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    सूरए बक़रह; आयतें २१-२२ (कार्यक्रम 11)

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    सूरए बक़रह की २१वीं आयत इस प्रकार हैः-يَا أَيُّهَا النَّاسُ اعْبُدُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ وَالَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ (21)हे लोगो! ईश्वर की उपासना करो जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया है ताकि तुम ईश्वर से डरने वालों में हो जाओ। (2:21) गत २० आयतों में ईश्वर ने बुराइयों से बचने वाले एवं काफ़िर तथा मिथ्याचारी जैसे तीन गुटों की विशेषताओं का वर्णन किया था। इस आयत में वह कल्याण एवं मोक्ष के मार्ग का निर्धारण करते हुए कहता है कि पहले गुट में सम्मिलित होने का केवल एक मार्ग है और वह अन्य लोगों से कट कर ईश्वर से मन लगाना है जिसने तुम्हारी और तुमसे पहले वालों की सृष्टि की है। केवल उसी की उपासना करो ताकि दूसरों की दासता से स्वतंत्र हो जाओ। अनेक लोग ईश्वर को अपने व संसार के सृष्टिकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं परन्तु अपने व समाज के कार्यक्रम और क़ानून को दूसरों से प्राप्त करते हैं जैसे सृष्टिकर्ता ने उन्हें उनकी दशा पर छोड़ दिया है कि वे जो चाहें करें। यह आयत कहती है कि तुम्हारा सृष्टिकर्ता, तुम्हारा पालनहार भी है तथा उसने तुम्हारी प्रगति और प्रशिक्षण के लिए कार्यक्रम व कर्तव्य निर्धारित किये हैं तथा व्यवस्था और क़ानून बनाए हैं।क़ानून बनाना ईश्वर का अधिकार है जिसने तुम्हारी सृष्टि की है अतः केवल उसी का अनुसरण करो तथा उसी के आदेश का सम्मान करो कि जिसका लाभ भी स्वयं तुम्हीं को मिलेगा और तुम बुराइयों से दूर होकर अच्छाइयों और पवित्रता से निकट पहुंच जाओगे।इस आयत से हमने यह बातें सीखीं।ईश्वरीय दूतों का निमंत्रण सार्वजनिक है और यह किसी विशेष गुट या समूह से विशेष नहीं है। पवित्र क़ुरआन में लगभग बीस बार सामान्य लोगों को संबोधित किया गया है और कहा गया है “या अय्योहन्नास” अर्थात हे लोगो!ईश्वर की उपासना का एक तर्क हमारे तथा हमारे पूर्वजों पर उसकी असीम कृपा का आभार प्रकट करना है अतः वह कहता है कि अपने उस पालनहार की उपासना करो जिसने तुम्हें पैदा किया है। सृष्टि की नेमत या अनुकंपा हम पर ईश्वर की सबसे पहली और बड़ी अनुकंपा है जो यह चाहती है कि हम उसके आदेशों का पालन करें। उपासना, पवित्रता का कारण बनती है। यदि किसी उपासना से हममें पवित्रता नहीं आती तो वह वास्तविक उपासना नहीं है। हमें अपने पूर्वजों के रिति-रिवाजों को ईश्वरीय आदेशों के मुक़ाबले में नहीं लाना चाहिए क्योंकि उन्हें भी ईश्वर ही ने पैदा किया था तथा उनके अनुसरण के कारण ईश्वर के आदेशों की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। ईश्वर को हमारी उपासना की कोई आवश्यकता नहीं है। हमारी नमाज़ या प्रार्थना से न उसकी महानता बढ़ती है और न अवज्ञा से उसकी महानता में कमी आती है। हमें उन्नति और परिपूर्णता के लिए उसकी आवश्यकता है और हमें उसके आदेशों और क़ानूनों के समक्ष सिर झुकाए रहना चाहिए। हमें उसकी उपासना पर घमण्ड नहीं करना चाहिए क्योंकि घमण्ड, पवित्रता एवं परिपूर्णता के मार्ग में बाधा बनता है।सूरए बक़रह की २२वीं आयत इस प्रकार है।الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ فِرَاشًا وَالسَّمَاءَ بِنَاءً وَأَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجَ بِهِ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَكُمْ فَلَا تَجْعَلُوا لِلَّهِ أَنْدَادًا وَأَنْتُمْ تَعْلَمُونَ (22)वह ईश्वर जिसने धरती को तुम्हारे लिए बिछौना और आकाश को छत बनाया तथा आकाश की ओर से पानी उतारा और उसके द्वारा तुम्हारी रोज़ी के लिए हर प्रकार के खाद्य पदार्थ पैदा किये अतः जब तुम्हें ज्ञान है तो अल्लाह के लिए समकक्ष न बनाओ। (2:22) इस आयत में ईश्वर ऐसी विभिन्न नेमतों की ओर संकेत करता है जिनमें से हर एक, अन्य नेमतों का स्रोत है। उसने धरती को मनुष्य के जीवन के लिए बिछौने की भांति बनाया है। इस धरती के पर्वत, मरुस्थल, जल, मिट्टी और विभिन्न धातुओं को मानव जीवन के लिए उपयुक्त बनाया। धरती व आकाश के बीच समन्वय के कारण मनुष्य को भोजन प्राप्त होता है। यह सब कुछ ईश्वर की व्यवस्था तथा उसकी असीम शक्ति के कारण है तो किस प्रकार अन्य लोगों को, जो अपने जीवन के लिए ईश्वर पर निर्भर हैं, उसके समान समझ लिया जाए और ईश्वर के स्थान पर उनकी आज्ञा का पालन किया जाए।इस आयत से हमने यह बातें सीखीं।ईश्वर को पहचानने और उसकी उपासना का सबसे अच्छा मार्ग उसकी नेमतों और अनुकंपाओं की ओर ध्यान देना है अतः ईश्वर ने उस आयत के पश्चात जिसमें ईश्वर की उपासना का आदेश दिया गया है इस आयत में मनुष्य पर अपनी कृपा और नेमत का उल्लेख किया है।धरती व आकाश के मध्य समन्वय, एक ज्ञानी व शक्तिशाली सृष्टिकर्ता के अस्तित्व के लिए बहुत अच्छा तर्क है।तुम्हारे लिए बनाया, तुम्हारा भोजन बनाया जैसे दो वाक्यों से समझ में आता है कि ईश्वर ने संसार को मनुष्य के लिए बनाया है तथा अन्य जीवों की सृष्टि का वास्तविक उद्देश्य, मनुष्य को लाभ पहुंचाना है।संसार की विभिन्न वस्तुओं के बीच समन्वय, ईश्वर के एक होने का सबसे अच्छा तर्क है अतः हमें एकेश्वरवादी बनना चाहिए। हमें सृष्टि में किसी को भी उसके साथ नहीं जोड़ना चाहिए।ईश्वर को पहचानना तथा उसकी उपासना करना एक स्वाभाविक बात है कि जिसकी गवाही सभी की अंतरात्मा देती है। इसी लिए आयत में कहा गया है कि तुम स्वयं इस बात को जानते हो।पानी और मिट्टी माध्यम हैं परन्तु पौधे उगाना ईश्वर के हाथ में है इसी लिए वह कहता है कि उसने फलों को तुम्हारे लिए उगाया।