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    सूरए नूर, आयतें 62-64, (कार्यक्रम 638)

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    إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ آَمَنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَإِذَا كَانُوا مَعَهُ عَلَى أَمْرٍ جَامِعٍ لَمْ يَذْهَبُوا حَتَّى يَسْتَأْذِنُوهُ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَأْذِنُونَكَ أُولَئِكَ الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ فَإِذَا اسْتَأْذَنُوكَ لِبَعْضِ شَأْنِهِمْ فَأْذَنْ لِمَنْ شِئْتَ مِنْهُمْ وَاسْتَغْفِرْ لَهُمُ اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (62)
    ईमान वाले तो बस वही हैं जो ईश्वर और उसके पैग़म्बर पर पूरा ईमान रखते हैं और जब भी किसी सामूहिक मामले में उनके साथ हों तो जब तक कि उनसे (जाने की) अनुमति न ले लें, नहीं जाते। (हे पैग़म्बर!) जो लोग (आवश्यकता पड़ने पर) आपसे अनुमति ले लेते है, वही लोग ईश्वर और उसके पैग़म्बर पर ईमान रखते हैं, तो जब वे किसी काम के लिए आपसे अनुमति चाहें तो उनमें से जिसे चाहिए (आवश्यकता के अनुसार) अनुमति दे दिया कीजिएऔर उन लोगों के लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना कीजिए कि निःसंदेह ईश्वर अत्यंत क्षमाशील औरदयावान है। (24:62)

    इससे पहले मुसलमानों के बीच एक दूसरे से मेलजोल की शैली का वर्णन किया गया। यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के साथ मुसलमानों के व्यवहार की शैली के बारे में कहती है कि ईश्वर पर ईमान की एक निशानी उसके पैग़म्बर का आज्ञापालन है। समाज के महत्वपूर्ण मामलों में उनकी अनुमति के बिना कोई काम नहीं किया जाना चाहिए और यदि महत्वपूर्ण मामलों में सार्वजनिक उपस्थिति आवश्यक हो और तुम उनके साथ हो तो जब तक वे अनुमति न दे दें कहीं न जाओ।
    अलबत्ता यह आयत केवल पैग़म्बर के काल से विशेष नहीं है बल्कि जो कोई भी अपनी योग्यता के आधार पर इस्लामी समाज का नेतृत्व कर रहा हो, ईमान वालों को उसका अनुसरण करना चाहिए तथा सामाजिक मामलों में लोगों की ओर से उसकी इच्छा के बिना कोई काम नहीं होना चाहिए।
    स्वाभाविक है कि धर्म के नेता व्यक्ति व समाज के हितों के आधार पर निर्णय करते हैं और उनका आदेश या अनुमति, ईश्वरीय दायित्वों के पालन के परिप्रेक्ष्य में होती है। अतः जो लोग उनसे कहीं जाने की अनुमति चाहते हैं वे उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उनके पापों को क्षमा कर दे।
    क़ुरआने मजीद की तफ़सीर अर्थात व्याख्या की किताबों में वर्णित है कि हन्ज़ला नामक एक व्यक्ति की शादी की रात ही पैग़म्बरे इस्लाम व मुसलमानों को उहद नामक युद्ध के लिए मदीना नगर से निकलना था। उसने पैग़म्बर से अनुमति ली कि वह विवाह के समारोह में भाग लेकर सुबह मुसलमानों के साथ आ मिलेगा। शादी की अगली सुबह वह जेहाद में भाग लेने के लिए इतना आतुर था कि बिना नहाए हुए ही घर से निकल पड़ा। उहद नामक स्थान पर जहां युद्ध हो रहा था वह मुसलमानों से जा मिला और फिर जेहाद में शामिल हो गया। अंततः उस युद्ध में वह शहीद हुआ जिसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा कि आकाश के फ़रिश्तों ने उसे नहलाया और स्वर्ग में ले गए।
    इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक ज़िम्मेदारियों में, एकजुटता बनाए रखने और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संगठनात्मक अनुशासन का पालन आवश्यक है।
    सार्वजनिक कार्यों में जो समरसता व परामर्श के आधार पर किए जाते हैं, एकपक्षीय फ़ैसले नहीं किए जाने चाहिए।
    इस्लामी समाज को सदैव ही अपने नेता के आदेशों का पालन करना चाहिए और उसकी अनुमति के बिना कोई दायित्व नहीं छोड़ना चाहिए।
    इस्लामी समाज के नेताओं को अपनी नीतियों को लागू करते समय लचक का प्रदर्शन करना चाहिए और लोगों की कठिनाइयों को समझते हुए दया से काम लेना चाहिए।
    आइये अब सूरए नूर की आयत नंबर 63 और 64 की तिलावत सुनें।

    لَا تَجْعَلُوا دُعَاءَ الرَّسُولِ بَيْنَكُمْ كَدُعَاءِ بَعْضِكُمْ بَعْضًا قَدْ يَعْلَمُ اللَّهُ الَّذِينَ يَتَسَلَّلُونَ مِنْكُمْ لِوَاذًا فَلْيَحْذَرِ الَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنْ أَمْرِهِ أَنْ تُصِيبَهُمْ فِتْنَةٌ أَوْ يُصِيبَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (63) أَلَا إِنَّ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ قَدْ يَعْلَمُ مَا أَنْتُمْ عَلَيْهِ وَيَوْمَ يُرْجَعُونَ إِلَيْهِ فَيُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُوا وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ (64)
    (हे ईमान वालो!) अपने बीच पैग़म्बर के बुलाने को तुम आपस में एक दूसरे को बुलाने जैसा न समझना। ईश्वर उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो तुममें से ऐसे हैं कि (एक-दूसरे की) आड़ लेकर चुपके से (उनके पास से) हट जाते है। तो उन्हें,जो उनके आदेश की अवहेलना करते हैं, डरना चाहिए कि कहीं (संसार में ही) उन पर कोई परीक्षा आ पड़े या उन पर कोई कड़ा दंड ही आ जाए। (24:63) जान लो! आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, ईश्वर ही का है। वह जानता है तुम जिस (नीति) पर हो। और जिस दिन वे उसकी ओर पलटेंगे, तो जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। ईश्वर तो हर चीज़ का ज्ञानी है। (24:64)

    पिछली आयत के क्रम को जारी रखते हुए, जिसमें कहा गया है कि ईमान वालों को, पैग़म्बर की अनुमति के बिना कोई कार्य नहीं छोड़ना चाहिए, यह आयत कहती है कि जब भी पैग़म्बर तुम्हें किसी काम के लिए बुलाएं तो उससे बचने के लिए स्वयं को उनकी नज़रों से छिपाने का प्रयास न करो और वहां से धीरे से हट न जाओ। जान लो कि पैग़म्बर की बात का विरोध और उनके आदेश की अवहेलना का लोक परलोक में तुम्हारे लिए बड़ा बुरा परिणाम निकलेगा। संसार में व्यक्तिगत व सामाजिक समस्याएं व कठिनाइयां तुम पर आ पड़ेंगी और तुम कड़ी परीक्षाओं में ग्रस्त हो जाओगे जबकि पैग़म्बर के विरोध के कारण प्रलय में कड़ा दंड तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा होगा।
    आगे चल कर आयत कहती है कि तुम लोग पैग़म्बर के आदेश को अन्य लोगों के आदेशों की भांति क्यों समझते हो और उसका विरोध करते हो या उससे बचने का प्रयास करते हो? यदि तुम अपनी चालों के माध्यम से स्वयं को पैग़म्बर की नज़रों से छिपा भी लो तो, ईश्वर से किस प्रकार बच पाओगे जो हर चीज़ का जानने वाला है? ईश्वर सदैव तुम पर दृष्टि रखता है और वह तुम्हारे भीतर व बाहर की हर बात से अवगत है। वह न केवल तुम पर बल्कि संपूर्ण सृष्टि पर प्रभुत्व रखता है और कोई भी चीज़ उसकी नज़रों से ओझल नहीं है। वही ईश्वर प्रलय में न्याय करने वाला है और तुम्हारा कर्मपत्र तुम्हारे हवाले करके तुम्हारी स्थिति को स्पष्ट कर देगा।

    सूरए नूर की अंतिम आयत मनुष्यों के कर्मों के संबंध में ईश्वर के ज्ञान पर तीन बार बल देती है ताकि कोई यह न सोचे कि वह गुप्त रूप से कोई काम कर सकता है या ऐसे स्थान पर जा सकता है जो ईश्वर की नज़रों से ओझल हो। स्वाभाविक है कि जिसे इस बात पर विश्वास हो कि ईश्वर, सृष्टि को अपने घेरे में लिए हुए है तथा वह अपने बंदों के सभी कर्मों को देख रहा है तो वह कभी भी पाप नहीं करेगा क्योंकि यह आस्था एक मज़बूत प्रतिरोधक के रूप में उसे पापों व पथभ्रष्टताओं से रोके रखती है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के पैग़म्बर और अन्य प्रिय बंदे, पवित्र और सम्मानीय हस्तियां हैं जिनके सम्मान की रक्षा हर स्थिति में होनी चाहिए। उनका नाम सम्मान से लिया जाना चाहिए, उनके निमंत्रण को अन्य लोगों के निमंत्रण के समान नहीं समझना चाहिए बल्कि उत्तम ढंग से उनका उत्तर देना चाहिए।
    ईश्वर के आदेश या पैग़म्बर की इच्छा के विरोध का परिणाम लोक-परलोक में समस्याओं के रूप में सामने आता है। संसार और प्रलय में शांति व संतोष, धार्मिक आदेशों के पालन में निहित है।
    इस बात पर ईमान कि ईश्वर, मनुष्य के विचारों व कर्मों से अवगत है, व्यक्ति को बुराइयों व पापों से रोके रखता है।

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