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    सूरए नूर, आयतें 43-47, (कार्यक्रम 634)

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    أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يُزْجِي سَحَابًا ثُمَّ يُؤَلِّفُ بَيْنَهُ ثُمَّ يَجْعَلُهُ رُكَامًا فَتَرَى الْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَالِهِ وَيُنَزِّلُ مِنَ السَّمَاءِ مِنْ جِبَالٍ فِيهَا مِنْ بَرَدٍ فَيُصِيبُ بِهِ مَنْ يَشَاءُ وَيَصْرِفُهُ عَنْ مَنْ يَشَاءُ يَكَادُ سَنَا بَرْقِهِ يَذْهَبُ بِالْأَبْصَارِ (43) يُقَلِّبُ اللَّهُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَعِبْرَةً لِأُولِي الْأَبْصَارِ (44)
    क्या तुमने देखा नहीं कि ईश्वर (ही पहले हवाओं के सहारे) बादलों को चलाता है? फिर उनको आपस में मिला देता है। फिर उन्हें (एक दूसरे पर) तह ब तह कर देता है। फिर तुम देखते हो कि उसके बीच से वर्षा होती है।और वह आकाश से पहाड़ जैसे बादलों से ओले बरसाता है। फिर जिस पर चाहता है, उन ओलों को गिराता है और जिस पर से चाहता है उस (के नुक़सान) को हटा देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस (बादल) की बिजली की चमक आंखों (की रोशनी) को उचक ले जाएगी। (24:43) ईश्वर ही रात और दिन को (एक दूसरे पर) पलटता रहता है। निश्चय ही इसमें बुद्धि वालों के लिए एक पाठ है। (24:44)

    ये आयतें सृष्टि के संचालन मे ईश्वर की भूमिका की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि रात दिन की आवाजाही जो धरती, चंद्रमा व सूर्य की व्यवस्थित चाल का परिणाम है, ईश्वर का काम है और यह संयोगवश नहीं है। क्या बुद्धि इस बात को स्वीकार करती है कि किसी संयोग से इतनी सुव्यवस्थित, सटीक एवं आश्चर्यजनक व्यवस्था निकल कर आए? यह ऐसा ही है जैसे कोई यह दावा करे कि उसने अक्षरों को एक दूसरे में गडमड करने के बाद उन्हें इतना हिलाया कि उनसे सुंदर कविताओं की एक किताब तैयार हो गई! क्या कोई इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार होगा?
    न केवल धरती की परिक्रमा और दिन व रात की आवाजाही बल्कि आकाश में बादलों का इधर से उधर होना भी ईश्वरीय युक्ति के आधार पर है। हवाओं का चलना और बड़े-बड़े बादलों का बनना कि जो वर्षा और कभी कभी ओले गिरने का कारण बनते हैं, यद्यपि एक प्राकृतिक क्रिया है किंतु यह ईश्वर की इच्छा पर निर्भर है यही कारण है कि कभी किसी क्षेत्र में वर्षा होती है तो दूसरे क्षेत्र में नहीं होती।
    रात दिन की आवाजाही के विपरीत कि जो सदा एक स्थायी एवं समीकरण योग्य बात है, धरती के विभिन्न क्षेत्रों में बादलों का चलना और बारिश या ओलों का गिरना, एक समान नहीं होता अतः संभव है कि किसी क्षेत्र में एक या कई वर्ष तक बहुत अधिक वर्षा हो और अगले वर्षों में उसी क्षेत्र में सूखा व अकाल पड़ जाए।
    इन आयतों से हमने सीखा कि सृष्टि की व्यवस्था में प्राकृतिक कारक, ईश्वर की इच्छा और उसकी शक्ति के अंतर्गत हैं और ईश्वर अपनी तत्वदर्शिता के आधार पर उन्हें प्रयोग करता है।
    वर्षा, ओले और बर्फ़बारी, लाभदायक भी हो सकती है और हानिकारक भी और ये दोनों बातें ईश्वर की इच्छा पर निर्भर हैं।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 45 की तिलावत सुनें।

    وَاللَّهُ خَلَقَ كُلَّ دَابَّةٍ مِنْ مَاءٍ فَمِنْهُمْ مَنْ يَمْشِي عَلَى بَطْنِهِ وَمِنْهُمْ مَنْ يَمْشِي عَلَى رِجْلَيْنِ وَمِنْهُمْ مَنْ يَمْشِي عَلَى أَرْبَعٍ يَخْلُقُ اللَّهُ مَا يَشَاءُ إِنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (45)
    और ईश्वर ने हर जीव को पानी से पैदा किया, तो उनमें से कोई अपने पेट के बल चलता है और कोई दो टाँगों पर चलता है और कोई चार (टाँगों) पर चलता है। ईश्वर जो चाहता है, पैदा करता है क्योंकि निश्चय ही ईश्वर को हर चीज़ पर सामर्थ्य प्राप्त है। (24:45)

    पिछली आयतों में वर्षा और दिन रात की आवाजाही की शैली के बारे में संकेत करने के बाद ईश्वर इन आयतों में विभिन्न प्रकार के जीवों के जीवन के बारे में कहता है कि ज़मीन, आकाश या समुद्र में पाए जाने वाले सभी पशु-पक्षी ईश्वरीय युक्ति के आधार पर पानी से बनाए गए हैं और उन्हें अपने जीवन को जारी रखने के लिए भी पानी की आवश्यकता होती है।
    धरती में जीवों की विविधता और अनेक प्रकार के प्राणियों का अस्तित्व जिनमें से कुछ की ओर इस आयत में संकेत किया गया है, ईश्वर की असीम शक्ति का चिन्ह है जिसने इसी पानी व मिट्टी से इतने प्रकार के जीव जंतु और पशु पक्षी बनाए।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर द्वारा जीवों की सृष्टि समाप्त नहीं हुई है और अब भी जारी है।
    हर जीव का मूल तत्व पानी है। यह ईश्वर की शक्ति की निशानी है कि उसने इतनी सरल सी चीज़ से इतने विविध जीवों की रचना की है।
    यदि मनुष्य में आध्यात्मिक गतिशीलता न हो तो फिर वह भौतिक गतिशीलता में अन्य जीवों की क़तार में आ जाएगा और एक पशु से आगे नहीं बढ़ सकेगा।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 46 और 47 की तिलावत सुनें।

    لَقَدْ أَنْزَلْنَا آَيَاتٍ مُبَيِّنَاتٍ وَاللَّهُ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (46) وَيَقُولُونَ آَمَنَّا بِاللَّهِ وَبِالرَّسُولِ وَأَطَعْنَا ثُمَّ يَتَوَلَّى فَرِيقٌ مِنْهُمْ مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ وَمَا أُولَئِكَ بِالْمُؤْمِنِينَ (47)
    निश्चय ही हमने (सत्य) प्रकट कर देने वाली आयतें उतार दी हैं। और ईश्वर जिसे चाहता है उसका सीधे रास्ते की ओर मार्गदर्शन करता है। (24:46) वे कहते हैं कि हम ईश्वर और उसके पैग़म्बर पर ईमान लाए और (उनका) आज्ञापालन कर रहे हैं। फिर इस (स्वीकारोक्ति) के बाद उनमें से एक गुट मुंह मोड़ लेता है। और वे कदापि वास्तविक ईमान वाले नहीं हैं। (24:47)

    सृष्टि की व्यवस्था में ईश्वरीय निशानियों के वर्णन के पश्चात ये आयतें लोगों के मार्गदर्शन के लिए ईश्वर की ओर से अपना विशेष संदेश वहि भेजे जाने की ओर संकेत करती हैं और कहती हैं कि आसमानी किताब की तथ्य उजागर करने वाली आयतें लोगों को जीवन के सही मार्ग की ओर आमंत्रित करती हैं कि जो हर प्रकार के टेढ़ेपन और कमी व बेशी से दूरी पर आधारित है। यही वह मार्ग है जो ईश्वर ने, गंतव्य तक पहुंचने के लिए मनुष्य के समक्ष रखा है और अपने पैग़म्बरों को इसी सीधे रास्ते की ओर उसका मार्गदर्शन करने का दायित्व सौंपा है।
    अलबत्ता सदैव लोगों के कुछ गुट झूठ बोल कर स्वयं को पैग़म्बरों तक उनके बताए हुए मार्ग का अनुयाई कहते हैं और ज़बान से उस बात का दावा करते हैं जिसे न तो वे दिल से स्वीकार करते हैं और जो न उनके कर्म में दिखाई देती है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर ने पैग़म्बरों को भेज कर तथा तथ्यों को स्पष्ट करने वाली आयतें उतार कर लोगों के मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध करा दिए हैं और अब उनके पास ईमान न लाने का कोई बहाना नहीं रह गया है।

    इस्लामी समाजों के समक्ष मिथ्या एक बहुत बड़ा ख़तरा है और वह उन्हें क्षति पहुंचाती है।
    किसी भी बात पर बहुत जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए और सुंदर नारों के धोखे में नहीं आना चाहिए।

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