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    सूरए नूर, आयतें 35-38, (कार्यक्रम 632)

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    सूरए नूर की आयत क्रमांक 35-38
    اللَّهُ نُورُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ مَثَلُ نُورِهِ كَمِشْكَاةٍ فِيهَا مِصْبَاحٌ الْمِصْبَاحُ فِي زُجَاجَةٍ الزُّجَاجَةُ كَأَنَّهَا كَوْكَبٌ دُرِّيٌّ يُوقَدُ مِنْ شَجَرَةٍ مُبَارَكَةٍ زَيْتُونَةٍ لَا شَرْقِيَّةٍ وَلَا غَرْبِيَّةٍ يَكَادُ زَيْتُهَا يُضِيءُ وَلَوْ لَمْ تَمْسَسْهُ نَارٌ نُورٌ عَلَى نُورٍ يَهْدِي اللَّهُ لِنُورِهِ مَنْ يَشَاءُ وَيَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ (35)
    ईश्वर, आकाशों और धरती का प्रकाश है। उसके प्रकाश की उपमा ऐसी है जैसे एक ताक़ है, जिसमें एक चिराग़ है, वह चिराग़ एक फ़ानूस में है। वह फ़ानूस ऐसा है मानो चमकता हुआ कोई तारा है, वह चिराग़ ज़ैतून के एक बरकत वाले वृक्ष के तेल से जलाया जाता है, जो न पूर्वी है न पश्चिमी। उसका तेल (इतना शुद्ध है कि) निकट है कि अपने आप जल पड़े यद्यपि आग उसे छुए भी नहीं। एक प्रकाश पर दूसरा प्रकाश! ईश्वर जिसे चाहता है अपने प्रकाश से मार्ग दिखा देता है। ईश्वर लोगों के लिए उपमाएं प्रस्तुत करता है और ईश्वर तो हर चीज़ का ज्ञान रखता है। (24:35)

    यह आयत, जो आयते नूर के नाम से विख्यात है और इस सूरे का नाम सूरए नूर रखे जाने का एक कारण है, ईश्वर को सृष्टि और जीवन का स्रोत व प्रकाश बताती है। इस आयत में ईश्वर की उपमा प्रकाश से दी गई है। मनुष्य जिन भौतिक वस्तुओं को पहचानता है और जो उसके लिए समझने योग्य हैं, उनमें प्रकाश सबसे उत्कृष्ट है और सभी सौंदर्यों का स्रोत है।
    प्रकाश, हर प्रकार की अच्छाई का स्रोत है और उसकी ओर से कोई बुराई या हानि नहीं होती। सभी वनस्पतियों, पशुओं और मनुष्यों का जीवन, सूर्य के प्रकाश पर निर्भर है और प्रकाश के बिना जीवन का कोई अर्थ ही नहीं है। प्रकाश स्वयं भी उज्ज्वल होता है और अन्य वस्तुओं को भी प्रज्वलित करता है। ईश्वर स्वयं भी प्रकाश है और सभी रचनाओं एवं संपूर्ण सृष्टि के अस्तित्व में आने का कारण भी है।
    ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है और सृष्टि उसी के कारण अपने स्थान पर बाक़ी है। इसके अतिरिक्त ईश्वर आकाश, धरती और सभी रचनाओं का मार्गदर्शक भी है। जैसा कि सूरए ताहा की पचासवीं आयत में कहा गया है कि ईश्वर ने हर वस्तु की रचना की और फिर उसका मार्गदर्शन किया।
    आयत आगे चल कर ईश्वरीय मार्गदर्शन को एक प्रकाशमान दीपक की उपमा देती है जो हर घर में प्रकाश फैलाता है और घर वालों को अंधकार से सुरक्षित रखता है। वह दीपक भी ऐसा है जो उचित स्थान पर रखा हुआ है और शीशे के फ़ानूस के भीतर होने के कारण उसे बुझने का भी कोई भय नहीं है। उस दीपक का ईंधन एक शुद्ध तेल है। स्पष्ट है कि इस प्रकार के दीपक का प्रकाश बहुत अधिक होगा, वह सदा प्रकाशमान रहेगा और कभी भी बुझेगा नहीं। जी हां, ईश्वरीय मार्गदर्शन कि जो आसमानी किताबों, पैग़म्बरों और ईश्वर के विशेष संदेश द्वारा मनुष्य तक पहुंचता है और ईमान वालों के हृदय में समा जाता है, सदैव उन्हें प्रकाश देता रहेगा और उन्हें अत्याचार व अज्ञान के अंधकारों से बाहर निकालता रहेगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि, ईश्वरीय प्रकाश का एक प्रतिबिंबन है जो इस भौतिक संसार में दिखाई पड़ता है।
    ईश्वरीय मार्गदर्शन, आकाश और धरती को भी एक निर्धारित मंज़िल की ओर बढ़ा रहा है और मनुष्य को भी वांछित परिपूर्णता की ओर ले जा रहा है।
    सच्चे ईमान का पोषण उस मार्गदर्शन से होता है जो उसे सीधे रास्ते पर ले जाता है और हर प्रकार की पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखता है।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 36 की तिलावत सुनें।
    فِي بُيُوتٍ أَذِنَ اللَّهُ أَنْ تُرْفَعَ وَيُذْكَرَ فِيهَا اسْمُهُ يُسَبِّحُ لَهُ فِيهَا بِالْغُدُوِّ وَالْآَصَالِ (36)
    (मार्गदर्शन का यह प्रकाश) उन घरों में है जिन्हें ऊँचा करने और जिनमें अपने नाम के सुबह शाम याद करने की ईश्वर ने अनुमति दी है। (24:36)

    इससे पहले की आयत में ईश्वरीय मार्गदर्शन व प्रकाश की बात की गई थी। यह आयत कहती है कि धरती पर ईश्वरीय मार्गदर्शन के दीपक उन घरों में जल रहे हैं और दूसरों को प्रकाश प्रदान कर रहे जिनमें रहने वाले, नमाज़ पढ़ते हैं और ईश्वर को याद करते रहते हैं। ये ऐसे घर हैं जिन्हें ईश्वर ने दूसरे घरों से उच्च बनाया है और ईमान वालों के बीच भी उनका स्थान उच्च होना चाहिए।
    स्पष्ट है कि मक्का नगर में स्थित काबे और संसार की सभी मस्जिदों एवं अन्य धार्मिक स्थानों को इसी प्रकार की विशेषता प्राप्त है और लोगों को ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए इन्हीं स्थानों की और जाना चाहिए।
    इस आयत से हमने सीखा कि मस्जिदों को अन्य घरों की तुलना में विशिष्ट और हर प्रकार से बेहतर होना चाहिए।
    ईश्वर की याद जिस घर में भी होती है उस घर का मूल्य बढ़ जाता है और वह घर अन्य घरों से अलग हो जाता है।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 37 और 38 की तिलावत सुनें।

    رِجَالٌ لَا تُلْهِيهِمْ تِجَارَةٌ وَلَا بَيْعٌ عَنْ ذِكْرِ اللَّهِ وَإِقَامِ الصَّلَاةِ وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ يَخَافُونَ يَوْمًا يَخَافُونَ يَوْمًا تَتَقَلَّبُ فِيهِ الْقُلُوبُ وَالْأَبْصَارُ (37) لِيَجْزِيَهُمُ اللَّهُ أَحْسَنَ مَا عَمِلُوا وَيَزِيدَهُمْ مِنْ فَضْلِهِ وَاللَّهُ يَرْزُقُ مَنْ يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ (38)
    वे पुरुष जिन्हें व्यापार और क्रय-विक्रय ईश्वर की याद, नमाज क़ायम करने और ज़कात देने से निश्चेत नहीं करता। वे उस दिन से डरते रहते है जिसमें हृदय और आँखें पलट जाएँगी। (24:37) ताकि ईश्वर उन्हें उनके अच्छे से अच्छे कर्मों का बदला प्रदान करे।और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक प्रदान करे। और ईश्वर जिसे चाहता है बेहिसाब प्रदान करता है। (24:38)

    ईश्वरीय मार्गदर्शन से लाभान्वित होने वाले लोग, अपनी भौतिक एवं सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयास करते हैं और काम व व्यापार करते हैं किंतु ये चीज़ें उन्हें आध्यात्मिक कार्यों व धार्मिक दायित्वों के पालन से नहीं रोकतीं और वे सदैव अपने अंजाम के बारे में विचार करते हैं। वे इस बात पर ध्यान रखते हैं कि उन्हें ईश्वरीय न्यायालय में उपस्थित होना है और अपने कर्मों का जवाब देना है। यही बात एक मज़बूत कारक के रूप में ईमान वालों को बुराइयों से रोकती है और अच्छे व भले कर्मों की ओर उन्मुख करती है।
    अलबत्ता ईश्वर, भले लोगों के साथ दया व कृपा का जबकि बुरे कर्म करने वालों के साथ न्याय का व्यवहार करता है। वह सद्कर्मों का कई गुना और कभी कभी तो सात सौ गुना पारितोषिक देता है किंतु बुरे कर्म का उसकी बुराई के अनुपात में दंड देता है।
    भले कर्म करने वाले बंदों पर ईश्वर की कृपा यह है कि वह उनके कर्मों की कमी की भरपाई करके उन्हें कर्म का पूरा बदला देता है। इसके अतिरिक्त प्रलय में उसने उनके पारितोषिक को अत्यंत व्यापक व अपेक्षा से कहीं अधिक रखा है और वह उन्हें इतना प्रदान कर देगा कि संसार के अनुसार उसका हिसाब नहीं किया जा सकेगा।
    पैग़म्बर व उनके परिजनों के कथनों के अनुसार ईश्वर के अच्छे बंदे जब भी अज़ान की आवाज़ सुनते हैं, जो भी काम वे कर रहे होते हैं उसे छोड़ कर नमाज़ की ओर चले जाते हैं। नमाज़ पढ़ते समय ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी बात उन्हें अपनी ओर आकर्षित नहीं करती।

    इन आयतों से हमने सीखा कि धन-दौलत और भौतिक मामलों का आकर्षण इतना अधिक है कि यदि मनुष्य ध्यान न दे तो वे उसे ईश्वर की याद से रोक देते हैं।
    वही व्यापार मूल्यवान है जो ईश्वर की याद, नमाज़ और ज़कात के साथ हो। ईश्वर के प्रिय बंदे अपने भौतिक जीवन के लिए प्रयत्न करते हैं किंतु वे प्रलय की ओर से भी निश्चेत नहीं रहते। दूसरे शब्दों में ईश्वर की याद को छोड़ कर किया जाने वाला व्यापार मूल्यहीन व पतन का कारण है। वस्तुतः यह नमाज़ और ईश्वर की याद है जो व्यापार में बरकत लाती है और समाज की प्रगति का कारण बनती है।
    प्रलय में हर चीज़ पलट जाएगी। जो वस्तु संसार में बहुत मूल्यवान प्रतीत होती थी वह मूल्यहीन हो जाएगी और जो वस्तु संसार में मूल्यहीन लगती थी वह मूल्यवान हो जाएगी।
    जो लोग ईश्वर के लिए व्यापार के लाभ से आंखें मूंद लेते हैं ईश्वर उन्हें बेहिसाब लाभ प्रदान करता है।