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    सूरए बक़रह; आयतें १५-१६ (कार्यक्रम 8)

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    सूरए बक़रह की पन्द्रहवीं आयत इस प्रकार है।اللَّهُ يَسْتَهْزِئُ بِهِمْ وَيَمُدُّهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ (15)अल्लाह भी उनका परिहास करता है और उनको उनकी ढिठाई में ढील दिए जाता है ताकि वे भटकते फिरें। (2:15) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अहलेबैत अर्थात उनके परिवार के सदस्यों में से एक, इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम कहते हैं कि “ईश्वर किसी के साथ भी परिहास या धोखा नही करता परन्तु शत्रुओं के परिहास और धोखे का उत्तर अवश्य देता है। वास्तव में अहंकारमय हृदय तथा उलझन के साथ भटकने से बढ़कर और क्या दंड हो सकता है कि जिसमें मिथ्याचारी फंसे हुए हैं। ईश्वर की परंपरा यह है कि वह अत्याचारियों और अवज्ञाकारियों को ढील देता है, परन्तु यह ढील अर्थात समय देना केवल उस समय ईश्वरीय दया का कारण बनता है जब मनुष्य अपने अत्याचार और पाप से अवगत हो जाए और प्रायश्चित करना चाहे वरना यह ढील, पापों में और अधिक डूबने तथा मनुष्य के विनाश का कारण बनती है। मिथ्याचारियों के लिए अल्लाह का एक दण्ड उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना है जो स्वयं उलझन का कारण है। उनके पास न तो लक्ष्य होता है और न ही शांति एवं संतोष।इस आयत से हमने यह बातें सीखीं।ईश्वरीय दण्ड मनुष्य के पापों के अनुसार होते हैं। परिहास का दण्ड परिहास है।ईश्वर की ओर से दी गई ढील या उपहार पर घमण्ड नहीं करना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि यह सब दया की निशानी न हो। ईश्वर मोमिनों का समर्थक है। यदि मिथ्याचारी, मोमिनों का परिहास करते हैं तो ईश्वर मिथ्याचारियों का परिहास करता है और वह उन्हें दण्ड देगा।सूरए बकरह की सोलहवीं आयत इस प्रकार हैःأُولَئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الضَّلَالَةَ بِالْهُدَى فَمَا رَبِحَتْ تِجَارَتُهُمْ وَمَا كَانُوا مُهْتَدِينَ (16)यही वे लोग हैं जिन्होंने मार्गदर्शन खोकर पथभ्रष्टता ख़रीदी है, परन्तु इस व्यापार में उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ और उन्हें मार्गदर्शन नहीं मिला है। (2:16) यह संसार जिसमें हम जीवन व्यतीत कर रहे हैं एक बाज़ार के समान है और हम सब ऐसे व्यापारी हैं जो अपनी पूंजी लगाने पर विवश हैं। अपनी आयु की पूंजी, जवानी की पूंजी, बुद्धि की पूंजी, प्रकृति की पूंजी, शक्ति की पूंजी और ईश्वर की ओर से मिली हुई समस्त क्षमताओं की पूंजी। इस संसार रूपी बाज़ार में एक गुट को लाभ प्राप्त होता है और वह सफल हो जाता है जबकि दूसरा गुट दीवालिया हो जाता है। दिवालिया होने वाले को न केवल यह कि कोई लाभ नहीं होता बल्कि वह अपनी मूल पूंजी भी खो बैठता है। इसका उदाहरण वह बर्फ बेचने वाला है जो यदि अपना माल न बेचे तो न केवल यह कि उसको कोई लाभ नहीं होगा बल्कि उसकी मूल पूंजी भी पानी होकर हाथ से निकल जाएगी। पवित्र क़ुरआन ने अनके स्थानों पर मनुष्य के अच्छे और बुरे कार्यों को व्यापार के समान बताया है। सूरए सफ़्फ़ की नवीं आयत में ईमान तथा धर्मयुद्ध को लाभदायक व्यापार बताते हुए कहा गया है। “ईमान वालो! क्या मैं एक ऐसे व्यापार की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करूं जो तुम्हें दुखदाई दण्ड से मुक्ति दिलाए? तुम ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर पर ईमाल ले आओ और उसके मार्ग में धन एवं प्राण से जेहाद अर्थात धर्मयुद्ध करो।” इस आयत में मिथ्याचारी ऐसे व्यापारी बताए गए हैं जिन्होंने उचित मार्गदर्शन बेचकर गुमराही और पथभ्रष्टता ख़रीदी है। संभवतः इस आयत का अर्थ यह है कि मिथ्याचारी, पाप तथा मिथ्याचार की आदत के कारण अपने भीतर स्वभाविक रूप से मौजूद मार्गदर्शन स्वीकार करने की क्षमता से भी हाथ धो बैठते हैं।इस आयत से हमने सीखाःमार्गदर्शन या पथभ्रष्टता स्वयं हमारे कार्यों का ही फल है। इसमें ईश्वर के इरादे, ज़बरदस्ती या भाग्य की कोई भूमिका नहीं होती।नेफ़ाक़ अर्थात मिथ्याचार का परिणाम घाटे और पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है जबकि ईमान के कारण मनुष्य को सफलता तथा सौभाग्य प्राप्त होता है।