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    सूरए बक़रह;आयतें 167-171 (कार्यक्रम 53)

    सूरए बक़रह;आयतें 167-171 (कार्यक्रम 53)
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    सूरए बक़रह की १६७वीं आयत इस प्रकार है।وَقَالَ الَّذِينَ اتَّبَعُوا لَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةً فَنَتَبَرَّأَ مِنْهُمْ كَمَا تَبَرَّءُوا مِنَّا كَذَلِكَ يُرِيهِمُ اللَّهُ أَعْمَالَهُمْ حَسَرَاتٍ عَلَيْهِمْ وَمَا هُمْ بِخَارِجِينَ مِنَ النَّارِ (167)और जिन लोगों ने पथभ्रष्ट नेताओं का अनुसरण किया है वे प्रलय के दिन कहेंगे कि काश हमारे पास संसार में वापस लौटने की संभावना होती तो हम इन नेताओं से विरक्त हो जाते, जिस प्रकार आज वे हमसे विरक्त हो गए हैं। इस प्रकार ईश्वर उनके कर्मों को उन्हें दिखाएगा जो उनके लिए हसरत का कारण होगा। और वे नरक की आग से बाहर आने वाले नहीं हैं। (2:167) पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि अपराधी जब ईश्वरीय दंड को देखेंगे तो नेता अपने अनुसरणकर्ताओं से विरक्त हो जाएंगे क्योंकि जो प्रेम, इच्छा और आशा के आधार पर होगा वो प्रलय के दिन घृणा और द्वेष में परिवर्तित हो जाएगा। यह आयत कहती है कि नरकवासी ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि वह उन्हें संसार में पलटा दे तथा वे अपने नेताओं से विरक्त हो जाएंगे क्योंकि उन्हें अपने कार्यों से पश्चाताप और उत्कंठा के अतरिक्त कोई लाभ नहीं मिला है परन्तु क्या फ़ाएदा? क्योंकि न हसरत और दुख से कुछ काम बनेगा और न ही वापस लौटने का कोई मार्ग मौजूद है। जो लोग मनुष्य की विवश्ता में आस्था रखते हैं, उनके समक्ष ये आयत संसार में उसके अधिकार रखने व स्वतंत्र होने को दर्शाते हैं क्योंकि पश्चाताप और हसरत इस बात की निशानी है कि मैं दूसरा काम कर सकता था परन्तु मैंने स्वयं अपनी इच्छा से ग़लत मार्ग का चयन किया।सूरए बक़रह की १६८वीं आयत इस प्रकार है।يَا أَيُّهَا النَّاسُ كُلُوا مِمَّا فِي الْأَرْضِ حَلَالًا طَيِّبًا وَلَا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ (168)हे लोगो! धरती में जो कुछ हलाल व पवित्र है उसमें से खाओ और शैतान के बहकावे में न आओ कि निःसन्देह, वह तुम्हारा खुला हुआ शत्रु है। (2:168) खाना-पीना मनुष्य की एक मूल आवश्यकता है परन्तु अनेक दूसरे कार्यों की भांति इसमें भी बाहुल्य किया जाता है। कुछ लोग चाहते हैं कि बिना किसी क़ानून और मानदंड के, जिस चीज़ को उनका मन चाहे खाएं पीएं, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि बुद्धि और धर्म की दृष्टि से ये खाना पीना उनके लिए ठीक है या नहीं। या यह कि यह चीज़ सही मार्ग से आई है या ग़लत मार्ग से। वे केवल अपना पेट भरना और अपनी इच्छा की पूर्ति करना चाहते हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बिना किसी स्पष्ट तर्क के वे वस्तुए भी नहीं खाते जिनकी अनुमति बुद्धि तथा धर्म ने दे रखी है। वे अपने विचार में इच्छाओं का मुक़ाबला करते हैं। इस्लाम एक व्यापक धर्म है। इसमें खाने और पीने के लिए भी क़ानून मौजूद हैं। शरीर के लिए जो वस्तुएं लाभदायक और आवश्यक हैं उन्हें हलाल किया गया है और जो वस्तुएं मनुष्य के शरीर और उसकी आत्मा के लिए हानिकारक हैं उन्हें हराम या वर्जित किया गया है। यह आयत कहती है कि जो कुछ धरती में है उसे ईश्वर ने तुम्हारे लिए बनाया है अतः जो वस्तु हलाल व पवित्र तथा तुम्हारी प्रकृति के अनुकूल हो उसे खाओ पियो और बेकार में किसी वस्तु को हलाल या हराम न बनाओ क्योंकि यह तुम्हें पथभ्रष्ट करने के लिए शैतान का षड्यंत्र है जैसा कि उसने वर्जित पेड़ का फल खाने के लिए आदम और हौआ को धोखा दिया था। शराब जैसी हराम वस्तुओं का खाना-पीना भी शैतान का बहकावा है और हलाल वस्तुएं न खाना भी कि जो साधारणतः ग़लत विश्वास के आधार पर होता है।सूरए बक़रह की १६९वीं आयत इस प्रकार है।إِنَّمَا يَأْمُرُكُمْ بِالسُّوءِ وَالْفَحْشَاءِ وَأَنْ تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ (169)निःसन्देह, शैतान तुम्हें केवल बुराई का आदेश देता है और यह कि ईश्वर के बारे में ऐसी बात कहो जिसे तुम नहीं जानते। (2:169) पिछली आयत में कहा गया कि शैतान तुम्हारा शत्रु है और यह आयत कहती है कि तुमसे शैतान की शत्रुता की निशानी यह है कि वह सदैव तुम्हें बुराई की ओर बुलाता है जिसका दुर्भाग्य और कठोरता के अतिरिक्त और कोई परिणाम नहीं है। अलबत्ता हमारे ऊपर शैतान का नियंत्रण नहीं है कि वह हमसे अधिकार छीन ले बल्कि पाप के लिए उसके आदेश का तात्पर्य यह है कि वो हमें बहकाता है और हमारे मन में बुरे विचार डालता है तथा मनुष्य का ईमान जितना दुर्बल होता है, शैतानी विचार उतने ही उसमें प्रभावशाली होते हैं। शैतान, पाप का निमंत्रण भी देता है और उसका औचित्य दर्शाने का मार्ग भी दिखाता है। ईश्वर पर आरोप लगाना, पाप की भूमि समतल करने और उसका औचित्य दर्शाने का एक मार्ग है। मनुष्य अपनी अज्ञानता के आधार पर कोई पाप करता है और फिर उसके औचित्य के लिए उसे ईश्वर से संबन्धित कर देता है।सूरए बक़रह की १७०वीं आयत इस प्रकार है।وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّبِعُوا مَا أَنْزَلَ اللَّهُ قَالُوا بَلْ نَتَّبِعُ مَا أَلْفَيْنَا عَلَيْهِ آَبَاءَنَا أَوَلَوْ كَانَ آَبَاؤُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ شَيْئًا وَلَا يَهْتَدُونَ (170)और जब उनसे कहा जाता है कि उस (धर्म) का अनुसरण करो जो ईश्वर ने उतारा है तो वे कहते हैं कि बल्कि हम तो इसका अनुसरण करेंगे, जिसपर हमने अपने पिताओं को पाया है, क्या ऐसा नहीं है कि उनके पिता कोई सोच विचार नहीं करते थे और न ही उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था। (2:170)पूर्वजों की संस्कृति और संस्कारों की सुरक्षा, अच्छी बात है परन्तु तब जब वह संस्कृति बुद्धि व विचार या ईश्वरीय संदेश अर्थात वहि के आधार पर हो न यह कि हम जातीय सांप्रदायिक्ता के कारण अपने पूर्वजों के उल्टे सीधे संस्कारों का अनुसरण करें। मनुष्य में शैतान के प्रभाव का एक मार्ग पूर्वजों का अंधा अनुसरण है कि मनुष्य ईश्वरीय आदेशों के पालन के स्थान पर अपने पूर्वजों की ग़लत धारणाओं का बिना किंतु परन्तु किए अनुसरण करता है जबकि वह स्वयं समझ रहा होता है कि यह कार्य ग़लत है और उसके धर्म ने भी उसे इस प्रकार के कार्य से रोका है।सूरए बक़रह की १७१ वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَمَثَلُ الَّذِينَ كَفَرُوا كَمَثَلِ الَّذِي يَنْعِقُ بِمَا لَا يَسْمَعُ إِلَّا دُعَاءً وَنِدَاءً صُمٌّ بُكْمٌ عُمْيٌ فَهُمْ لَا يَعْقِلُونَ (171)और ईश्वर का इन्कार करने वाले काफ़िरों को इस्लाम का निमंत्रण देने में तुम्हारी उपमा उस गड़रिये के समान है जो ख़तरे के समय अपनी भेड़ों को आवाज़ लगाता है परन्तु उन्हें शोर के अतरिक्त कुछ सुनाई नहीं देता (अर्थात वे कुछ समझ नहीं पातीं) के काफ़िर लोग बहरे, गूंगे और अंधे हैं अतः कुछ नहीं समझते। (2:171) पिछली आयत में कहा गया था कि काफ़िर अपने पूर्वजों की ग़लत धारणाओं का अंधा अनुसरण करते हैं जबकि उनके पूर्वजों ने इन आस्थाओं का आधार न तो विचार और बुद्धि पर रखा था और न ही ईश्वरीय संदेश पर। यह आयत कहती है कि काफ़िर सोच-विचार भी नहीं करते कि उन्हें वास्तविकता का पता चल जाए बल्कि वे सत्य के समक्ष अपनी आंखों और कानों को भी बंद कर लेते हैं ताकि उन्हें कुछ दिखाई और सुनाई न पड़े बिल्कुल उन भेड़ों की भांति जिन्हें गड़रिया चिल्ला चिल्ला कर ख़तरे से अवगत करवाता है परन्तु वे उसकी बातें नहीं समझतीं और उन्हें केवल शोर की आवाज़ सुनाई देती है। उनके पास भी जानवरों की भांति आंख, कान और ज़बान है परन्तु वे सोच विचार नहीं करते इसी कारण वे वास्तविकता और सच को खोज नहीं पाते और अपने पूर्वजों की ग़लत धारणाओं का अनुसरण करने लगते हैं। जो कुछ उन्होंने कहा है उसका आंखें बंद करके अनुसरण करने लगते हैं। इन आयतों से मिलने वाले पाठः मनुष्य जानवर नहीं है जो अपने पेट का दास बन जाए बल्कि उसे ईश्वरीय आदेशों के आधार पर पवित्र व हलाल वस्तुओं से अपनी आहार संबन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिए। जो कोई भी मनुष्य को बुराई की ओर बुलाए वह शैतान है, चाहे वह मनुष्य के रूप में क्यों न हो। पूर्वजों की परंपराओं और संस्कारों का अनुसरण केवल उसी दशा में लाभदायक है जब वह ज्ञान और बुद्धि के आधार पर हो वरना ग़लत संस्कारों के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरण का पतन और रुढ़िवाद से अतिरिक्त और कोई परिणाम नहीं रहेगा। मनुष्य का मूल्य उसकी बुद्धि और मंथन से है वरना दूसरे जानवरों के पास भी आंख, ज़बान और कान होते हैं।