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    सूरए बक़रह; आयतें 103-107 (कार्यक्रम 40)

    सूरए बक़रह; आयतें 103-107 (कार्यक्रम 40)
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    सूरए बक़रह की आयत नंबर १०३ इस प्रकार है। وَلَوْ أَنَّهُمْ آَمَنُوا وَاتَّقَوْا لَمَثُوبَةٌ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ خَيْرٌ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ (103)यदि वे ईमान लाते और ईश्वर से भयभीत रहते तो निःसन्देह, उनके लिए ईश्वर के पास जो बदला है वो बेहतर था, यदि वे जानते होते। (2:103) पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि यहूदी जाति, तौरेत व अन्य आस्मानी किताबों का अनुसरण करने के स्थान पर जादू टोने से संबन्धित किताबों की ओर आकृष्ट हुई। अपने इस कार्य के औचित्य के लिए वे हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम को जादू टोने का स्रोत बताते थे, परन्तु क़ुरआन ने हज़रत सुलैमान को इस लांछन से दूर और पवित्र बताया। यह आयत कहती है कि यदि यहूदी वास्तविक ईमान रखते और इस प्रकार के अनुचित कार्यों और निराधार आरोपों से दूर रहते तो उनके लिए बेहतर था क्योंकि केवल ईमान ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अपने कार्यों की देख-रेख और पवित्रता भी आवश्यक है। ईश्वर से भयभीत रहना केवल बुरे कार्यों से बचने का नाम नहीं है बल्कि ये एक आंतरिक शक्ति है जो मनुष्य को झूठ जैसे बुरे कार्य से भी रोकती है और नमाज़ जैसे अच्छे कार्य के लिए प्रेरित करती है।आइए अब सूरए बक़रह की आयत क्रमांक १०४ इस प्रकार है।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَقُولُوا رَاعِنَا وَقُولُوا انْظُرْنَا وَاسْمَعُوا وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ (104)हे ईमान लाने वालो, पैग़म्बर से मोहलत मांगने के लिए “राएना” शब्द मत कहो (क्योंकि यहूदियों के समीप ये एक प्रकार का अपशब्द है) बल्कि कहो, “उन्ज़ुरना” (अर्थात हमें समय या मोहलत दीजिए) इस बात को सुनो और जान लो कि काफ़िरों के लिए ख़तरनाक दण्ड है। (2:104) जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम भाषण कर रहे होते या ईश्वरीय आयतों की तिलावत कर रहे होते तो इस्लाम के उदय के समय के मुसलमान उनकी बातों को अच्छे ढंग से समझने के लिए, उनसे निवेदन करते कि वे उनकी स्थिति के अनुसार बात करें। अपना यह निवेदन वे “राएना” शब्द कहकर करते जिसका अर्थ है हमारा भी ध्यान रखें परन्तु इब्रानी या हिब्रू भाषा में इस शब्द का अर्थ मूर्खता है और यहूदी, मुसलमानों का परिहास करते थे कि तुम अपने पैग़म्बर से निवेदन करते हो कि वे तुम्हें मूर्ख बनाएं। अतः आयत आई कि “राएना” शब्द के स्थान पर “उन्ज़ुरना” शब्द कहो जिसका अर्थ भी वही है जो राएना का है ताकि शत्रु दुरुपयोग न कर सकें और इसे तुम्हारे और पैग़म्बर के परिहास का साधन न बनाएं, और मूल रूप से तुम्हें हर उस शब्द और कार्य से बचना चाहिए जो शत्रु के हाथ कोई बहाना दे। यह आयत बताती है कि इस्लाम, बड़े लोगों और अध्यापकों से बात करते समय उचित शब्दों का चयन और उनके सम्मान पर ध्यान देता है और मुसलमानों को हर उस कार्य से रोकता है जो पवित्र चीज़ों के अपमान या परिहास और शत्रु के द्वारा दुरूपयोग का कारण बनता हो।आइए अब सूरए बक़रह की १०५वीं आयत है।مَا يَوَدُّ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ وَلَا الْمُشْرِكِينَ أَنْ يُنَزَّلَ عَلَيْكُمْ مِنْ خَيْرٍ مِنْ رَبِّكُمْ وَاللَّهُ يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِ مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ (105)आसमानी किताब रखने वाले काफ़िर और इसी प्रकार अनेकेश्वरवादी नहीं चाहते कि तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे लिए विभूति भेजी जाए जबकि ईश्वर जिसको चाहता है अपनी दया को उसके लिए विशेष कर देता है और वो महान कृपालु है। (2:105) यह आयत मोमिनों के प्रति काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की शत्रुता और द्वेष का उल्लेख करती है कि वे ईर्ष्या के कारण ये नहीं देख सकते कि मुसलमानों के पास कोई आस्मानी किताब और पैग़म्बर हो और वे अन्य आसमानी किताब वालों की ग़लत बातों और उनके द्वारा की गई उलटफेर के विरुद्ध संघर्ष करें। इस आयत में ईश्वर कहता है कि वे अपनी दया व कृपा के आधार पर, जिसे बेहतर समझता है पैग़म्बर बनाता है और उसे लोगों की इन इच्छाओं से कुछ लेना- देना नहीं कि वो पैग़म्बर इस जाति का हो या उस जाति का, इस क़बीले का हो या उस क़बीले का।सूरए बक़रह की आयत नंबर १०६ इस प्रकार है।مَا نَنْسَخْ مِنْ آَيَةٍ أَوْ نُنْسِهَا نَأْتِ بِخَيْرٍ مِنْهَا أَوْ مِثْلِهَا أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (106)हम जिस आदेश या आयत को स्थगित करते हैं या उसके उतारने में विलंब करते हैं तो उस से बेहतर या उसी के समान ले आते हैं क्या तुम नहीं जानते कि ईश्वर इस बात की शक्ति व क्षमता रखता है। (2:106) आरंभ में मुसलमानों का क़िबला बैतुलमुक़द्दस की दिशा में था परन्तु चूंकि यहूदी इस बात को बहाना बनाकर कहते थे कि तुम मुसलमानों का कोई स्वाधीन धर्म नहीं है इसी कारण तुम लोग हमारे क़िबले की दिशा में खड़े होते हो, अतः ईश्वर के आदेश पर बैतुल मुक़द्दस के स्थान पर काबे को मुसलमानों का क़िबला बना दिया गया। इस बार यहूदियों ने दूसरी आपत्ति की कि यदि पहला क़िबला ठीक था तो उसे क्यों बदला गया? और दूसरा ठीक है तो तुम्हारे पहले के सारे कर्म बेकार हो गए। क़ुरआन उनकी इन आपत्तियों के उत्तर में कहता है कि हम किसी भी आदेश को स्थगित नहीं करते या उसमें विलंब नहीं करते सिवाए इसके कि उससे बेहतर या उसी के समान कोई विकल्प लाएं। क़िबले का परिवर्तन या काबे की मुसलमानों के क़िबले के रूप में घोषणा में विलंब के विभिन्न तर्क और लक्ष्य हैं जिनसे तुम अनभिज्ञ हो। चूंकि इस्लामी आदेश तर्क और युक्ति के अधीन हैं अतः समय, स्थान या परिस्थितियों के बदलने से संभावित रूप से कार्यों की युक्ति परिवर्तित हो सकती है तथा पिछला आदेश रद्द और उसके स्थान पर अन्य आदेश आ सकता है। अलबत्ता ईश्वरीय आदेशों की मूल नीतियां स्थिर हैं और उनमें परिवर्तन नहीं हो सकता परन्तु आंशिक बातों विशेषकर प्रशासनिक मामलों में ये कार्य स्वीकारीय है। यह आयत बताती है इस्लाम में कोई बंद गली नहीं है अर्थात इसमें हर समस्या का समाधान मौजूद है क्योंकि वो एक विश्वव्यापी और स्थाई धर्म है, स्थिर आदेशों के साथ ही इस्लाम के हितों के अनुकूल उसमें परिवर्तित होने वाले क़ानून भी हो सकते हैं।सूरए बक़रह की आयत नंबर १०७ इस प्रकार है।أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ (107)क्या तुम्हें नहीं मालूम कि धरती व आकाशों पर ईश्वर का राज्य व स्वामित्व है? और उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई भी सहायक और अभिभावक नहीं है? (2:107) पिछली आयत के पश्चात जिसमें कुछ ईश्वरीय आदेशों के स्थगन का उल्लेख हुआ था, यह आयत कहती है कि जो लोग ईश्वरीय आदेशों में परिवर्तन पर आपत्ति करते हैं क्या वे ईश्वर के संपूर्ण राज्य व स्वामित्व पर ध्यान नहीं देते? क्या वे नहीं जानते कि ईश्वर मनुष्य सहित सृष्टि की हर वस्तु का स्वामी है और उसे ये अधिकार प्राप्त है कि वो अपनी इच्छा और सलाह के अनुसार आदेशों और क़ानूनों में परिवर्तन करे। बनी इस्राईल के मन में ईश्वर के स्वामित्व और राज्य की ग़लत कल्पना थी और समझते थे कि ईश्वर अपने राज को लागू करने में अक्षम है, जबकि ईश्वर हर बात की क्षमता रखता है चाहे सृष्टि व रचना का मामला हो, चाहे क़ानून बनाने का या उन क़ानूनों में परिवर्तन का।आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा। केवल ईमान ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अपने कर्मों की देखभाल और ईश्वर से भयभीत रहना भी आवश्यक है ताकि ईमान के वृक्ष को हर प्रकार की मुसीबत और ख़तरे से बचाया जा सके। शत्रु हमारी गतिविधियों यहां तक कि हमारे शब्दों पर भी दृष्टि रखे हुए है अतः हमें हर उस कार्य या बात से बचना चाहिए जो शत्रु के हाथ कोई ऐसा बहाना दे दे जिसे वह इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध प्रयोग करे। इस्लाम के शत्रु चाहते हैं कि हर प्रकार की प्रगति और उन्नति उनके हाथ में रहे, उन्हें यह बात पसंद नहीं है कि कोई भी प्रगति या विभूति मुसलमानों को प्राप्त हो अतः उनपर भरोसा नहीं करना चाहिए और न ही उनमें कोई आशा रखनी चाहिए बल्कि केवल ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए। आदेश बनाना या उनमें परिवर्तन और विलंब ईश्वर के हाथ में है और वह मानवता की स्थाई और परिवर्तनशील आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर, विवेक और मानव हितों के अनुसार कोई क़ानून बनाता या उसे परिवर्तित करता है।