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    सूरए बक़रह;आयतें 172-176 (कार्यक्रम 54)

    सूरए बक़रह;आयतें 172-176 (कार्यक्रम 54)
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    सूरए बक़रह की १७२वीं आयत इस प्रकार है।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَاشْكُرُوا لِلَّهِ إِنْ كُنْتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ (172)हे ईमान लाने वाले लोगो, हमने जो तुम्हें पवित्र विभूतियां दी हैं, उनमें से खाओ और ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहो यदि तुम केवल उसी की उपासना करते हो। (2:172) संसार एक बाग़ की भांति है और पवित्र लोग एक बाग़ के फूल हैं। ईश्वर की विभूतियां उस पानी की भांति हैं जो फूल उगाने के लिए माली, बाग़ में डालता है, परन्तु इसका क्या किया जाए कि घास-फूस भी उसी पानी से लाभ उठाते हैं। ईश्वर ईमान वालों से कहता है कि वो उसकी विभूतियों से लाभ उठाएं और अकारण किसी वस्तु को अपने लिए वर्जित न करें क्योंकि ये विभूतियां वास्तव में उन्हीं के लिए बनाई गई हैं। अलबत्ता ईश्वर की विभूतियां भोग विलास के लिए नहीं है क्योंकि ईश्वर के बाग़ का फल अच्छा कर्म है अतः विभूतियों को सबसे अच्छे मार्ग में प्रयोग करना चाहिए जो वास्तविक कृतज्ञता है।सूरए बक़रह की १७३ इस प्रकार है।إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةَ وَالدَّمَ وَلَحْمَ الْخِنْزِيرِ وَمَا أُهِلَّ بِهِ لِغَيْرِ اللَّهِ فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (173)ईश्वर ने केवल मरे हुए जानवर का मांस, रक्त, सूअर का मांस और उन जानवरों को जो ईश्वर के अतिरिक्त किसी के नाम पर काटे गए हों तुमपर वर्जित किये गए हैं, परन्तु इसके बावजूद जो कोई भूख के कारण उन्हें खाने पर विवश हो तो यदि वह आनंद लेने का इरादा न रखता हो और आवश्यकता से अधिक न खाए तो उसपर कोई पाप नहीं है और निःसन्देह, ईश्वर क्षमा करने वाला कृपालु है। (2:173)सामान्यतः क़ुरआन की पद्धति यह है कि वो जब भी मनुष्य को किसी बात से रोकना चाहता है तो पहले उसके हलाल मार्गों का वर्णन करता है फिर हराम बातों का उल्लेख करता है।पिछली आयत में खाने की पवित्र वस्तुओं से लाभ उठाने की सिफ़ारिश करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि हर वस्तु तुम्हारे लि हलाल है और केवल कुछ वस्तुएं तुम्हारे लिए वर्जित की गई हैं और वो भी उनके द्वारा तुम्हारे शरीर और आत्मा को होने वाली हानि के कारण।रक्त, मरा हुआ जानवर या सुअर का मांस, उनकी विदित अपवित्रता के कारण वर्जित है परन्तु मूर्तियों के समक्ष या उनके नाम पर बलि किए गए जानवरों का वर्जित किया जाना उनकी आंतरिक अपवित्रता अर्थात अनेकेश्वरवाद के कारण है। चूंकि इस्लाम एक सम्पूर्ण और व्यापक और साथ ही सरल धर्म है अतः उसमें कोई बंद गली नहीं है, उसने मनुष्य के लिए जो बात भी अनिवार्य की है विवश्ता के समय उसे हटा लिया है और ये ईश्वर की कृपा की निशानी है अतः हमें विवश्ता के क़ानून से ग़लत लाभ नहीं उठाना चाहिए।सूरए बक़रह की १७४वीं आयत इस प्रकार है।إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ مِنَ الْكِتَابِ وَيَشْتَرُونَ بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا أُولَئِكَ مَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ إِلَّا النَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (174)निःसन्देह वे लोग जो ईश्वर द्वारा किताब से उतारी गई बातों को छिपाते हैं और उसे सस्ते दामों में बेच देते हैं वे अपने पेट की आग भरने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर रहे हैं, ईश्वर प्रलय के दिन न उनसे बात करेगा और न ही उन्हें पवित्र करेगा और उनके लिए कड़ा दंड है। (2:174) पिछली आयत ने सुअर और मरे हुए जानव के मांस जैसी हराम वस्तुओं का वर्णन किया था। ये आयत इस संबन्ध में एक मूल सिद्धांत बताती है और वो ये है कि यदि मनुष्य पाप और अपराध के मार्ग से पैसा प्राप्त करता है तो जो कुछ वह उस पैसे से ख़रीद कर खाएगा वह ऐसा ही है जैसे उसने आग खा ली हो चाहे वह हलाल वस्तु ही क्यों न हो। हराम पैसों में से एक वास्तविकता और सत्य छिपाए जाने के प्रति चुप रहने के लिए लिया जाने वाला पैसा है, जैसा कि यहूदियों और ईसाइयों के कुछ विद्वानों ने किया था, यद्यपि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की निशानियों को वे तौरेत व इंजील में देख चुके थे और वे उन्हें पहचानते थे परन्तु जब उन्होंने यह देखा कि उनको स्वीकार करने से हमारा सांसारिक पद और माल समाप्त हो जाएगा तो उन्होंने वास्तविकता छिपाई बल्कि उनका इन्कार किया। ईश्वर इन लोगों के दण्ड के बारे में कहता है कि ये लोग जो संसार में ईश्वर का कथन लोगों को सुनाने के लिए तैयार नहीं हुए, प्रलय के दिन ईश्वर का प्रेमपूर्ण कथन सुनने से वंचित रहेंगे।सूरए बक़रह की १७५वीं और १७६वीं आयतें इस प्रकार हैं। أُولَئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الضَّلَالَةَ بِالْهُدَى وَالْعَذَابَ بِالْمَغْفِرَةِ فَمَا أَصْبَرَهُمْ عَلَى النَّارِ (175) ذَلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ نَزَّلَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ وَإِنَّ الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِي الْكِتَابِ لَفِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ (176)ये वे लोग हैं जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले पथभ्रष्टता और क्षमा के बदले दंड ख़रीद लिया है, वास्तव में इन लोगों में नरग की आग को सहन करने की कितनी क्षमता है। (2:175) ये दंड इसलिए है कि ईश्वर ने किताब को सत्य के साथ उतारा है परन्तु जिन्होंने उसमें मतभेद उत्पन्न कर दिया है वे सत्य के साथ कड़े युद्ध में हैं। (2:176) ये दो आयतें सत्य छिपाने के परिणाम का उल्लेख करती हैं जो भ्रष्ट विद्वानों के विशेष पापों में से है। परिणाम यह है कि मार्गदर्शन का प्रकाश समाप्त हो जाता है और मनुष्य पथभ्रष्टता के अन्धकारों में डूबता चला जाता है केवल ज्ञान, कल्याण का कारण नहीं बनता बल्कि हो सकता है कि वो मनुष्य की एक पूरी पीढ़ी की पथभ्रष्टता का कारण बन जाए, जैसाकि पथभ्रष्ट विद्वान न केवल ये कि स्वयं मार्गदर्शन प्राप्त नहीं करते बल्कि अनेक लोगों की पथभ्रष्टता का कारण भी बनते हैं। और स्वभाविक है कि ऐसे विद्वानों का दंड केवल उनकी व्यक्तिगत पथभ्रष्टता से संबन्धित नहीं होगा बल्कि चूंकि वे अनेक लोगों की पथभ्रष्टता का कारण बने हैं अतः उन्हें सबकी पथभ्रष्टता के दंड का मज़ा चखना होगा और वो दंड अत्यंत कड़ा होगा। १७६वीं आयत सत्य को छिपाने का कारण उसका विरोध बताती है कि कुछ लोग सत्य को जानते और पहचानते हैं परन्तु उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते बल्कि उससे मुक़ाबला करने का प्रयास करते हैं अतः विभिन्न मार्गों से सत्य के प्रति लोगों में सन्देह उत्पन्न होने की भूमि समतल करते हैंइन आयतों से मिलने वाले पाठः इस्लाम खाने पीने के मामले पर ध्यान रखता है और उसने अनेक बार हलाल और वर्जित खानों के बारे में सिफ़ारिश की और चेतावनी दी है। ईश्वर की ओर ध्यान न केवल उपासना और प्रार्थना के समय बल्कि खाने पीने के समय भी इस्लाम के दृष्टिगत है अतः उस जानवर का मांस खाना वर्जित है जिसे ईश्वर के नाम से न काटा गया हो। वर्जित मार्गों से प्राप्त होने वाले पैसों से यदि सबसे हलाल वस्तु ख़रीद कर खाई जाए तो भी वह उस आग की भांति है जो पेट में चली जाए। यद्यपि संसार में ईश्वर ने हज़र मूसा जैसे पैग़म्बरों से बात की है किंतु प्रलय में सभी अच्छे लोग ईश्वर के संबोधन का पात्र बनेंगे। संसार के सारे धन के बदले में भी यदि धर्म को बेचा जाए तो भी यह घाटे का सौदा है। कुछ लोगों द्वारा ईमान न लाना, सत्य को न जानने और न समझने के कारण नहीं है बल्कि बहुत से लोग सत्य विरोधी होते हैं, यदि वे सत्य को समझ लें तब भी उसे स्वीकार नहीं करेंगे।