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    सूरए बक़रह; आयतें १३-१४ (कार्यक्रम 7)

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    सूरए बक़रह की 13वीं आयत इस प्रकार हैः وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آَمِنُوا كَمَا آَمَنَ النَّاسُ قَالُوا أَنُؤْمِنُ كَمَا آَمَنَ السُّفَهَاءُ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ السُّفَهَاءُ وَلَكِنْ لَا يَعْلَمُونَ (13)और जब मुनाफ़िक़ों से कहा जाता है कि तुम भी अन्य लोगों की भांति ईमान ले आओ तो वे अकड़कर घमण्ड से कहते हैं कि क्या हम मूर्ख लोगों की भांति ईमान ले आएं? जान लो कि यही लोग मूर्ख हैं परन्तु यह नहीं जानते। (2:13)घमण्ड करना, स्वयं को श्रेष्ठ समझना तथा अन्य लोगों का अपमान करना आदि मिथ्याचार की निशानियां हैं। मिथ्याचारी स्वयं को चतुर एवं बुद्धिमान समझते हैं और ईमान वालों को मूर्ख बताते हैं। इसी कारण जब उनसे कहा जाता है कि तुम लोगों से अलग क्यों रहते हो और ईमान क्यों नहीं लाते? तो इसके उत्तर में वे उन लोगों को मूर्ख कहते हैं जो सभी कड़ी परिस्थितियों में धर्म तथा धर्मगुरू के सहायक रहे हैं। वे अपने मिथ्याचार को बुद्धि तथा चतुराई की निशानी समझते हैं। पवित्र क़ुरआन ऐसे लोगों के उत्तर में कहता है कि तुम लोग, जो ईमान वालों को मूर्ख कहते हो, वास्तव में स्वयं ही मूर्खता में पड़े हुए हो परन्तु कठिनाई यह है कि तुम अपनी मूर्खता को समझ नहीं पाते। मूर्खता से भी बुरी अज्ञानता है कि मनुष्य यह समझे कि वह सब कुछ समझता है।इन आयतों से हमने यह बातें सीखीं।ईमान वालों का अपमान करना मिथ्याचारियों की आदत है।मिथ्याचारी स्वयं को दूसरों से अच्छा और उच्चतम समझता है।घमण्डी के साथ उसी जैसा व्यहार करना चाहिए।जो किसी जनसमूह का अपमान करता है, समाज में उसका अपमान होना चाहिए ताकि उसका घमण्ड समाप्त हो सके।दूसरों का अपमान तथा परिहास, मूर्खतापूर्ण कार्य है। बुद्धिमान व्यक्ति तर्कशील बात करता है जबकि मूर्ख परिहास करता है।सूरए बक़रह की 14वीं आयत इस प्रकार है।وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آَمَنُوا قَالُوا آَمَنَّا وَإِذَا خَلَوْا إِلَى شَيَاطِينِهِمْ قَالُوا إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِئُونَ (14)मथ्याचारी जब ईमानवालों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम भी तुम्हारी भांति ईमान रखते हैं और जब वे अपने ही जैसे शैतानी सोच रखने वालों से एकांत में मिलते हैं तो कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो केवल ईमान वालों का परिहास करते हैं। (2:14) मिथ्याचार या नेफ़ाक़ की एक निशानी यह है कि मिथ्याचारी का व्यक्तित्व स्थाई नहीं होता। वह हर स्थान पर वहीं के रंग में रंग जाता है। जब वह ईमान वालों के बीच होता है तो ईमान की बात करता है और जब धर्म के शत्रुओं के बीच होता है तो उनके साथ मिलकर ईमान वालों के विरुद्ध बात करता है। उनका ध्यान आकृष्ट करने के लिए ईमान वालों का परिहास करता है। यह आयत भी हमें सचेत करती है कि हमें लोगों की दिखावे की बातों के धोखे में नहीं आना चाहिए। हर वह व्यक्ति जो ईमान का दावा करे, उसे मोमिन नहीं समझ लेना चाहिए बल्कि हमें यह देखना चाहिए कि उसका उठना-बैठना कैसे लोगों के साथ है और उसके मित्र कौन लोग हैं। यह कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि कोई व्यक्ति मोमिन हो और वह धर्म तथा धार्मिक नेता के शत्रुओं का मित्र भी हो। ईमान तथा धर्म के शत्रुओं के साथ मित्रता, दो परस्पर विरोधी बातें हैं। यह एक अटल वास्तविकता है कि जिसके पास ईमान होगा वह अवश्य ही धर्म के शत्रुओं का शत्रु होगा।इस आयत से हमने यह बातें सीखीं।शैतान केवल इबलीस नहीं है बल्कि जो लोग दूसरों को सही मार्ग से भटका देते हैं वे भी शैतान हैं अतः हमें उनसे दूर रहना चाहिए।सत्य पर आधारित शासन व्यवस्था के विरुद्ध छिप कर बैठकें करना, अपना विचार प्रकट करने का साहस न होने की निशानी है। ईमान वालों का परिहास करने वाले मिथ्याचारी स्वयं डरपोक होते हैं।