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    सूरए बक़रह;आयतें 158-162 (कार्यक्रम 51)

    सूरए बक़रह;आयतें 158-162 (कार्यक्रम 51)
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    सूरए बक़रह की १५८वीं आयत इस प्रकार है।إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَا وَمَنْ تَطَوَّعَ خَيْرًا فَإِنَّ اللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ (158)निःसन्देह, सफ़ा और मरवा ईश्वर की निशानियां हैं अतः जो भी ईश्वर के घर का हज या उमरा करे उसके लिए कोई बाधा नहीं है कि वो सफ़ा और मरवा के बीच तवाफ़ करे और जो कोई भले कार्यों में ईश्वर के आदेशों का पालन करे तो ईश्वर उसके कर्म को जानने वाला और कृतज्ञ है। (2:158) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के काल से आरंभ होने वाले हज़ में विभिन्न कालों में नादान और मूर्तिपूजा करने वाले लोगों द्वारा अनेक अनुचित बातें शामिल कर दी गई थीं। इस्लाम ने इस महान उपासना के मूल रूप की सुरक्षा करते हुए उसे बुराइयों से दूर किया। हज का एक भाग सफ़ा व मरवा की बीच सई अर्थात मस्जिदुल हराम के समीप स्थित इन दो पहाड़ों के बीच चक्कर काटना है। परन्तु मूर्तिपूजा करने वालों ने इन दोनों पर्वतों के ऊपर मूर्तियां रख दीं थीं और सई करने के दौरान इन मूर्तियों का भी चक्कर काटते थे। जब मुसलमान हज करना चाहते थे तो उन्हें इस बात के कारण सई करने में हिचकिचाहट होती और वे सोचते कि इन दोनों पर्वतों पर अतीत में मूर्तियां रखे जाने के कारण उनके बीच सई नहीं करनी चाहिए। परन्तु यह आयत उतरी कि ये दोनों पर्वत ईश्वरीय शक्ति की निशानी हैं और हज के संस्थापक हज़रत इब्राहीम के प्रयासों की याद दिलाते हैं और यदि नादान और वास्तविकता से अनभिज्ञ लोगों ने इन्हें अनेकेश्वरवाद की निशानियों से दूषित कर दिया है तो तुम्हें इन्हें छोड़ नहीं देना चाहिए बल्कि बड़ी संख्या में यहां उपस्थित होकर पथभ्रष्टों को यहां से भागने पर विवश करना चाहिए। जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपनी पत्नी और पुत्र के साथ मक्के की धरती पर आए तो ईश्वरीय अभियान को पूरा करने के लिए उन्हें इस शुष्क धरती पर छोड़कर चले गए। बच्चे की मां पानी की खोज में इन दोनों पर्वतों के बीच दौड़ती रही परन्तु ईश्वर ने शिशु की उंगलियों के नीचे से एक सोता निकाला जिसे ज़मज़म कहते हैं। उस दिन से ईश्वर के आदेश पर जो कोई भी काबे की ज़ियारत के लिए जाता है वह सफ़ा और मरवा के बीच हज़रत हाजेरा के प्रयास की याद में इन दोनों पर्वतों के बीच सई करता है और उनके बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। यह कार्य, निष्ठापूर्वक किये गए उस प्रयास पर ईश्वर की कृतज्ञता की निशानी है जो हमें ये सिखाता है कि लोगो के आभार व कृतज्ञता के विचार में सही नहीं रहना चाहिए क्योंकि ईश्वर हमारे भले कर्मों से परिचित भी है और उनपर कृतज्ञ भी।सूरए बक़रह की १५९वीं आयत इस प्रकार है।إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ وَالْهُدَى مِنْ بَعْدِ مَا بَيَّنَّاهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتَابِ أُولَئِكَ يَلْعَنُهُمُ اللَّهُ وَيَلْعَنُهُمُ اللَّاعِنُونَ (159)निश्चित रूप से वे लोग जो स्पष्ट तर्कों और मार्गदर्शन को हमारे द्वारा किताब में लोगों के लिए उल्लेख किये जाने के बावजूद छुपाते हैं, ईश्वर उनपर धिक्कार करता है और सभी धिक्कार करने वाले भी उनपर धिक्कार करते हैं। (2:159) यह आयत यहूदियों और ईसाई विद्वानों के बारे में उतरी है जो पैग़म्बर के आने की निशानियों को छुपाते थे हालांकि वे उनकी किताबों में मौजूद थीं, इस प्रकार वे मार्गदर्शन और कल्याण प्राप्त करने के मार्ग में पैग़म्बरों द्वारा उठए गए कष्टों को बर्बाद कर रहे थे। यदि अनभिज्ञ लोग सत्य छुपाएं तो उन्हें कम दंड दिया जाता है परन्तु यही कार्य यदि किसी समुदाय के विद्वान करें तो यह जनता, पैग़म्बरों और ईश्वर के प्रति सबसे बड़ा अत्याचार है अतः वे इन लोगों द्वारा सदैव धिक्कार के पात्र बने रहते हैं। यह आयत स्पष्ट रूप से बताती है कि भले और पवित्र लोगों से मित्रता की अभिव्यक्ति के साथ ही अपवित्र और बुरे लोगों विशेषकर उन लोगों में से जो जनता की पथभ्रष्टता का कारण बनते हैं अपनी घृणा, धिक्कार द्वारा व्यक्त करनी चाहिए। अलबत्ता ईश्वर ने अगली आयत में एक गुट को इन लोगों से अलग किया है। सूरए बक़रह की १६०वीं आयत इस प्रकार है।إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا وَأَصْلَحُوا وَبَيَّنُوا فَأُولَئِكَ أَتُوبُ عَلَيْهِمْ وَأَنَا التَّوَّابُ الرَّحِيمُ (160)सिवाए उनके जिन्होंने तौबा की, स्वंय को सुधारा और जो बातें छुपाई थीं उनको प्रकट किया, इस दशा में मैं उनपर अपनी कृपा व दया (का द्वार) खोल दूंगा और मैं तौबा स्वीकार करने वाला दयावान हूं। (2:160) इस्लाम में कोई बंद गली नहीं है। ईश्वर ने सदा ही आशा और वापसी का मार्ग, मनुष्य के लिए खुला छोड़ रखा है ताकि सबसे अधिक पाप करने वाला व्यक्ति भी उसकी दया की ओर से निराश न हो सके। अलबत्ता यह बात स्पष्ट है कि हर पाप का प्रायश्चित उसी के अनुकूल होता है ताकि उस पाप के लक्षणों की यथासंभव भरपाई हो सके। इसी कारण सत्य को छुपाने का प्रायश्चित, उसे लोगो के सामने प्रकट करके किया जा सकता है ताकि लोग पथभ्रष्ट न हो और सही मार्ग पर आ जाए।सूरए बक़रह की १६१वीं और १६२वीं आयतें इस प्रकार है।إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا وَمَاتُوا وَهُمْ كُفَّارٌ أُولَئِكَ عَلَيْهِمْ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ (161) خَالِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنْظَرُونَ (162)जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया अर्थात ईश्वर का इन्कार किया और कुफ़्र की हालत ही में मर गए तो उनपर ईश्वर, उसके फ़रिश्तों तथा सभी लोगों की ओर से धिक्कार होगी। (2:161) वे उसी (धिक्कार और ईश्वर की दया से दूरी) में बाक़ी रहेंगे, न उनके दंड में कोई ढील होगी और न ही उन्हें मोहलत दी जाएगी। (2:162) पिछली आयत में कहा गया था कि यदि वास्तविकता को छिपाने वाले उसे जनता के सामने प्रकट कर दें तो वे ईश्वर की दया के पात्र बन जाते हैं, यह आयत पुनः चेतावनी देती है कि यदि काफ़िरों ने ऐसा न किया तो उनपर फिर ईश्वर, उसके फ़रिश्तों और लोगों की धिक्कार होगी। क्योंकि तौबा अर्थात प्रायश्चित, मौत आने से पूर्व तक ही प्रभावशाली है और मौत की निशानियां दिखने के पश्चात तौबा का कोई लाभ नहीं है जैसा कि फ़िरऔन ने भी मौत को सामने देखने के पश्चात तौबा की परन्तु उसका कोई लाभ नहीं हुआ। इसी कारण ईश्वरीय दूतों और पवित्र लोगों की एक प्रार्थना यह रही है कि वे मरते समय मुसलमान मरें क्योंकि कुफ़्र की हालत में मरना ऐसा दर्द है जिसकी कोई दवा नहीं है। ईश्वरीय दया से दूरी वह दंड है जो सत्य छुपाने वालों को लोक व परलोक दोनों में मिलता है और मानवता की सभी अंतरात्माएं इस निंदनीय कार्य पर अपनी घृणा व निंदा को प्रकट करती है। चूंकि ईश्वरीय दण्ड न्याय और तर्क पर आधारित है न कि अत्याचार और प्रतिरोध पर इसलिए जो जान बूझकर वास्तविकता को छुपाता है उसके लिए दंड में कोई कमी नहीं होगी और न उसे मोहलत दी जाएगी क्योंकि उसके ग़लत कार्य के लक्षण न कम होंगे और न ही उनमें देर होगी।आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा। यदि मस्जिद और उपासनागृह जैसे सत्य के केन्द्र, नादान लोगों द्वारा ग़लत बातों से दूषित हो जाएं तो उन्हें छोड़ नहीं देना चाहिए बल्कि उन स्थानों में अपनी उपस्थिति द्वारा उन्हें पवित्र करना चाहिए तथा उपासना के सही मार्ग को पुनर्जीवित करना चाहिए। जो स्थान ईश्वर की दया, शक्ति व चमत्कार प्रकट होने की निशानी हैं उनका आदर, सफ़ा व मरवा की भांति होना चाहिए ताकि भले लोगों तथा उनके प्रयासों की याद लोगों के दिलों में बाक़ी रहे। वास्तविकता को छुपाना ऐसा पाप है जिससे स्वयं वास्तविक्ता छुपाने वाले की अंतरात्मा उसे धिक्कारती रहती है क्योंकि ईश्वर ने वास्तविकता की खोज और उसके प्रेम की भावना सभी मनुष्यों की प्रवृत्ति में रखी है। ईश्वर ने एक ओर तो ग़लती करने वालों के लिए तौबा और वापसी की संभावना रखी है और दूसरी ओर तौबा स्वीकार करने का वादा किया है तथा स्वयं को तौबा स्वीकार करने वाला परिचित करवाया है। मनुष्य का अंत महत्वपूर्ण है कि वो ईश्वर पर आस्था रखते हुए मरता है या उसका इन्कार करके मरता है अलबत्ता यह अंत भी उसके जीवन भर के कर्मों का परिणाम होता है।