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    सूरए नूर, आयतें 30-31, (कार्यक्रम 630)

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    सूरए नूर की आयत क्रमांक 30-31
    قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ذَلِكَ أَزْكَى لَهُمْ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ (30)
    (हे पैग़म्बर!) ईमान वाले पुरुषों से कह दीजिए कि अपनी निगाहें (हराम चीज़ों से) ब चाकर रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें। यही उनके लिए अधिक (अच्छी व) पवित्र बात है। निःसंदेह जो कुछ वे करते हैं उससे ईश्वर पूर्णतः अवगत है। (24:30)

    यह आयत और इसके बाद वाली आयतें ईमान वाली महिलाओं और पुरुषों को सामाजिक संबंधों में नैतिक पवित्रता की रक्षा की सिफ़ारिश करती हैं ताकि समाज में अश्लीलता व नैतिक बुराइयों के प्रसार को रोका जा सके। वास्तविकता यह है कि मनुष्य की आंखें एक बड़े क्षेत्रफल तक देख सकती हैं और मनुष्य के आस-पास जो कुछ हो रहा है उससे उसे अवगत करा सकती हैं किंतु उसकी आंखें उसके नियंत्रण में होनी चाहिए और उसे इधर उधर की हर बात को नहीं देखना चाहिए।
    यह आयत कहती है कि ईमान वाले पुरुष अपनी आंखों पर नियंत्रण रखते हैं और उस चीज़ को नहीं देखते जिसे देखने से ईश्वर अप्रसन्न होता है। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार इस आयत का एक महत्वपूर्ण संबोधन, नामहरम अर्थात ग़ैर स्त्री पर दृष्टि डालना है कि यदि वे कपड़ों में न हों तो उन्हें किसी भी प्रकार से देखना हराम अर्थात वर्जित है और यदि वे आवरण में हों तो केवल उनके चेहरे को आवश्यकता भर देखा जा सकता है ताकि दृष्टि में वासना की भावना न आने पाए।

    इस आयत में आंखों को नियंत्रित करने की बात के पश्चात हर प्रकार की नैतिक बुराई से शरीर को दूर रखने की बात कही गई है। आज के समाजों में यौन संबंधों में अनैतिकता विभिन्न रूपों में प्रचलित हो चुकी है। इसके चलते अनैतिकता, पारिवारिक समस्याओं और यौन संबंधी रोगों में बहुत अधिक वृद्धि हो गई है किंतु इस्लाम की दृष्टि में महिला व पुरुष के बीच यौन संबंध केवल विवाह के परिप्रेक्ष्य में ही वैध हैं और इसके अतिरिक्त उनके बीच किसी भी प्रकार का यौन संबंध अवैध व हराम माना जाता है।
    आगे चल कर आयत सभी मनुष्यों विशेष कर ईमान वालों को सचेत करती है कि यह न सोचो कि तुम्हारी दृष्टि, ईश्वर की नज़रों से छिपी हुई है बल्कि वह तो तुम्हारी नीयत से भी अवगत है और वह तुम्हारे कर्म के खुले व गुप्त दोनों रूपों को जानता है।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईमान के लिए अन्य लोगों के साथ संबंध में हर प्रकार की अपवित्रता से दूरी और व्यक्ति की बुरी नज़रों से दूसरों का सुरक्षित रहना आवश्यक है।
    पर पुरुष या ग़ैर स्त्री से अपनी दृष्टि को पवित्र रखना, नैतिक पवित्रता की भूमिका है।
    यदि हम जान लें कि ईश्वर हमारी नीयत और हमारी नज़रों से अवगत है तो हम अपनी आंखों को अधिक नियंत्रित करेंगे और उनका दुरुपयोग नहीं करेंगे।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 31 की तिलावत सुनें।
    وَقُلْ لِلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَى جُيُوبِهِنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوْ آَبَائِهِنَّ أَوْ آَبَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ أَبْنَائِهِنَّ أَوْ أَبْنَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي أَخَوَاتِهِنَّ أَوْ نِسَائِهِنَّ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُنَّ أَوِ التَّابِعِينَ غَيْرِ أُولِي الْإِرْبَةِ مِنَ الرِّجَالِ أَوِ الطِّفْلِ الَّذِينَ لَمْ يَظْهَرُوا عَلَى عَوْرَاتِ النِّسَاءِ وَلَا يَضْرِبْنَ بِأَرْجُلِهِنَّ لِيُعْلَمَ مَا يُخْفِينَ مِنْ زِينَتِهِنَّ وَتُوبُوا إِلَى اللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَا الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ (31)
    और (हे पैग़म्बर!) ईमान वाली स्त्रियों से (भी) कह दीजिए कि वे भी अपनी निगाहें नीची रखा करें, अपनी पवित्रता की रक्षा करें, अपने श्रृंगार प्रकट न करें, सिवाय उस भाग के जो उसमें से स्वयं खुला रहता है। और अपने सीनों पर अपने दुपट्टे डाले रहें और अपना श्रृंगार किसी पर प्रकट न करें सिवाय अपने पतियों के या अपने पिताओं के या अपने पतियों के पिताओं के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या महिलाओं के या उन दासियों के जो उनके अपने स्वामित्व में हों या उन दासों के जो यौन इच्छा की अवस्था को पार कर चुके हों, या उन बच्चों के जो स्त्रियों की गुप्त बातों से परिचित न हों। और महिलाएं (इस प्रकार) अपने पैर धरती पर मार कर न चलें कि उन्होंने अपना जो श्रृंगार छिपा रखा हो, वह प्रकट हो जाए। हे ईमान वालो! तुम सब मिल कर ईश्वर से तौबा करोकि शायद तुम्हें कल्याण प्राप्त हो जाए। (24:31)

    पिछली आयत में ईश्वर ने पुरुषों को दो आदेश दिए थे, प्रथम यह कि अपनी आंखों को नियंत्रित रखें और दूसरे यह कि अपनी नैतिक पवित्रता की रक्षा करें। यह आयत भी आरंभ में उन्हीं दो ईश्वरीय आदेशों को महिलाओं के लिए बयान करती है और फिर महिलाओं को अपवित्र लोगों की दृष्टि से सुरक्षित रखने के लिए तीन बातों की ओर ध्यान केंद्रित करती है। प्रथम एक बड़ा दुपट्टा ओढ़ना जो बाल, गर्दन और सीने को छिपाए रखे। दूसरे, कान की बाली, हार और चूड़ी जैसे आभूषणों को पर पुरुषों से छिपाना और तीसरे यह कि महिलाएं रास्ता चलते समय अपने पैर ज़मीन पर इस प्रकार न मारें कि दूसरों का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट हो जाए।
    निश्चित रूप से महिलाओं व पुरुषों की बात-चीत और चलने-फिरने की शैली और पहनावे का सामाजिक संबंधों और सार्वजनिक स्थानों पर शर्म व पवित्रता की रक्षा में काफ़ी प्रभाव है। यही कारण है कि ईश्वर ने एक ओर तो ग़लत दृष्टि को वर्जित घोषित किया है और दूसरी ओर समाज में महिलाओं के बन ठन कर निकलने और ऐसी वस्तुओं के प्रदर्शन को भी हराम बताया है जिनसे यौन भावनाएं उत्तेजित होती हैं।
    जो कुछ आज के संसार में हो रहा है उस पर एक दृष्टि डालने से पता चलता है कि पश्चिम में जिसे महिला स्वतंत्रता का नाम दिया जाता है वह अश्लीलता, उच्छृंखलता, निरंकुश यौन संबंधों और महिलाओं को निर्वस्त्र बनाने के प्रयासों के अतिरिक्त कुछ नहीं है और इस प्रकार के संबंधों के परिणाम स्वरूप कुछ लड़कियों व महिलाओं को वासना व बलात्कार का शिकार बनाया जाता है और वे गर्भपात या आत्म हत्या पर विवश हो जाती हैं।

    निरंकुश यौन संबंधों के नकारात्मक परिणामों के दृष्टिगत क्या यौन स्वतंत्रता का अर्थ, पुरुषों द्वारा आंख, कान और स्पर्श के माध्यम से महिलाओं के निरंतर यौन शोषण के अतिरिक्त कुछ और है? धार्मिक शिक्षाओं के आधार पर पवित्र महिलाएं व पुरुष केवल अपने जीवन साथी के साथ यौन संबंध स्थापित करते हैं और समाज में, हर प्रकार की निरंकुश यौन इच्छाओं से दूर एक स्वस्थ एवं पवित्र वातावरण अस्तित्व में आता है।
    इस आयत से हमने सीखा कि नज़रों को नियंत्रित करने और पवित्रता में महिलाओं व पुरुषों के बीच कोई अंतर नहीं है और दोनों पर समान रूप से इसके पालन का दायित्व है।
    इस्लाम, महिलाओं के श्रृंगार का विरोधी नहीं है और वह महिलाओं को इस बात के लिए प्रोत्साहित करता है कि वे अपने पतियों के लिए श्रृंगार करें किंतु वह पर पुरुषों के सामने उनके बन संवर के आने का विरोधी है।
    ऐसी चाल जिससे महिला के गहने प्रकट हो जाएं, इस्लाम की दृष्टि में वैध नहीं है।
    हिजाब और आवरण एक अनिवार्य काम है जिसका आदेश ईश्वर ने क़ुरआने मजीद में दिया है और उसकी सीमाएं भी निर्धारित कर दी हैं।

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