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    सूरए बक़रह; आयतें ७५-७९ (कार्यक्रम 34)

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    सूरए बक़रह की ७५वीं आयत इस प्रकार है। أَفَتَطْمَعُونَ أَنْ يُؤْمِنُوا لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَرِيقٌ مِنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَامَ اللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُ مِنْ بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ (75)क्या तुम्हें इस बात की आशा है कि यहूदी तुम्हारे धर्म पर ईमान ले आएंगे जबकि उनका एक गुट ईश्वर की बातों को सुनता था तथा उनको समझने के पश्चात उनमें कठोर फेर बदल कर देता था, जबकि वे पढ़े लिखे और ज्ञानी थे। (2:75) इस्लाम धर्म के उदय के आरंभ में आशा की जा रही थी कि यहूदी सबसे पहले इस्लाम स्वीकार करेंगे, क्योंकि अनेकेश्वरवादियों के विपरीत उनके पास आसमानी किताब भी थी और उन्होंने अपनी किताबों में पैग़म्बरे इस्लाम की निशानियां भी पढ़ रखी थीं, परन्तु व्यवहार मे वो मुसलमानों के विरुद्ध और अनेकेश्वरवादियों के साथ हो गए थे। ये आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और मुसलमानों को सांत्वना दिलाती है कि वे क़ुरआनी आयत और उनके चमत्कार के सामने नहीं झुकते तो चिंतित मत हो और अपने धर्म में संदेह न करो और मूल रूप से तुम्हें उनसे ऐसी आशा नहीं रखनी चाहिए क्योंकि ये उन्हीं लोगों की सन्तान हैं, जो हज़रत मूसा के साथ तूर पहाड़ पर गए, ईश्वर की बातें सुनीं, उसके आदेशों को समझा परन्तु फिर भी उनमें फेर बदल किया और अपने धर्म के प्रति वफ़ादार नहीं रहे। ये आयत बताती है कि हर जाति के ज्ञानियों को जो एक बड़ा ख़तरा रहता है वो जनता के समक्ष वास्तविकताओं को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करना है। यद्यपि वे सत्य को जानते और समझते हैं परन्तु उसे इस प्रकार परिवर्तित कर देते हैं कि लोग वास्तविकता को समझ नहीं पाते। अब सूरए बक़रह की ७६वीं व ७७वीं आयतें इस प्रकार हैं।وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آَمَنُوا قَالُوا آَمَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ إِلَى بَعْضٍ قَالُوا أَتُحَدِّثُونَهُمْ بِمَا فَتَحَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَاجُّوكُمْ بِهِ عِنْدَ رَبِّكُمْ أَفَلَا تَعْقِلُونَ (76) أَوَلَا يَعْلَمُونَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ (77)यहूदियों का एक गुट जब ईमान वालों से भेंट करता है तो कहता है कि हम ईमान ले आए हैं परन्तु जब वे एक दूसरे से एकांत में मिलते हैं तो कहते हैं तुम वो बातें मुसलमानों को क्यों बताते हो जो ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम की निशानियों के बारे में तुम्हें बताई हैं, ताकि वो प्रलय में ईश्वर के समक्ष तुम्हारे विरुद्ध अपनी बातें प्रमाणित कर सकें, क्या तुम नहीं जानते? क्या उन्हें नहीं पता कि जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ प्रकट करते हैं, ईश्वर उन्हें जानता है। (2:76, 77) इस्लाम के आरंभिक काल में कुछ यहूदी जब मुसलमानों को देखते तो कहते थे कि चूंकि तुम्हारे पैग़म्बर की निशानियां हमारी तौरेत में भी आई हैं अतः हम भी तुम्हारे धर्म पर ईमान लाते हैं। परन्तु यही लोग जब दूसरों से मिलते थे तो एक दूसरे पर आपत्ति करते थे कि मुहम्मद की निशानियां तुम मुसलमानों को क्यों बताते हो? यहूदी जाति के ज्ञानियों और विद्वानों द्वारा सत्य को छिपाने और उसे तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने का परिणाम ये निकाला कि आज संसार में अरबों की संख्या में ईसाई और यहूदी मौजूद हैं।अब सूरए बक़रह की ७८वीं आयत इस प्रकार है।وَمِنْهُمْ أُمِّيُّونَ لَا يَعْلَمُونَ الْكِتَابَ إِلَّا أَمَانِيَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ (78)यहूदियों में कुछ सामान्य और बेपढ़े लोग हैं जो ईश्वर की किताब को केवल कल्पनाओं और कामनाओं का संग्रह समझते हैं, उनके पास इस कल्पना के अतिरिक्त कुछ नहीं है। (2:78)ये आयत बनी इस्राईल के एक अन्य गुट का परिचय करा रही है जो, पहले के गुट के विपरीत विद्वान था और तौरेत की वास्तविकताओं को छिपाता था या उनमें फेर बदल करता था, साधारण लोगों में से है और उसे तौरेत के बारे में कुछ ज्ञान नहीं है और वो केवल अपनी कामनाओं के साथ जीवन व्यतीत करता है। वे सोचते थे कि यहूदी जाति को सर्वश्रेष्ठ जाति बताया गया है और वे ईश्वर के प्रिय हैं और प्रलय में केवल उन्हीं को मोक्ष प्राप्त होगा। और वे नरक में नहीं जाएंगे। और यदि उन्हें दंड दिया भी गया तो वो कुछ दिनों से अधिक नहीं होगा। संभव है कि ऐसे विचार अन्य ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों में भी हों, परन्तु हमें जानना चाहिए कि ये सब ईश्वरीय किताब से अज्ञानता और अनभिज्ञता का परिणाम है और किसी भी आसमानी धर्म में इस प्रकार के निराधार विचार नहीं आए हैं।अब सूरए बक़रह की ७९वीं आयत इस प्रकार है।فَوَيْلٌ لِلَّذِينَ يَكْتُبُونَ الْكِتَابَ بِأَيْدِيهِمْ ثُمَّ يَقُولُونَ هَذَا مِنْ عِنْدِ اللَّهِ لِيَشْتَرُوا بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا فَوَيْلٌ لَهُمْ مِمَّا كَتَبَتْ أَيْدِيهِمْ وَوَيْلٌ لَهُمْ مِمَّا يَكْسِبُونَ (79)धिक्कार हो उन विद्वानों पर जो अपने हाथ से किताब लिख लेते हैं और फिर कहते हैं कि ये ईश्वर की ओर से है ताकि उसे सस्ते दामों में बेच सकें, धिक्कार हो उनपर जो उनके हाथों ने लिखा और धिक्कार हो उसपर जो उन्होंने कमाया। (2:79) इतिहास में सदैव ही ऐसे विद्वान रहे हैं जिन्होंने धर्म को अपने संसार प्रेम का साधन बनाया। बिल्कुल किसी विक्रेता की भांति जो पैसा कमाने के लिए कोई वस्तु बेचता है, उसी प्रकार पैसों का मोह रखने वाले कुछ लोग जो धर्म के वस्त्र में आ गए हैं, पैसा कमाने के लिए धर्म बेचते हैं। लोगों को प्रसन्न करने, राजाओं या बड़े अधिकारियों के समीप पद प्राप्त करने अथवा व्यक्तिगत या सामूहिक हित के लिए ईश्वर के धर्म में फेर बदल करना, इस आयत का स्पष्टतम संबोधन है जिसमें क़ुरआन बड़े कड़े स्वर में और शब्द वैल अर्थात धिक्कार को तीन बार दोहराकर इस ख़तरे की ओर से सचेत कर रहा है। अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या बातें सीखीं। सब लोगों के ईमान लाने की आशा रखना अच्छा है परन्तु हमें जान लेना चाहिए कि बहुत से लोग सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते अतः उनका कुफ़्र हमारे विश्वास में सन्देह उत्पन्न होने का कारण न बने। सबसे बड़ा विश्वासघात, सांस्कृतिक विश्वासघात है। सत्य को छिपाना या उसमें फेर बदल करना ऐसा विश्वासघात है जो आने वाली अनेक पीढ़ियों को सत्य को समझने से दूर रखता है और समाज को पथभ्रष्ट कर देता है। लोगों द्वारा आसमानी किताबों विशेषकर क़ुरआन से दूरी, उनके बीच बुरे विचार और पथभ्रष्टता फैलाने की भूमि समतल करती है और निरक्षरता इस बड़ी समस्या का एक कारण है। धर्म बनाना या धर्म बेचना ऐसा बड़ा ख़तरा है जो बहके हुए विद्वानों की ओर से लोगों को लगा रहता है अतः लोगों को सचेत रहना चाहिए और हर बात को स्वीकार नहीं करना चाहिए, चाहे बोलने वाला विदित रूप से धर्म के वस्त्र में ही क्यों न हो।