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    सूरए नूर, आयतें 53-57, (कार्यक्रम 636)

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    وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِنْ أَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّ قُلْ لَا تُقْسِمُوا طَاعَةٌ مَعْرُوفَةٌ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ (53) قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ فَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُمْ مَا حُمِّلْتُمْ وَإِنْ تُطِيعُوهُ تَهْتَدُوا وَمَا عَلَى الرَّسُولِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ (54)
    और उन्होंने अल्लाह की कड़ी क़सम खाई कि यदि आप उन्हें आदेश दें तो वे अवश्य ही (जेहाद के लिए अपने घरों से) निकल पड़ेंगे। कह दीजिए कि क़सम न खाओ कि उचित आज्ञापालन (बड़े बड़े दावे करने से बेहतर) है। निःसंदेह जो कुछ तुम करते हो, ईश्वर उससे अवगत है। (24:53) कह दीजिए कि ईश्वर का आज्ञापालन करो और उसके पैग़म्बर का भी आज्ञापालन करो। तो यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो (उससे पैग़म्बर को कोई हानि नहीं होगी क्योंकि) उन पर तो बस वही दायित्व है जिसका बोझ उन पर डाला गया है, और तुम लोग उसके उत्तरदायी हो जो दायित्व तुम पर डाला गया है। और यदि तुम उनका आज्ञापालन करोगे तो मार्गदर्शन पा जाओगे। और पैग़म्बर पर तो स्पष्ट रूप से (ईश्वर का संदेश) पहुँचा देने के अतिरिक्त कोई दायित्व नहीं है। (24:54)

    मुनाफ़िक़ या मिथ्याचारी वे लोग हैं जो विदित रूप से तो ईमान का दावा करते हैं किंतु मन से ईमान नहीं लाते। उनकी एक शैली यह है कि वे बहुत अधिक क़सम खाते हैं। जब भी उन्हें आभास होता है कि इस्लामी समाज ने उन्हें पहचान लिया है और उन्हें अलग थलग करने का प्रयास कर रहा है तो वे बड़ी बड़ी क़सम खा कर कहते हैं कि हम ईश्वर के मार्ग में अपनी जान व माल न्योछावर करने के लिए तैयार हैं और ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर के आज्ञापालन में तनिक भी ढिलाई नहीं करेंगे। किंतु अनुभवों से पता चलता है कि जो लोग इस प्रकार की बातें करते हैं वे कर्म के समय विभिन्न बहानों से अनुपस्थित रहते हैं और कठिनाइयों से दूर भागते हैं।
    ईश्वर इस प्रकार के दोहरे व्यवहार के जवाब में कहता है कि सौगंध की आवश्यकता नहीं है बल्कि तुम व्यवहार और कर्म में यह दिखाओं की तुम आज्ञापालक हो और ईमान के अपने दावे में सच्चे हो। यह मत सोचो कि तुम लोगों को धोखा देकर स्वयं को ईमान वाला दर्शा सकोगे क्योंकि तुम्हारा सामना उस ईश्वर से है जो तुम्हारे अंतर्मन से अवगत है और उससे कोई भी बात छिपी हुई नहीं है।

    आगे चलकर आयतें इस बात पर बल देती हैं कि पैग़म्बर का आज्ञापालन या उनके आदेशों की अवज्ञा, स्वयं उनके लिए लाभदायक या हानिकारक नहीं है बल्कि इसका लाभ या हानि स्वयं तुम्हारे लिए है। यदि तुम उनका आज्ञापालन करोगे तो तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त होगा और तुम जीवन में पथभ्रष्टताओं से बचे रहोगे किंतु यदि तुमने उनके आदेशों का पालन नहीं किया तो तुम्हारे संबंध में पैग़म्बर का कोई दायित्व नहीं है क्योंकि उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर दी है और ईश्वर के आदेश को स्पष्ट रूप से सबके पास पहुंचा दिया है मगर तुमने ईश्वर की शिक्षाओं और आदेशों के पालन के अपने दायित्व का निर्वाह नहीं किया है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि कुछ लोगों की बड़ी बड़ी क़समों के धोखे में नहीं आना चाहिए क्योंकि यह ईमान वालों की नहीं बल्कि मिथ्याचारियों की निशानी है।
    पैग़म्बर का दायित्व लोगों तक ईश्वर का आदेश पहुंचाना है, उन्हें उन आदेशों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करना नहीं।
    पैग़म्बर के आदेशों का पालन भी ईश्वर के आदेशों के पालन के समान आवश्यक है और उनके आदेशों की अवज्ञा, ईश्वर के आदेशों की अवज्ञा के समान है।
    आइये अब सूरए नूर की आयत नंबर 55 की तिलावत सुनें।

    وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آَمَنُوا مِنْكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَى لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُمْ مِنْ بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًا يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا وَمَنْ كَفَرَ بَعْدَ ذَلِكَ فَأُولَئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ (55)
    ईश्वर ने तुममें से उन लोगों से, जो ईमान लाए और जिन्होंने अच्छे कर्म किए, वादा किया है कि वह उन्हें धरती में अवश्य ही उत्तराधिकार प्रदान करेगा, जैसे उसने उनसे पहले वाले लोगों को उत्तराधिकार प्रदान किया था। और उनके लिए अवश्य ही उनके उस धर्म को सुदृढ़ बना देगा जिसे उसने उनके लिए पसन्द किया है। और निश्चय ही उनके वर्तमान भय के पश्चात उसे उनके लिए शान्ति और निश्चिन्तता में बदल देगा। वे मेरी बन्दगी करते हैं, किसी को मेरा समकक्ष नहीं ठहराते। और जो कोई इसके पश्चात इन्कार करे, तो ऐसे ही लोग अवज्ञाकारी हैं। (24:55)

    पिछली आयतों में ईश्वर व पैग़म्बर के समक्ष नतमस्तक रहने और उनके संपूर्ण आज्ञापालन को वास्तविक ईमान की निशानी बताया गया था। यह आयत कहती है कि ईश्वर के आज्ञापालन का परिणाम केवल प्रलय में ही सामने नहीं आएगा बल्कि इस संसार में उसका परिणाम एक स्वस्थ एवं न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना है जो समाज को हर प्रकार के अत्याचार व असुरक्षा से मुक्ति दिलाती है और वास्तविक शांति व सुरक्षा स्थापित करती है।
    यह सद्कर्मी ईमान वालों से ईश्वर का वादा है और यह वादा भले कर्म करने वाले पिछले समुदायों के संबंध में भी पूरा हो चुका है। इसके बाद भी जो भी समुदाय ईश्वर पर ईमान रखेगा तथा भले कर्म करेगा, ईश्वर अपने इस वादे को पूरा करेगा तथा उसे शक्ति व सत्ता प्रदान करेगा। हदीसों के अनुसार यह आयत अंतिम काल में पूर्ण रूप से चरितार्थ होगी जब इमाम महदी की वैश्विक सरकार स्थापित होगी।
    इस आयत से हमने सीखा कि संसार में एकेश्वरवाद की स्थापना के लिए सत्ता हाथ में लेना, शांति व सुरक्षा स्थापित करना तथा अनेकेश्वरवाद के चिन्हों को समाप्त करना ईमान वालों की आकांक्षा है और ईश्वर ने इसे पूरा करने का वचन दिया है।
    धर्म, राजनीति से अलग नहीं है बल्कि सत्ता व राजनीति धर्म व धर्म का पालन करने वालों की सुरक्षा के लिए है।
    ईमान वालों की विजय, भले कर्म करने वालों की वैश्विक सरकार की स्थापना और काफ़िरों के प्रभुत्व की समाप्ति, उन निश्चित घटनाओं में से हैं जो ईश्वरीय वचन के अनुसार भविष्य में हो कर रहेंगी।
    आइये अब सूरए नूर की आयत नंबर 56 और 57 की तिलावत सुनें।

    وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآَتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ (56) لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ وَمَأْوَاهُمُ النَّارُ وَلَبِئْسَ الْمَصِيرُ (57)
    और नमाज़ स्थापित करो, ज़कात दो और पैग़म्बर का आज्ञापालन करोकि शायद तुम पर दया की जाए। (24:56) कदापि यह न समझो कि कुफ़्र अपनाने वाले हमें, धरती में असहाय बना देने वाले हैं। उनका ठिकाना (नरक की) आग हैऔर वह बहुत ही बुरा ठिकाना है। (24:57)

    पिछली आयतों का क्रम जारी रखते हुए इन आयतों में भी ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर के आदेशों के पालन पर एक बार फिर बल दिया गया है। आयतें कहती हैं कि नमाज़ पढ़ कर ईश्वर से संबंध मज़बूत बनाना, ज़कात दे कर दरिद्रों से निकट संबंध स्थापित करना और ईश्वरीय दूत के आदेशों का पालन करके उसके साथ सुदृढ़ संबंध स्थापित करना हर वास्तविक ईमान वाले व्यक्ति का दायित्व है। स्पष्ट है कि ईमान वाले इन्हीं संबंधों की रक्षा से, इस्लामी सरकार के बाक़ी व सुदृढ़ रहने के संबंध में ईश्वर की दया व कृपा के पात्र बन सकते हैं।
    निश्चित रूप से ईमान वालों द्वारा उठाए गए क़दमों के मुक़ाबले में इस्लाम के शत्रु भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहेंगे और अपने हाथ से सत्ता नहीं जाने देंगे, इसी लिए आगे चल कर आयतें कहती हैं कि उनकी इच्छा, ईश्वर की इच्छा के मुक़ाबले में कुछ नहीं है और सत्य के पक्षधर लोगों की अंतिम विजय के संबंध में ईश्वरीय इच्छा के व्यवहारिक होने को नहीं रोक सकती।

    इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लाम की दृष्टि में उपासना, अर्थव्यवस्था और राजनैतिक, सामाजिक व सरकारी मामले एक दूसरे से अलग नहीं हैं।
    काफ़िर चाहे जितने भी सशक्त हों, संसार में इस्लाम के प्रसार को रोकने के उनके प्रयास सफल नहीं हो सकेंगे और एक दिन इस्लाम की सरकार स्थापित हो कर रहेगी।

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