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    सूरए बक़रह; आयतें ३-६ (कार्यक्रम 4)

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    सूरए बक़रह की तीसरी आयत इस प्रकार हैःالَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِالْغَيْبِ وَيُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَ (3)ये ऐसे लोग हैं जो ग़ैब (ईश्वर के गुप्त ज्ञान) पर बिना देखे ईमान लाते हैं, नमाज़ क़ाएम करते हैं तथा जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से दान देते हैं। (2:3) पवित्र क़ुरआन ने जीवन तथा संसार को दो भागों में विभाजित किया है। एक वह भाग है जो अदृश्य तथा अज्ञेय है जिसका हमारी इन्द्रियां आभास तक नहीं कर सकतीं हैं तथा दूसरा वह भाग है जो भौतिक संसार है जिसका इन्द्रियों द्वारा आभास किया जाता है। कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल उन्हीं बातों को स्वीकार करते हैं जिन्हें वे आंखों से देखते और कानों से सुनते हैं जबकि हमारी सीमित इन्द्रियां, समस्त प्रकृति के आभास की शक्ति नहीं रखतीं। उदाहरण स्वरूप गुरुत्वाकर्षण शक्ति, जो एक भौतिक विशेषता है, उसका आभास हमारी इन्द्रियों द्वारा छूने या देखने से नहीं होता बल्कि वस्तुओं के नीचे की ओर गिरने से हमें यह समझ में आता है कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति पाई जाती है। अत गुरुत्वाकर्षण शक्ति के संबन्ध में हमारा ज्ञान, उसके परिणामों के अन्तर्गत है न कि सीधे इस शक्ति से। कुछ लोगों को अपेक्षा होती है कि वे पहले ईश्वर को अपनी आंखों से देखें और फिर उस पर ईमान लाएं या विश्वास करें जैसा कि बनी इस्राईल नामक समुदाय ने हज़रत मूसा से कहा था कि जब तक हम ईश्वर को अपने समक्ष साक्षात रूप से नहीं देख लेंगे आप पर ईमान नहीं लाएंगे। जबकि ईश्वर शरीर नहीं रखता जो उसे देखा जा सके। हम सृष्टि में उसकी महान निशानियों के कारण उसके असितत्व का आभास करते हैं और उस पर ईमान लाते हैं। भले तथा वास्तविकता के खोजी लोग अपनी जिज्ञासा को केवल भौतिक संसार तक ही सीमित नहीं रखते बल्कि अज्ञेय संसार अर्थात ईश्वर, फ़रिश्तों, प्रलय तथा परलोक पर भी ईमान लाते हैं अर्थात उन बातों को भी स्वीकार करते हैं जो हमारी इन्द्रियों से छिपी हुई हैं। ईमान, ज्ञान तथा पहचान से आगे का चरण है जिसमें मनुष्य का हृदय तथा उसकी आत्मा भी किसी के असितत्व की गवाही देती है, उसके साथ संबन्ध स्थापित करती है तथा उससे बहुत अधिक प्रेम करती है और स्पष्ट है कि ऐसे ईमान तथा विश्वास के कारण मनुष्य अच्छे एवं सुकर्म करता है। मूल रूप से इस्लाम के दृष्टिकोण से व्यवहार तथा कार्य के बिना केवल ईमान और विश्वास से मनुष्य प्रगति नहीं कर सकता। यह आयत कहती है कि ईश्वर की अवज्ञा न करने वाले ग़ैब अर्थात अज्ञेय पर भी विश्वास रखते हैं तथा नमाज़ भी पढ़ते हैं और दान भी देते हैं। नमाज़ द्वारा जो, ईश्वर की याद भी है वे अपनी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। अलबत्ता केवल नमाज़ पढ़ना पर्याप्त नहीं है बल्कि नमाज़ को क़ाएम करना चाहिए अर्थात मनुष्य स्वयं भी नमाज़ पढ़े और दूसरों को भी नमाज़ पढ़ने का निमंत्रण दे। नमाज़ को उसके निर्धारित समय पर मस्जिद में सामूहिक रूप से पढ़े। ऐसी स्थिति में नमाज़, समाज में प्रचलित हो जाएगी। दान-दक्षिणा के संबन्ध में भी इस्लाम का लक्ष्य, केवल रुपये पैसे का दान नहीं है बल्कि क़ुरआन कहता हैः जो कुछ हमने तुम्हें दिया है उसमें से दान दो जिसमें धन-दौलत, शक्ति, ज्ञान तथा समस्त ईश्वरीय वरदान सम्मिलित हैं। इस आयत से हमने जो बातें सीखीं वे इस प्रकार हैं। संसार केवल भौतिक नहीं है बल्कि कुछ ऐसी बातें भी हैं जो हमारी दृष्टि से ओझल हैं परन्तु हमारी बुद्धि और आत्मा उनके होने की गवाही देती है अतः हमें उन पर विश्वास रखना चाहिए।ईमान, अमल अर्थात कर्म से अलग नहीं है।नमाज़, ईमान रखने वाले लोगों के कार्यों का केन्द्र है।हमारे पास जो कुछ भी है वह ईश्वर का ही है अतः हमें उसका कुछ भाग ईश्वर के मार्ग में दान करना चाहिए ताकि संसार और परलोक में उसकी पूर्ति करे।इस्लाम एक सम्पूर्ण धर्म है जो समाज की व्यवस्था चलाने के लिए है। इस्लाम ईश्वर से भी संपर्क रखने का आदेश देता है और लोगों के साथ सम्पर्क बनाने का भी। साथ ही इस्लाम समाज की आवश्यकताओं की ओर ध्यान देने का आदेश भी देता है। सूरए बक़रह की चौथी आयत इस प्रकार हैःوَالَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ وَمَا أُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَ وَبِالْآَخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ (4)हे पैग़म्बर! ईश्वर से डरने वाले वे लोग हैं जो, जो कुछ आप पर और आपसे पहले के पैग़म्बरों पर उतर चुका है, उस पर ईमान और परलोक पर विश्वास रखते हैं। (2:4) ईश्वर को पहचानने का एकमात्र मार्ग “वहि” अर्थात ईश्वरीय संदेश है जिस पर उससे डरने वाले लोग विश्वास रखते हैं। जैसाकि हमने गत आयत में कहा था कि मनुष्य की पहचान केवल इन्द्रियों पर ही निर्भर नहीं है बल्कि भौतिक और इन्द्रियों द्वारा समझ में आने वाले संसार से आगे भी एक संसार है जिसकी गवाही बुद्धि देती है किंतु हमारी बुद्धि उसको पूर्ण रूप से समझने की क्षमता नहीं रखती। इसी कारण ईश्वर “वहि” भेजकर हमारी पहचान को परिपूर्ण करता है। बुद्धि यह बताती है कि ईश्वर का असितत्व है और “वहि” हमें उस ईश्वर की विशेषता बताती है। बुद्धि कहती है कि मनुष्यों के कार्यों पर उन्हें पारितोषिक या दंड देने के लिए एक ईश्वरीय न्यायालय होना ही चाहिए। “वहि” बताती है कि प्रलय का एक दिन निश्चित है और इसमें यह विशेषताएं मौजूद हैं। अतः यह कहना चाहिए कि बुद्धि और “वहि” एक दूसरे के पूरक हैं। ईश्वर पर विश्वास एवं भरोसा रखने वाले दोनों से लाभ उठाते हैं। “वहि” अर्थात ईश्वरीय संदेश, केवल पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से विशेष नहीं है बल्कि सभी पैग़म्बर किसी न किसी रूप में ईश्वरीय संबोधन “वहि” के पात्र बने हैं। इसी कारण भले और पवित्र लोग, भेदभाव के आधार पर अन्य पैग़म्बरों का इन्कार नहीं करते बल्कि वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अतिरिक्त अन्य पैग़म्बरों के प्रति भी श्रद्धा रखते हैं। परलोक उन अज्ञेय बातों में से है जिनका “वहि” के बिना पूर्ण रूप से समझा नहीं जा सकता। इस आधार पर अल्लाह पर ईमान रखने वाले मृत्यु को अपना अंत नहीं समझते और वे प्रलय पर विशवास रखते हैं।इन आयतों से हमने जो बातें सीखीं वे इस प्रकार हैं।समस्त पैग़म्बरों का लक्ष्य एक ही था अतः ईश्वरीय किताबों पर विश्ववास रखना आवश्यक है।इस्लामी समुदाय, पिछली ईश्वरीय पुस्तकों का उत्तराधिकारी है अतः उसे उनकी सुरक्षा का प्रयास करना चाहिए।प्रलय पर विशवास के बहुत से फल हैं। यह संसार को मनुष्य की दृष्टि में तुच्छ करता है, पापों से मनुष्यों की रक्षा करता है तथा उसके कार्यों को दिशा प्रदान करता है। सूरए बक़रह की 5वीं आयत इस प्रकार हैः-أُولَئِكَ عَلَى هُدًى مِنْ رَبِّهِمْ وَأُولَئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ (5)यही ईमान वाले तथा ईश्वर से भयभीत रहने वाले लोग, अपने ईश्वर द्वारा किये गए मार्गदर्शन पर हैं और यही लोग सफल हैं तथा इन्हीं लोगों को मोक्ष की प्राप्ति होगी। (2:5) इस आयत में पवित्र तथा ईमान वाले लोगों का परिणाम सफलता एवं मोक्ष बताया गया है जो ईश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकार करने के कारण उन्हें प्राप्त होगा। मोक्ष या सफलता का अर्थ है आंतरिक इच्छाओं से स्वतंत्र और अच्छे आचरण तथा शिष्टाचार का विकास। अरबी भाषा में मोक्ष को फ़लाह और किसान को फ़ल्लाह कहते हैं। इसका कारण यह है कि वह धरती के अन्दर मौजूद बीजों से पौधे के बाहर निकलने तथा उसके उगने में सहायता करता है। मनुष्य की परिपूर्णता का सबसे महान चरण मोक्ष है। पवित्र क़ुरआन की आयतों के अनुसार संसार को मनुष्य के लिए बनाया गया है और मानव की सृष्टि उपासना के लिए की गई है। उपासना का उद्देश्य, ईश्वर से डरना है। यह आयत कहती है कि ईश्वर से भयभीत रहने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होगी।इस आयत से हमने जो बातें सीखीं वे इस प्रकार हैं।सफलता तथा मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग, ईश्वरीय मार्गदर्शन को स्वीकार करना है।मोक्ष, प्रयत्न के बिना प्राप्त नहीं होता। उसके लिए ज्ञान और ईमान तथा अच्छे कर्मों की आवश्यकता होती है।सूरए बक़रा की 6ठी आयत इस प्रकार हैः-إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا سَوَاءٌ عَلَيْهِمْ أَأَنْذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنْذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ (6)जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया, चाहे आप उन्हें ईश्वर के प्रकोप से डराएं या न डराएं उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। वे लोग कदापि ईश्वर पर ईमान नहीं लाएंगे। (2:6) पवित्र तथा ईश्वर से डरने वाले लोगों के परिचय के पश्चात क़ुरआन की इन आयतों में काफ़िरों को पहचनवाया गया है कि ये लोग इतने कट्टरपंथी, एवं धर्मांधी होते हैं कि इन पर सत्य बात का कोई प्रभाव नहीं होता और ये ईमान नहीं लाते। अरबी भाषा में कुफ़्र का अर्थ है किसी वस्तु को छिपाना या उसकी उपेक्षा करना। कुफ़राने नेमत का अर्थ है विभूति की उपेक्षा करना। काफ़िर उस व्यक्ति को कहते हैं जो सत्य को छिपाता है तथा उसकी उपेक्षा करता है। यदि ईश्वर चाहता तो सारे लोग ही उसपर ईमान लाने पर बाध्य होते परन्तु इस प्रकार के ईमान का कोई लाभ नहीं है। ईश्वर तो चाहता है कि लोग स्वेच्छा से ईमान लाएं अतः हमें भी यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि सारे लोग ईमान वाले होंगे तथा ईश्वर से भयभीत रहेंगे।इस आयत से जो बातें हमने सीखीं वे इस प्रकार हैं।कुफ़्र मनुष्य को पत्थरों की भांति बना देता है और वह सत्य बातों एवं नसीहतों से भी प्रभावित नहीं होता।यदि लोग सत्य को स्वीकार न करें तो पैग़म्बरों अर्थात ईश्वरीय दूतों के प्रयासों का भी कोई प्रभाव नहीं होगा। ईश्वरीय दूतों का मार्गदर्शन, वर्षा की भांति है कि जो यदि उपजाऊ धरती पर होती है तो वहां पर फूल उगते हैं पर बंजर धरती पर केवल कांटे ही उगते हैं।चाहे हमें यह ज्ञात हो कि काफ़िर, ईमान नहीं लाएंगे परन्तु हमें अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उन्हें ईश्वर के प्रकोप से डराना चाहिए।