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    सूरए नूर, आयतें 6-14, (कार्यक्रम 626)

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    आइये पहले सूरए नूर की आयत क्रमांक छः से दस तक की तिलावत सुनें।
    وَالَّذِينَ يَرْمُونَ أَزْوَاجَهُمْ وَلَمْ يَكُنْ لَهُمْ شُهَدَاءُ إِلَّا أَنْفُسُهُمْ فَشَهَادَةُ أَحَدِهِمْ أَرْبَعُ شَهَادَاتٍ بِاللَّهِ إِنَّهُ لَمِنَ الصَّادِقِينَ (6) وَالْخَامِسَةُ أَنَّ لَعْنَةَ اللَّهِ عَلَيْهِ إِنْ كَانَ مِنَ الْكَاذِبِينَ (7) وَيَدْرَأُ عَنْهَا الْعَذَابَ أَنْ تَشْهَدَ أَرْبَعَ شَهَادَاتٍ بِاللَّهِ إِنَّهُ لَمِنَ الْكَاذِبِينَ (8) وَالْخَامِسَةَ أَنَّ غَضَبَ اللَّهِ عَلَيْهَا إِنْ كَانَ مِنَ الصَّادِقِينَ (9) وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ وَأَنَّ اللَّهَ تَوَّابٌ حَكِيمٌ (10)
    और जो लोग अपनी पत्नियों पर (व्यभिचार का) लांछन लगाएं और उनके पास स्वयं के अतिरिक्त गवाह न हों, तो उनमें से प्रत्येक चार बार अल्लाह की क़सम खाकर यह गवाही दे कि वह सच्चों में से है। (24:6) और पाँचवी बार यह कहे कि यदि वह झूठा हो तो उस पर अल्लाह की लानत अर्थात धिक्कार हो। (24:7) और पत्नी का दंड इस प्रकार टल सकता है कि वह चार बार अल्लाह की क़सम खा कर गवाही दे कि वह (उस पर लांछन लगाने में) झूठा है। (24:8) और पाँचवी बार यह कहे कि (स्वयं) उस पर ईश्वर का प्रकोप हो, यदि वह सच्चा हो। (24:9) और यदि तुम पर ईश्वर की कृपा और उसकी दया न होती (तो तुममें से अनेक कड़े ईश्वरीय दंड में ग्रस्त हो जाते) और यह कि ईश्वर बड़ा तौबा स्वीकार करने वाला और अत्यन्त तत्वदर्शी है। (24:10)
    पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि यदि कोई किसी पर व्यभिचार का आरोप लगाए और चार गवाह न ला सके तो स्वयं उसे लांछन लगाने के अपराध में अस्सी कोड़े मारे जाएंगे। ये आयतें इस आदेश में एक अपवाद का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि यदि कोई पति अपनी पत्नी को किसी दूसरे मर्द के साथ देख ले और क़ाज़ी के पास जा कर गवाही दे तो उसे दूसरे गवाह लाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यही पर्याप्त है कि वह चार बार ईश्वर की सौगंध खा कर कहे कि वह सच बोल रहा है और एक बार यह कहे कि यदि मैं झूठ बोल रहा हूं तो मुझ पर ईश्वर की धिक्कार हो।
    पति की इन सौगंधों के मुक़ाबले में पत्नी या तो अपने ग़लत कार्य को स्वीकार करके पति के दावे की पुष्टि करेगी या फिर उस कार्य का इन्कार कर देगी। इस स्थिति में उसे अपने बचाव में पुरुष की ही भांति पांच बार सौगंध खानी होगी। इस प्रकार से कि चार बार यह कहे कि ईश्वर की सौगंध! मेरा पति झूठ बोल रहा है और पांचवी बार कहे कि यदि मेरा पति सच बोल रहा हो तो मुझ पर ईश्वर की ओर से कोप आए।
    पति व पत्नी की सौगंधों के बाद पति पर से लांछन लगाने का दंड समाप्त हो जाएगा तथा पत्नी पर से व्यभिचार की सज़ा ख़त्म हो जाएगी। अलबत्ता इन सौगंधों के कुछ परिणाम भी हैं, जैसे यह कि वे तलाक़ के बिना ही सदा के लिए एक दूसरे से अलग हो जाएंगे और फिर कभी वे एक दूसरे से विवाह नहीं कर सकेंगे। इस आधार पर जिस मामले में गवाह मौजूद न हो उसमें केवल ईश्वर की सौगंध ही दावे के सिद्ध या रद्द होने का आधार बन सकती है और इसमें महिला व पुरुष में कोई अंतर नहीं है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि पारिवारिक मामलों में महिला व पुरुष के सम्मान की रक्षा और समाज में अश्लीलता के प्रचलन को रोकने के लिए, स्वयं उन्हीं की बात उनके संबंध में तर्क का दर्जा रखती है और बाहरी गवाहों की आवश्यकता नहीं है।
    सौगंधों के बारे में इस्लाम के नियम लोगों के नियंत्रण के लिए हैं ताकि वे एक दूसरे को अपमानित न कर सकें।
    इस्लामी समाज में ईश्वर की सौगंध बहुत अधिक पावन होनी चाहिए ताकि कोई अकारण सौगंध खाने या उसे झुठलाने का दुस्साहस न कर सके।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक ग्यारह की तिलावत सुनें।
    إِنَّ الَّذِينَ جَاءُوا بِالْإِفْكِ عُصْبَةٌ مِنْكُمْ لَا تَحْسَبُوهُ شَرًّا لَكُمْ بَلْ هُوَ خَيْرٌ لَكُمْ لِكُلِّ امْرِئٍ مِنْهُمْ مَا اكْتَسَبَ مِنَ الْإِثْمِ وَالَّذِي تَوَلَّى كِبْرَهُ مِنْهُمْ لَهُ عَذَابٌ عَظِيمٌ (11)
    निःसंदेह जिन लोगों ने वह लांछन लगाया वे स्वयं तुम्हारे ही भीतर का एक गुट था। उसे तुम अपने लिए बुरा मत समझो, बल्कि वह तुम्हारे लिए अच्छा ही है (क्योंकि यह पवित्र लोगों की विरक्तता और झूठों के अपमान का कारण है।) उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के लिए उतना ही भाग है जितना पाप उसने कमायाऔर उनमें से जिसने उसके एक बड़े भाग का दायित्व अपने सिर लिया उसके लिए बड़ी यातना है। (24:11)
    पिछली आयतों में पतिव्रता महिलाओं पर लांछन लगाने के दंड का उल्लेख करने के पश्चात यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल में उनकी एक पत्नी के संबंध में घटने वाली घटना की ओर संकेत करती है। इतिहास की किताबों में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम एक यात्रा में अपनी पत्नी हज़रत आयशा को भी अपने साथ ले गए। मदीना वापसी के समय वे एक निजी काम से कारवां से अलग हो गईं और उससे थोड़ा पीछे रह गईं। पैग़म्बरे इस्लाम के एक साथी ने, जो कारवां से पिछड़ गए थे, आयशा को कारवां तक पहुंचा दिया। कुछ लोगों ने आयशा और पैग़म्बर के उस साथी पर अनुचित आरोप लगाया और यह झूठ, लोगों के बीच फैल गया।
    ईश्वर ने यह आयत भेजी और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके साथियों को, जो इस घटना से अत्यंत दुःखी थे, सांत्वना दी कि इस घटना में उनके लिए भलाई निहित है और वह यह कि इससे कुछ मिथ्याचारियों के चेहरे सामने आ गए हैं जिन्हें इस झूठ और अफ़वाह के कारण लोगों ने पहचान लिया है। यह अफ़वाह फैलाने में उनमें से जिसकी, जितनी भी भूमिका होगी उसी के अनुपात से उसे दंडित किया जाएगा। इन मिथ्याचारियों में अब्दुल्लाह इब्ने उबय को, जो मदीने के मिथ्याचारियों का सरग़ना था, यह झूठ और आरोप फैलाने के कारण कड़ा दंड दिया जाएगा।
    इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु सदैव बाहर से ही वार नहीं करता बल्कि कभी-2 घर के मिथ्याचारी भी अफ़वाह फैला कर चोट पहुंचाते हैं और इस्लामी समाज को अनेक समस्याओं में ग्रस्त कर देते हैं।
    सार्वजनिक पापों और अपराधों में हर कोई अपनी भागीदारी के हिसाब से अपराधी होता है। निश्चित रूप से उन लोगों का दंड दूसरों से अधिक कड़ा होता है जो अपराधों और षड्यंत्रों में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
    आइये अब सूरए नूर की आयत क्रमांक 12, 13, और 14 की तिलावत सुनें।
    لَوْلَا إِذْ سَمِعْتُمُوهُ ظَنَّ الْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بِأَنْفُسِهِمْ خَيْرًا وَقَالُوا هَذَا إِفْكٌ مُبِينٌ (12) لَوْلَا جَاءُوا عَلَيْهِ بِأَرْبَعَةِ شُهَدَاءَ فَإِذْ لَمْ يَأْتُوا بِالشُّهَدَاءِ فَأُولَئِكَ عِنْدَ اللَّهِ هُمُ الْكَاذِبُونَ (13) وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ لَمَسَّكُمْ فِي مَا أَفَضْتُمْ فِيهِ عَذَابٌ عَظِيمٌ (14)
    ऐसा क्यों न हुआ कि जब तुम लोगों ने उस (आरोप) को सुना था, तब मोमिन पुरुष और महिलाएं अपने आपसे अच्छी सोच रखते और कहते कि यह तो खुला हुआ लांछन है? (24:12) वे इस पर चार गवाह क्यों न लाए? अब जबकि वे गवाह नहीं लाए, तो ईश्वर के निकट वही झूठे हैं। (24:13) और यदि लोक-परलोक में तुम पर ईश्वर की कृपा और उसकी दया न होती तो जिस बात में तुम पड़ गए उसके कारण निश्चय ही एक बड़ा दंड तुम्हें आ लेता। (24:14)
    पिछली आयतों का क्रम जारी रखते हुए ये आयतें उन ईमान वालों को संबोधित करती हैं जो अपने भोलेपन के कारण प्रभावित हो गए और उन्होंने बिना किसी जांच के आरोप की यह अफ़वाह दूसरों तक पहुंचा दी। आयत कहती है कि जब उन्होंने ईमान वालों के बारे में मिथ्याचारियों की बात सुनी तो ईमान वालों के बारे में भला विचार क्यों न रखा और क्यों नहीं कहा कि यह खुला हुआ झूठ है? तुम लोगों को पैग़म्बर की पत्नी की पवित्रता व सतीत्व का विश्वास था और मिथ्याचारियों द्वारा अफ़वाहें फैलाए जाने की बात भी तुम्हारे लिए नई नहीं थी तो तुमने क्यों इस बात को स्वीकार कर लिया? क्यों तुमने उन लोगों से चार गवाह प्रस्तुत करने के लिए नहीं कहा ताकि यदि वे चार गवाह प्रस्तुत न कर पाते तो तुम पवित्र लोगों पर आरोप लगाने के दोष में उन्हें दंडित करते?
    वस्तुतः ईमान वालों के लिए इस आयत का संदेश यह है कि न केवल यह कि उन्हें दूसरों के बारे में बुरे विचार नहीं रखने चाहिए बल्कि यदि वे कोई आरोप सुनें भी तो उसे स्वीकार न करें और पवित्र लोगों का बचाव करें। हां, यदि स्पष्ट तर्कों और प्रमाणों से किसी का दोषी होना सिद्ध हो जाए तो बात अलग है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि समाज में फैलने वाली अफ़वाहों के संबंध में उचित प्रतिक्रिया प्रकट करनी चाहिए, इस संबंध में न तो मौन ही सही है और न ही अफ़वाह को फैलने देना।
    समाज के किसी भी सदस्य पर आरोप, बाक़ी सभी सदस्यों पर आरोप के समान है।
    ईमान वालों के संबंध में भले विचार रखना, ऐसा सिद्धांत है जो इस्लामी समाज के सभी लोगों के संबंध में अपनाया जाना चाहिए।
    पैग़म्बर तथा उनके परिजनों के सम्मान की रक्षा सभी मुसलमानों के लिए अनिवार्य है और जो भी जिस प्रकार भी उन पर प्रश्न चिन्ह लगाने का प्रयास करे उसे गंभीरता से रोका जाना चाहिए।

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