islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए बक़रह; आयतें ८०-८४ (कार्यक्रम 35)

    सूरए बक़रह; आयतें ८०-८४ (कार्यक्रम 35)

    Rate this post

    सूरए बक़रह की ८०वीं आयत इस प्रकार है।وَقَالُوا لَنْ تَمَسَّنَا النَّارُ إِلَّا أَيَّامًا مَعْدُودَةً قُلْ أَتَّخَذْتُمْ عِنْدَ اللَّهِ عَهْدًا فَلَنْ يُخْلِفَ اللَّهُ عَهْدَهُ أَمْ تَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ (80)और बनी इस्राईल ने कहाः नरक की आग कुछ दिनों से अधिक हमें छू भी नहीं सकती, तो हे पैग़म्बर उनके कह दो कि क्या तुम ईश्वर के पास कोई प्रतिज्ञा करा चुके हो कि ईश्वर उसका विरोध नहीं कर सकता, या तुम उस से उन बातों को संबंधित करना चाहते हो जिनके बारे में तुम्हें कोई ज्ञान नहीं है। (2:80) जैसा कि हमने विगत कार्यक्रमों में कहा था कि यहूदी जाति के सामान्य लोगों को आसमानी किताबों के बारे में कोई ज्ञान नहीं था और वे ये सोचते थे कि वे ईश्वर से सबसे अधिक समीप हैं और यहूदी जाति ही सर्वश्रेष्ठ जाति है। उनका एक ग़लत विचार यह था कि वे कहते थे कि यदि हम ने पाप किया भी तो हमें दूसरों से कम दंड मिलेगा और हम केवल कुछ दिन दंड भुगतेंगे। यह आयत उनकी इस ग़लत सोच पर अंकुश लगाते हुए कहती है कि ये एक अनुचित बात है जो तुम लोग ईश्वर से संबन्धित कर रहे हो, क्योंकि उसने सभी मनुष्यों की एक समान सृष्टि की है तथा उनको दंड या पुरस्कार देने में वो कोई अंतर नहीं रखता। नैतिक रूप से जाति, मूल व धर्म के आधार पर विशिष्टता प्राप्त करने की सोच किसी भी तर्क के अनुकूल नहीं है और केवल पवित्रता और अच्छे कर्म ही मनुष्यों की एक दूसरे पर वरीयता का कारण बन सकते हैं और प्रलय में दंड और पुरस्कार का यही मानदंड होगा।अब सूरए बक़रह की ८१वीं और ८२वीं आयतें इस प्रकार हैं।بَلَى مَنْ كَسَبَ سَيِّئَةً وَأَحَاطَتْ بِهِ خَطِيئَتُهُ فَأُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (81) وَالَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أُولَئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (82) हां, निःसन्देह जो कोई पाप कमाता है और पाप उसके अस्तित्व को घेर लेता है, निश्चय ही ऐसे लोग नरक के पात्र हैं जहां वे सदैव रहेंगे। और जो लोग ईश्वर पर ईमान लाए और भले कर्म किये निश्चित रूप से वे स्वर्ग मंव जाएंगे और सदैव वहीं रहेंगे। (2:81, 82) पिछली आयत ने यहूदी जाति की इन निराधार आशाओं का उल्लेख किया था कि वे नरक में नहीं जाएंगे तथा इस बात को ईश्वर का आरोप बताया था। ये दो आयतें प्रलय में ईश्वर की ओर से मिलने वाले दंड या पुरस्कार के मानदंड का इस प्रकार उल्लेख कर रही हैं। जो कोई भी जान बूझकर पाप करेगा, इस सीमा तक कि पाप उसके पूरे अस्तित्व को घेर ले तो वो सदैव नरक में रहेगा और उससे निकलने का कोई मार्ग न होगा और इस दंड में यहूदियों या दूसरी जातियों में कोई अंतर नहीं है। इसी प्रकार स्वर्ग में प्रवेश की शर्त ईश्वर पर ईमान और अच्छे कर्म हैं तथा केवल ईमान व केवल अच्छे कर्म ही स्वर्ग में जाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, न कि कोई ये सोचे कि वो केवल कल्पना और आशाओं के आधार पर स्वर्ग में चला जाएगा। अब सूरए बक़रह की ८३वीं आयत इस प्रकार है।وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَ بَنِي إِسْرَائِيلَ لَا تَعْبُدُونَ إِلَّا اللَّهَ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا وَذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَقُولُوا لِلنَّاسِ حُسْنًا وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآَتُوا الزَّكَاةَ ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا مِنْكُمْ وَأَنْتُمْ مُعْرِضُونَ (83)और याद करो उस समय को जब हमने बनी इस्राईल से प्रतिज्ञा ली कि तुम एक ईश्वर के अतिरिक्त किसी की उपासना नहीं करोगे, माता पिता, नातेदारों, अनाथों और दरिद्रों के साथ अच्छा व्यवहार करोगे, और ये कि लोगों के साथ भली बातें करोगे, नमाज़ क़ाएम करोगे, ज़कात दोगे, फिर थोड़े से लोगों को छोड़कर तुम सब अपनी प्रतिज्ञा से फिर गए और तुम मुहं मोड़ने वाले लोग हो। (2:83) पिछले कार्यक्रमों में बनी इस्राईल से ली गई प्रतिज्ञा का वर्णन हुआ था परन्तु उसके बारे में विस्तार से नहीं बताया गया था। ये आयत तथा इसके बाद की आयत बताती है कि प्रतिज्ञा किन किन बातों के बारे में ली गई थी, इसके पश्चात प्रतिज्ञा तोड़ने के कारण उनको लताड़ती है। ईश्वरीय प्रतिज्ञाएं जो पैग़म्बरों द्वारा लोगों तक पहुंचाई गई हैं बुद्धि तथा मानव प्रकृति के अनुकूल है, और ईश्वर ने इन धार्मिक मान्यताओं को सभी मनुष्यों की प्रवृत्ति में रखा है। एकेश्वरवाद सभी पैग़म्बरों की शिक्षाओं में सर्वप्रथम है अर्थात हमारे कर्म केवल उसी दशा में सौभाग्य का कारण बनेंगे जब उनमें ईश्वरीय रंग होगा और वो एकेश्वरवाद के आधार पर किये गए होंगे। ईश्वर की उपासना के पश्चात दूसरा आदेश माता पिता का आज्ञापालन तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करना है क्योंकि वही हमारी सृष्टि के माध्यम हैं और ईश्वरीय कृपा उनके माध्यम से हम तक पहुंचती है। समाज के वंचित एवं दरिद्र लोगों विशेषकर सगे संबन्धियों का ध्यान रखने का आदेश माता-पिता के साथ भलाई करने के आदेश के साथ आया है ताकि मनुष्य केवल अपने और अपने परिवार को ही न देखे बल्कि उस समाज पर भी ध्यान दे जिसमें वह जीवन व्यतीत कर रहा है। लोगों की सेवा के साथ ईश्वर की उपासना उसके विशेष रूप में करने का आदेश दिया गया है जो कि नमाज़ है और जो अपने सृष्टिकर्ता और रचयिता से स्थाई संपर्क के लिए मनुष्य की आवश्यकता को दर्शाती है। ईश्वर की उपासना करने वाले का न केवल व्यवहार बल्कि कथन शैली भी अच्छी होनी चाहिए और वो भी केवल अपने धर्म वालों के साथ ही नहीं बल्कि सभी के साथ चाहे वो मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम।अब सूरए बक़रह की ८४वीं आयत इस प्रकार है।وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَكُمْ لَا تَسْفِكُونَ دِمَاءَكُمْ وَلَا تُخْرِجُونَ أَنْفُسَكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ ثُمَّ أَقْرَرْتُمْ وَأَنْتُمْ تَشْهَدُونَ (84)और याद करो उस समय को जब हमने तुमसे प्रतिज्ञा ली थी कि एक दूसरे का रक्तपात न करोगे, और एक दूसरे को अपनी भूमि से न निकालोगे, फिर तुमने इसे माना और इस प्रतिज्ञा की गवाही दी। (2:84) पिछली आयत में ६ ईश्वरीय आदेशों का उल्लेख किया गया। इन आयतों में मनुष्यों के जीवन तथा उनके देश और रहने के स्थान के आदर के संबन्ध में दो अन्य आदेशों का वर्णन किया गया है। किसी समाज की मूल आवश्यकताओं में से एक, लोगों की सुरक्षा है। उनके जीवन व उनकी धरती की सुरक्षा जो सभी ईश्वरीय धर्मों में वर्णित है। चूंकि जीवन का अधिकार हर मनुष्य का प्रथम अधिकार है चाहे वो किसी भी जाति, मूल या धर्म का हो, इसी कारण हत्या बड़े पापों में समझी जाती है और संसार में उसका बदला क़ेसास अर्थात मृत्युदंड और प्रलय में, सदा के लिए नरक में जाना है। देशप्रेम एक प्राकृतिक बात है और धर्म ने भी इसका सम्मान किया है अतः कोई भी किसी से यह अधिकार नहीं छीन सकता।अब देखते हैं कि हमने इन आयतों से क्या बातें सीखीं हैं। विशिष्टता चाहना या जातीय भेदभाव वर्जित है। सारे मनुष्य ईश्वर की दृष्टि मं एक समान हैं तथा कोई भी जाति या कोई भी विचारधारा ईश्वर के समक्ष दूसरों से बेहतर नहीं है। ईश्वरीय उपहार या दंड का मानदंड, ईश्वर पर ईमान और अच्छे कर्म हैं न कि आशाएं और कामनाएं तथा बिना कर्म के आशा का कोई मूल्य नहीं है। कभी कभी पाप मनुष्य के अस्तित्व में ऐसा रच बस जाता है कि उसके हृदय और उसकी आत्मा को भी ढांप देता है और फिर वो मनुष्य बात और व्यवहार में पाप और बुराई के अतिरिक्त कुछ नहीं करता। मनुष्य के सौभाग्य के लिए जो महत्वपूर्ण प्रतिज्ञाएं ईश्वर ने उससे ली हैं वो ये हैं। एकेश्वरवाद, माता-पिता के साथ भला व्यवहार, वंचित व दरिद्र लोगों, नातेदारों तथा अनाथों का ध्यान रखना, लोगों के साथ भली बातें करना, नमाज़ पढ़ना, ज़कात देना, हत्या और रक्तपात से दूर रहना, दूसरों के घरों और यहूदियों पर अतिक्रमण न करना।