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    सूरए बक़रह; आयतें ७०-७४ (कार्यक्रम 33)

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    सूरए बक़रह की ७०वीं और ७१वीं आयतें इस प्रकार हैं।قَالُوا ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّنْ لَنَا مَا هِيَ إِنَّ الْبَقَرَ تَشَابَهَ عَلَيْنَا وَإِنَّا إِنْ شَاءَ اللَّهُ لَمُهْتَدُونَ (70) قَالَ إِنَّهُ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَا ذَلُولٌ تُثِيرُ الْأَرْضَ وَلَا تَسْقِي الْحَرْثَ مُسَلَّمَةٌ لَا شِيَةَ فِيهَا قَالُوا الْآَنَ جِئْتَ بِالْحَقِّ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُوا يَفْعَلُونَ (71)बनी इस्राईल ने मूसा से कहाः हे मूसा तुम अपने पालनहार से कहो कि वो हमें स्पष्ट रूप से बताए कि वो गाए कैसी हो क्योंकि हमारे लिए ये गाए संदिग्ध हो गई है और यदि ईश्वर ने चाहा तो अब हम उसका पता पा लेंगे। मूसा ने उनके उत्तर में कहाः ईश्वर कहता है वो गाय न भूमि जोतने के लिए सधाई गई हो और न खेत में सिंचाई करती हो, वो स्वस्थ हो, बिल्कुल एक रंग हो और उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट न हो। बनी इस्राईल ने कहा अब तुम ने स्पष्ट बात बता दी, फिर उन्होंने उसे ज़िब्ह किया और समीप था कि वे ऐसा न करते। (2:70, 71) गत कार्यक्रमों में हमने कहा था कि हत्यारे को पहचनवाने के लिए ईश्वर ने आदेश दिया कि बनी इस्राईल एक गाए को ज़िब्ह करें, बनी इस्राईल का एक गुट बहाने बाज़ी करने लगा और उसने परिहास करते हुए गाए का रंग और उसकी आयु पूछी। यह आयत भी बनी इस्राईल की बहाने बाज़ियों का उल्लेख करते हुए कहती है कि यद्यपि ईश्वर ने गाय का रंग और उसकी आयु बता दी थी परन्तु उन्होंने कहा कि हे मूसा उसकी और अधिक विशेषताएं और निशानियां बताओ ताकि हम उसे पहचान सकें। जब हज़रत मूसा ने गाए की अन्य निशानियां बताईं तो वे विवश हो गए और उन्होंने गाए को ज़िब्ह किया परन्तु वे इस कार्य से बचने के प्रयास में थे। ये आयत बताती है कि स्वार्थ और हठ की भावना मनुष्य को यहां तक पहुंचा देती है कि वो केवल उन्हीं बातों को ठीक समझता है जो उसकी दृष्टि में उचित हो और ईश्वरीय पैग़म्बर से अभद्र शब्दों में कहता है कि अब तुम ने सत्य कहा, मानो इस से पहले असत्य पर रहे थे।अब सूरए बक़रह की ७२वीं और ७३वीं आयतें इस प्रकार हैं। وَإِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًا فَادَّارَأْتُمْ فِيهَا وَاللَّهُ مُخْرِجٌ مَا كُنْتُمْ تَكْتُمُونَ (72) فَقُلْنَا اضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَا كَذَلِكَ يُحْيِي اللَّهُ الْمَوْتَى وَيُرِيكُمْ آَيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ (73)और याद करो उस समय को जब तुम ने एक व्यक्ति की हत्या कर दी और फिर हत्यारे के बारे में तुम में मतभेद हो गया परन्तु अल्लाह उस बात को स्पष्ट करने वाला है जो तुम लोग छिपाते हो। फिर हमने कहा गाए का एक टुकड़ा मृतक को मारो ताकि वो जीवित हो जाए और अपने हत्यारे को पहचनवाए। इस प्रकार ईश्वर मरे हुए लोगों को जीवित करता है और अपनी निशानियां तुम्हें दिखाता है ताकि तुम सोच विचार करो। (2:72, 73) पिछली आयतों में बनी इस्राईल की बहाने बाज़ी का विस्तार से उल्लेख किया गया। इन दो आयतों में एक बार फिर हत्या की घटना का संक्षेप में वर्णन किया गया है। आयत कहती है कि तुमने हत्या की और हत्यारे को छिपाया परन्तु ईश्वर ने चमत्कार द्वारा तुम्हारे उल्लंघनों से पर्दा उठाया। अतः तुम जान लो कि ईश्वर पापी को अपमानित करने में समर्थ है। ये आयत मरे हुए लोगो को जीवित करने में ईश्वर की शक्ति का उल्लेख करती है ताकि अन्य लोग ईश्वर की शक्ति की निशानियों को देखकर प्रलय के बारे में सोच विचार करें और जान लें कि यदि ईश्वर चाहे तो एक मुर्दे को दूसरे मुर्दे पर मारने से जीविन प्रकट हो सकता है।आइए अब सूरए बक़रह की ७४वीं आयत इस प्रकार हैं।ثُمَّ قَسَتْ قُلُوبُكُمْ مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ فَهِيَ كَالْحِجَارَةِ أَوْ أَشَدُّ قَسْوَةً وَإِنَّ مِنَ الْحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنْهُ الْأَنْهَارُ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخْرُجُ مِنْهُ الْمَاءُ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَهْبِطُ مِنْ خَشْيَةِ اللَّهِ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ (74)इस घटना के पश्चात तुम्हारे हृदय पत्थरों या उनसे भी अधिक कठोर हो गए क्योंकि कुछ पत्थरों में से नहरें फूट निकलती हैं और कुछ ईश्वर के भय से पहाड़ पर से गिर पड़ते हैं, परन्तु तुम्हारे हृदय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और ईश्वर तुम्हारे कार्यों की ओर से निश्चेत नहीं है। (2:74) ४९वीं आयत से लेकर इस आयत तक बनी इस्राईल के लिए ईश्वर के अनेकों चमत्कारों और उपहारों का उल्लेख किया गया है जैसे फ़िरऔन के लोगों के चुंगल से मुक्ति, नदी की धारा का फटना, बछड़े की पूजा के पश्चात तौबा स्वीकार होना, आसमानी आहार का आना और बादलों का छाया करना। अंतिम चमत्कार, हत्यारे का पता लगाना था, परन्तु वे लोग इतनी सारी निशानियों और चमत्कार देखने के बाद भी ईश्वर के आदेश के सामने नहीं झुके और बहाने ढूंढते रहे कि जिसे क़ुरआन ने हृदय की कठोरता कहा है। कभी कभी मनुष्य का पतन इतना अधिक होता है कि वह पशु या उससे भी तुच्छ, जैसे जड़, वस्तुओं या उनसे ही अधिक कठोर हो जाता है। ये आयत कहती है कि कठोर पत्थर भी कभी-२ फट जाता है और उस में से पानी निकलता है या कम से कम अपने स्थान से हट जाता है और नीचे की ओर गिर पड़ता है। परन्तु कुछ लोगों के हृदय पत्थर से भी अधिक कठोर होते हैं कि न तो प्रेम से पिघलते हैं कि अच्छे कार्यों और दूसरों के साथ भलाई के बारे में सोचें और न ही ईश्वर के भय से पिघलते हैं कि भय के कारण ईश्वरीय आदेशों के सामने झुकें। आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या बातें सीखीं। ईश्वरीय आदेशों के समक्ष बहाने बाज़ी नहीं करनी चाहिए और उनसे बचने के लिए अनुचित प्रश्न नहीं करने चाहिए क्योंकि प्रश्न सदैव खोज और ज्ञान प्राप्ति की भावना का सूचक नहीं होता बल्कि कभी-२ कर्तव्य के पालन से बचने के लिए भी प्रश्न किया जाता है। ईश्वर के मार्ग में जो जानवर ज़िब्ह किया जाता है उसे स्वस्थ और दोष रहित होना चाहिए। जैसा कि हज पर जाने वाले को बक़रीद के दिन स्वस्थ जानवर ज़िब्ह करना चाहिए। ईश्वर हमारे सभी कार्यों से परिचित है चाहे वो गुप्त हों या स्पष्ट, और यदि वो चाहे तो हमारे कार्यों का भंडा फोड़ कर हमें लज्जित कर सकता है अतः हमें उसके समक्ष पाप नहीं करना चाहिए या अपने पापों को दूसरों के गले नहीं मढ़ना चाहिए। ईश्वर ने इसी संसार में कई बार मुर्दों को जीवित किया है ताकि हमें अपनी शक्ति दिखाए और हमें सोच विचार द्वारा प्रलय के विषय पर ध्यान देना चाहिए। सृष्टि की सभी वस्तुएं यहां तक कि कठोर और निर्जीव पत्थर भी ईश्वर द्वारा इस संसार के संचालन के लिए बनाए गए क़ानूनों के प्रति नतमस्तक हैं अतः यदि कोई मनुष्य ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन करता है तो उसका हृदय पत्थर से भी अधिक कठोर और तुच्छ है।