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    सूरए बक़रह;आयतें 163-166 (कार्यक्रम 52)

    सूरए बक़रह;आयतें 163-166 (कार्यक्रम 52)
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    सूरए बक़रह की १६३वीं और १६४वीं आयतें इस प्रकार है।وَإِلَهُكُمْ إِلَهٌ وَاحِدٌ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الرَّحْمَنُ الرَّحِيمُ (163) إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَالْفُلْكِ الَّتِي تَجْرِي فِي الْبَحْرِ بِمَا يَنْفَعُ النَّاسَ وَمَا أَنْزَلَ اللَّهُ مِنَ السَّمَاءِ مِنْ مَاءٍ فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا وَبَثَّ فِيهَا مِنْ كُلِّ دَابَّةٍ وَتَصْرِيفِ الرِّيَاحِ وَالسَّحَابِ الْمُسَخَّرِ بَيْنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ لَآَيَاتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ (164)तुम्हारा ईश्वर वह अकेला ईश्वर है जिसके अतरिक्त कोई ईश्वर नहीं। वो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। (2:163) निःसन्देह, आकाशों और धरती की सृष्टि में तथा दिन और रात के आने जाने में, और लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए समुद्र में चलने वाली कश्तियों में, और आकाश से ईश्वर द्वारा उतारे गए पानी में जिसके द्वारा उसने धरती को उसकी मृत्यु के पश्चात जीवित किया और उसमे विभिन्न प्रकार के जीव फैले हैं और इसी प्रकार हवाओं के चलने में तथा धरती व आकाश के बीच रहने वाले बादलों में, सोच-विचार करने वालों के लिए निशानियां हैं। (2:164) ईश्वर के एक होने का सबसे अच्छा तर्क प्रकृति के तत्वों के बीच समन्वय है जैसे बादलों, हवा, वर्षा तथा धरती के बीच समन्वय जिसने विभिन्न जीवों के जीवन और विकास की भूमि समतल की है। यह समन्वित व्यवस्था एक ओर तो संसार के एक रचयिचता की निशानी है और दूसरी ओर उसके असीम ज्ञान व शक्ति की भी परिचायक है। संसार एक लंबी कविता की भांति है जिसमें विभिन्न सुन्दर शेर हैं परन्तु सभी शेर एक ही वज़न और क़ाफ़िए पर हैं और कुल मिलाकर ये दर्शाते हैं कि एक महान कवि ने उनकी रचना की है। यह आयत सृष्टि में ईश्वर की महानता की ६ निशानियों की ओर संकेत करती है जिन्हें हम संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं।प्रथम, आकाशों और धरती की सृष्टि। जिस धरती पर हम जीवन व्यतीत कर रहे हैं वह अपनी महानता के साथ नक्षत्र का केवल एक उपग्रह है और ऐसे करोड़ों नक्षत्र हैं।दूसरे सूर्य के चारों ओर धरती की परिक्रमा है जो दिन-रात और मौसम उत्पन्न होने का कारण है।तीसरे कश्तियां जो सामान ढो कर और यात्रियों को ले जाकर मनुष्य की सेवा करती हैं और यद्यपि बहुत बड़ी और भारी होती हैं परन्तु न केवल यह कि पानी में नहीं डूबतीं बल्कि हवा के चलने से लंबे रास्ते तै करती हैं।चौथे वर्षा जो ईश्वर आकाश से नीचे भेजता है और धरती के पुनर्जीवन तथा विभिन्न पौधों तथा जीवों के उत्पन्न होने का कारण बनती है। यह पानी अत्यंत पवित्र व स्वच्छ होता है और हवा को भी स्वच्छ करता है। पांचवें हवा का चलना जो न केवल कश्तियों के चलने का कारण है बल्कि पौधों के बीज फैलने, बादलों के चलने, ठंडी तथा गर्म हवा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने और शहरों की दूषित हवा के स्थान पर स्वच्छ हवा लाने का भी कारण है। छठे बादल जो पानी का भारी बोझ अपने कंधों पर उठाते हैं परन्तु धरती के गुरुत्वाकर्षण के बावजूद धरती व आकाश के बीच में रहते हैं और अरबों बैरल पानी को निःशुल्क एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते हैं। अलबत्ता स्पष्ट है कि इन निशानियों से केवल वही लोग ईश्वर व उसके एक होने का अनुमान लगा सकते हैं जो इनमें सोच-विचार करते हों।सूरए बक़रह की १६५वीं आयत इस प्रकार है।وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَتَّخِذُ مِنْ دُونِ اللَّهِ أَنْدَادًا يُحِبُّونَهُمْ كَحُبِّ اللَّهِ وَالَّذِينَ آَمَنُوا أَشَدُّ حُبًّا لِلَّهِ وَلَوْ يَرَى الَّذِينَ ظَلَمُوا إِذْ يَرَوْنَ الْعَذَابَ أَنَّ الْقُوَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا وَأَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعَذَابِ (165)लोगों में से कुछ ऐसे भी हैं जो एक ईश्वर के स्थान पर कई को ईश्वर के रूप में मानते हैं और उनको ईश्वर की भांति ही चाहते हैं परन्तु जो लोग ईमान लाए, ईश्वर के प्रति उनका प्रेम कहीं अधिक है। और जिन लोगों ने अत्याचार किया (और ईश्वर के अतिरिक्त किसी और को पूज्य माना) यदि वे उस समय को देखते कि जब उन्हें दण्ड दिया जा रहा होगा तो समझते कि सभी शक्ति ईश्वर की है और उसका दण्ड अत्यंत कड़ा है। (2:165) यद्यपि आकाश, धरती, समुद्र, सभी जीव, पेड़-पौधे और मूल वस्तुएं ईश्वर के एक होने की गवाही देती हैं परन्तु जो कोई इनमें विचार नहीं करता वो केवल विदित बातों को देखता है और ईश्वर के स्थान पर उन्हीं की उपासना करता है। कभी वो अपने जीवन में सितारों की प्रभावशक्ति को मानता है और अपने भाग्य के सितारे की पूजा करता है और कभी कुछ जानवरों को पावन मानता है और उनसे प्रेम करता है। और कभी अपने हाथों से पत्थर या लकड़ी की मूर्ति बनाकर उसके समक्ष नतमस्तक होता है और कभी कुछ मनुष्यों को इस संसार की सृष्टि में प्रभावशाली समझता है और उनक भेट चढ़ने के लिए तैयार हो जाता है। ईश्वर के बजाए अन्य वस्तुओं या जीवों से किया जाने वाला ये प्रेम उन बनावटी ईश्वरों की उपासना और उनके प्रति आदर का कारण बनता है। जबकि ईश्वर पर ईमान के आधार पर होना यह चाहिए कि मनुष्य का हर प्रेम ईश्वर के लिए और उसके मार्ग में हो कि यह प्रेम ज्ञान और पहचान से प्राप्त होता है न कि अनेकेश्वरवादियों द्वारा अपने भाषणों से प्रेम की भांति अज्ञानता, अन्धे अनुसरण और इच्छा पालन के आधार पर। अलबत्ता जो लोग ईश्वर के अतिरिक्त किसी और की उपासना करते हैं यदि वो प्रलय को देखते तो समझ जाते कि सभी शक्तियां ईश्वर के हाथ में हैं और वे लोग अकारण ही सम्मान और शक्ति प्राप्त करने के लिए किसी और की उपासना कर रहे हैं।सूरए बक़रह की १६६वीं आयत इस प्रकार है।إِذْ تَبَرَّأَ الَّذِينَ اتُّبِعُوا مِنَ الَّذِينَ اتَّبَعُوا وَرَأَوُا الْعَذَابَ وَتَقَطَّعَتْ بِهِمُ الْأَسْبَابُ (166)जब प्रलय आएगा तो कुफ़्र के नेता अपने अनुयाइयों से पीछा छड़ाएंगे और सब ईश्वर के प्रकोप को देखेंगे और रिश्ते टूट जाएंगे। (2:166) यह आयत एक चेतावनी है कि हे मनुष्य, बुद्धि से काम ले और देख कि तेरा नेता कौन है? तू किसका अनुकरण कर रहा है और किसका प्रेम तेरे हृदय में है? हमें उससे प्रेम करना चाहिए जो हमें अपने लिए न चाहे ताकि संसार में अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सके, कि ऐसे लोग प्रलय में हमसे घृणा प्रकट करेंगे और हमसे दूर होना चाहेंगे।नेता के चयन में बहुत ही सोच-विचार से काम लेना चाहिए क्योंकि हमारा भविष्य प्रलय तक के लिए उससे संबन्धित है और उस दिन हर मनुष्य अपने नेता के साथ ही रहेगा।आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा।प्रकृति की पहचान, ईश्वर को पहचानने के मार्गों में से एक है क्योंकि प्रवृत्ति एवं प्रकृति, ईश्वर के ज्ञान शक्ति व तर्क के प्रकट होने का स्थान हैं।ईश्वर के स्थान पर किसी मनुष्य या वस्तु का प्रेम अनेकेश्वरवाद तथा ईश्वर से दूरी की निशानी है।ईमान की निशानी, ईश्वर से गहरा प्रेम है जो उसके आदेशों के पालन द्वारा प्रकट होता है। अत्याचारियों और अनेकेश्वरवादी नेताओं के पास प्रलय में न केवल यह कि कोई शक्ति नहीं होगी बल्कि वे इतने बेवफ़ा हैं कि अपने अनुयाइयों से भी दूरी अपनाएंगे।