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    सूरए बक़रह; आयतें १०-१२(कार्यक्रम 6)

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    सूरए बक़रह की 10वीं आयत इस प्रकार हैःفِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ فَزَادَهُمُ اللَّهُ مَرَضًا وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ (10)उन मुनाफ़िक़ों अर्थात मिथ्याचारियों के हृदय में रोग है और ईश्वर ने उनके रोग में वृद्धि कर दी है तथा उनके झूठ के कारण उनके लिए दण्ड है। (2:10) क़ुरआन की दृष्टि में मनुष्य की आत्मा भी कभी उसके शरीर की ही भांति रोगी हो जाया करती है। समय रहते यदि उसका उपचार न किया जाए तो यह रोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है यहां तक कि उस रोग के कारण मनुष्य की मानवता मर जाती है। निफ़ाक़ अर्थात मिथ्या, आत्मा का वह भयानक रोग है जिससे मनुष्य की आत्मा तथा उसके हृदय को सदैव ख़तरा लगा रहता है। स्वस्थ मनुष्य का एक ही चेहरा होता है तथा उसके हृदय व आत्मा में पूर्ण रूप से समन्वय होता है। उसकी ज़बान वही कहती है जो उसके हृदय में होता है। निफ़ाक़ अर्थात मिथ्या का रोग अन्य भयानक रोगों के कारण होता है। क़ुरआन की दृष्टि में निफ़ाक़ का मूल कारण झूठ है। झूठ केवल ज़बान से नहीं होता बल्कि अपने व्यवहार द्वारा भी बोला जाता है। यदि मनुष्य का कार्य उसके ईमान और विश्वास के अनुसार न हो तो वह भी झूठ है। जैसे पानी मे पड़े हुए किसी जीव के दुर्गंधपूर्ण शव पर जितनी भी वर्षा हो उसकी गंदगी समाप्त नहीं होती बल्कि बढ़ती ही जाती है। निफ़ाक़ भी एक दुर्गंधमयी शव की भांति है कि यदि वह मनुष्य के हृदय या उसकी आत्मा में रह जाए तो ईश्वर की ओर से आने वाले किसी भी आदेश को नहीं मानता, भले ही उसमें उसका लाभ हो बल्कि वह उसको मानने के स्थान पर पाखण्ड और दिखावा करने लगता है। इस प्रकार से उसका निफ़ाक़ और अधिक स्पष्ट हो जाता है। निफ़ाक़ अर्थात मिथ्या शब्द के बड़े विस्तृत अर्थ हैं। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम फ़रमाते हैं कि जिस व्यक्ति में तीन बातें हों वह मुनाफ़िक़ है भले ही वह नमाज़ पढ़ता हो, रोज़ा रखता हो तथा स्वयं को मुसलमान समझता हो। यह तीन बातें हैं अमानत में ख़यानत, अर्थात अमानत रखी हुई वस्तु में बेईमानी, झूठ और वचन का पालन न करना।इस आयत से हमने जो बातें सीखीं वे इस प्रकार हैं।निफ़ाक़ या मिथ्या, एक मानसिक रोग है और मिथ्याचारी न तो स्वस्थ्य है, न मृत, न ईमान वाला है और न ही काफ़िर।निफ़ाक़ का स्रोत झूठ है और झूठ बोलना मुनाफ़िक़ों की आदत है।सूरए बक़रह की 11वीं और 12वीं आयतें इस प्रकार है।وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ قَالُوا إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ (11) أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْمُفْسِدُونَ وَلَكِنْ لَا يَشْعُرُونَ (12)जब मुनाफ़िक़ों अर्थात मिथ्याचारियों से कहा जाता है कि धरती पर दंगा, फ़साद और बिगाड़ पैदा न करो तो वे कहते हैं कि हम तो केवल सुधार करने वाले लोग हैं। जान लो कि वास्तव में यही बिगाड़ पैदा करने वाले हैं परन्तु यह लोग नहीं समझते। (2:11,12) नेफ़ाक़ या मिथ्याचार एक संक्रामक रोग है। यदि इसकी रोकथाम न की जाए तो शीघ्र ही समाज के अधिकांश लोग इससे पीड़ित हो जाते हैं तथा समाज में चापलूसी, दिखावा तथा दोहरा मापदंड प्रचलित हो जाता है। चूंकि मुनाफ़िक़ स्वयं धार्मिक आदेशों का पालन नहीं करता, इसलिए वह चाहता है कि अन्य लोग भी उसी के समान हो जाएं। इसी कारण वह सदैव ही ईश्वरीय आदेशों का परिहास तथा अपमान करके लोगों को उनके कर्तव्यों की ओर से निश्चेत करना चाहता है। क़ुरआने मजीद ने सूरए तौबा और सूरए मुनाफ़ेक़ून में मिथ्याचारियों के इस प्रकार के बुरे व्यवहारों के नमूनों का उल्लेख किया है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार से मुनाफ़िक़, इस्लाम के शत्रुओं से जेहाद अर्थात धर्मयुद्ध के अवसर पर पीठ दिखाकर भाग खड़े होते हैं और इस प्रकार से धर्म योद्धाओं के मनोबल को कमज़ोर करते हैं या दान-दक्षिणा के अवसर पर ईमान वालों का परिहास करते हैं कि इतने कम दान का क्या लाभ होगा।इन आयतों से हमने यह सीखा किःनेफ़ाक़ या मिथ्याचार के परिणाम केवल एक मनुष्य तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि पूरे समाज को बुराई में ग्रस्त कर देते हैं।यदि मिथ्याचार किसी मनुष्य के हृदय तक पहुंच जाए तो वह मनुष्य को वास्तविकताओं को समझने और देखने से रोक देता है।ईमान वालों को मिथ्याचारियों के धोखे में नहीं आना चाहिए।जो चतुरता, समाज व सत्य की भलाई के लिए न हो वह मूर्खता है।