَتُسَلِّمُوا عَلَى أَهْلِهَا ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ (27) فَإِنْ لَمْ تَجِدُوا فِيهَا أَحَدًا فَلَا تَدْخُلُوهَا حَتَّى يُؤْذَنَ لَكُمْ وَإِنْ قِيلَ لَكُمُ ارْجِعُوا فَارْجِعُوا هُوَ أَزْكَى لَكُمْ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ (28) لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَدْخُلُوا بُيُوتًا غَيْرَ مَسْكُونَةٍ فِيهَا مَتَاعٌ لَكُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ (29)
    हे ईमान लाने वालो! अपने घरों के अतिरिक्त दूसरे घरों में (तब तक) प्रवेश न करो, जब तक कि अनुमति प्राप्त न कर लो और उनमें रहने वालों को सलाम न कर लो। यही तुम्हारे लिए उत्तम है, शायद तुम ध्यान रखो। (24:27) फिर यदि उनमें किसी (व्यक्ति) को न पाओ, तो उनमें प्रवेश न करो जब तक कि तुम्हें अनुमति प्राप्त न हो जाए। और यदि तुमसे कहा जाए कि वापस हो जाओ, तो वापस लौट जाओ, यही तुम्हारे लिए अधिक पवित्र बात है। और जो कुछ तुम करते हो, उसे ईश्वर भली-भाँति जानता है। (24:28) (अलबत्ता) इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं है कि तुम ऐसे घरों में प्रवेश करो जिनमें कोई न रहता हो, (और)जिनमें तुम्हारी कोई चीज़ हो। और ईश्वर जानता है जो कुछ तुम प्रकट करते हो और जो कुछ छिपाते हो। (24:29)

    यह आयतें, अन्य लोगों की निजता के सम्मान के संबंध में इस्लाम के सामाजिक आदेशों के एक भाग का वर्णन करते हुए कहती हैं कि अचानक और बिना सूचना के दूसरों के घरों में प्रवेश न करो कि यह कार्य लोगों व उनके परिवारों के व्यक्तिगत अधिकारों का भी हनन है और सामाजिक सुरक्षा व नैतिक पवित्रता से भी विरोधाभास रखता है। दरवाज़ा खुला होने का अर्थ, घर में प्रवेश की अनुमति होना नहीं है बल्कि घर में प्रवेश से पहले घर वालों से अनुमति लेना ही चाहिए।
    इस्लामी संस्कारों के अनुसार घर वालों के लिए आवश्यक नहीं है कि वे किसी को भी घर में प्रवेश की अनुमति दें बल्कि यदि वे तैयार न हों तो आने वाले को नकारात्मक उत्तर दे सकते हैं क्योंकि घर आराम का स्थान है और दूसरों को इस बात का अधिकार नहीं है कि वे घर वालों से यह हक़ छीनें किंतु यदि उन्होंने प्रवेश की अनुमति दे दी तो इस्लामी सभ्यता आदेश देती है कि व्यक्ति, किसी भी घर में प्रवेश करते समय घर वालों को सलाम करे और प्रेम व स्नेह के साथ प्रवेश करे।
    इन आयतों में कई बार बल देकर कहा गया है कि ईश्वर तुम्हारे गुप्त व स्पष्ट कार्यों से अवगत है। शायद इसका कारण यह हो कि कोई अन्य लोगों की बातों की टोह में उनके घरों में जाए और यदि मिलने जुलने के लिए जाए तो घर के भीतर जो कुछ हो रहा है उसे जानने का प्रयास न करे क्योंकि यह बुरा व अनैतिक कार्य है और कई स्थानों पर तो यह अवैध और हराम भी है। अलबत्ता ख़रीदारी के केंद्रों और होटलों इत्यादि जैसे सार्वजनिक स्थानों का मामला अलग है जो किसी का घर नहीं होता और वहां अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि घर, रहने और आराम करने का स्थान है। किसी को भी घर वालों की सुरक्षा और आराम में रुकावट डालने का अधिकार नहीं है।
    घर, लोगों की निजता की सीमा है और किसी को भी बिना अनुमति के उसके भीतर जाने का हक़ नहीं है। यदि घर वालों ने अनुमति नहीं दी तो हमें उनकी बात मान लेनी चाहिए और अपनी इच्छा उन पर नहीं थोपनी चाहिए।
    अन्य लोगों से भेंट के समय उन्हें सलाम करना, इस्लामी संस्कारों में से एक है।

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