islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए बक़रह; आयतें 108-112 (कार्यक्रम 41)

    सूरए बक़रह; आयतें 108-112 (कार्यक्रम 41)

    Rate this post

    सूरए बक़रह की १०८वीं आयत इस प्रकार है।أَمْ تُرِيدُونَ أَنْ تَسْأَلُوا رَسُولَكُمْ كَمَا سُئِلَ مُوسَى مِنْ قَبْلُ وَمَنْ يَتَبَدَّلِ الْكُفْرَ بِالْإِيمَانِ فَقَدْ ضَلَّ سَوَاءَ السَّبِيلِ (108)क्या तुम चाहते हो कि अपने पैग़म्बर से प्रश्न और अनुचित मांगे करो, जैसा कि इससे पूर्व बनी इस्राईल ने मूसा से प्रश्न किये थे। जान लो कि कोई इस प्रकार की बहाने बाज़ियों द्वारा, ईमान लाने से कतराता रहेगा और कुफ़्र को ईमान से बदलेगा तो निःसन्देह वो सीधे मार्ग से भटका हुआ है। (2:108) कुछ कमज़ोर ईमान वाले मुसलमान चाहते थे कि वे पैग़म्बर से जैसा चमत्कार दिखाने को कहें वे दिखाएं, उदाहरण स्वरूप वे कहते थे कि हमारे लिए ईश्वर की ओर से पत्र लाइए, जैसा कि बनी इस्राईल ने हज़रत मूसा से कहा था कि हमें स्पष्ट रूप से ईश्वर को दिखाओ ताकि हम उसपर ईमान लाएं। नैतिक रूप से चमत्कार दिखाना, नुबुव्वत अर्थात ईश्वर के दूत के पद को सिद्ध करने के लिए है न ये कि पैग़म्बर का कर्तव्य है कि हर किसी की इच्छा के अनुसार चमत्कार दिखाए जैसा कि एक सिविल इन्जीनियर अपना कौशल दिखाने और अपने दावे को सिद्ध करने के लिए अपने काम के कुछ उदाहरण बताता है न कि हर किसी के कहने पर एक घर बनाता है।सूरए बक़रह की १०९वीं आयत इस प्रकार है।وَدَّ كَثِيرٌ مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يَرُدُّونَكُمْ مِنْ بَعْدِ إِيمَانِكُمْ كُفَّارًا حَسَدًا مِنْ عِنْدِ أَنْفُسِهِمْ مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ الْحَقُّ فَاعْفُوا وَاصْفَحُوا حَتَّى يَأْتِيَ اللَّهُ بِأَمْرِهِ إِنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (109)आसमानी किताबों के अनेक अनुसरणकर्ता (न केवल ये कि स्वयं इस्लाम स्वीकार नहीं करते बल्कि) अपने असितत्व में मौजूद ईर्ष्या और द्वेष के कारण, चाहते हैं कि तुम्हें भी तुम्हारे ईमान के पश्चात कुफ़्र की ओर पलटा दें, जबकि सत्य उनके लिए स्पष्ट हो चुका है। परन्तु तुम उन्हें क्षमा करो ताकि ईश्वर अपना आदेश भेज दे, निःसन्देह ईश्वर हर बात की क्षमता रखता है। (2:109) मदीने के यहूदी सदैव इस प्रयास में रहते थे कि मुसलमानों को अच्छे धर्म से पलटा दें या कम से कम उनके ईमान को कमज़ोर कर दें। क़ुरआन मुसलमानों से कहता है, ये मत सोचो कि चूंकि वे स्वयं को सत्य पर समझते हैं इसलिए ऐसा कहते हैं, नहीं, बल्कि वे इस्लाम और क़ुरआन की सत्यता को समझ चुके हैं परन्तु ईर्ष्या वे द्वेष के कारण वे ऐसा करते हैं। चूंकि उस समय मुसलमानों की शक्ति कम थी अतः ईश्वर आदेश देता है कि अभी तुम शत्रु के भारी दबाव के मुक़ाबले में क्षमा को अपना हथियार बनाओ और आत्मनिर्माण में व्यस्त रहो यहां तक कि ईश्वर का आदेश अर्थात काफ़िरों से जेहाद का आदेश आ जाए। यह आयत बताती है कि शत्रु के मुक़ाबले पर हिन्सा सबसे पहला कार्यक्रम नहीं है बल्कि इस्लामी शिष्टाचार की मांग है कि क्षमा द्वारा शत्रु की सुधार की भूमि समतल की जाए और फिर भी यदि उसमें सुधार न आए तो उससे मुक़ाबला किया जाए।सूरए बक़रह की ११०वीं आयत इस प्रकार है।وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآَتُوا الزَّكَاةَ وَمَا تُقَدِّمُوا لِأَنْفُسِكُمْ مِنْ خَيْرٍ تَجِدُوهُ عِنْدَ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ (110)और नमाज़ क़ाएम करो व ज़कात दो और जान लो कि जो भी भलाई तुम पहले से स्वयं के लिए भेजते हो उसको प्रलय में ईश्वर के पास पाओगे। निःसन्देह तुम जो कुछ करते हो, ईश्वर उसको देखने वाला है। (2:110) मुसलमानों के ईमान को कमज़ोर बनाने की शत्रु की इच्छा के मुक़ाबले में, ईश्वर उनके ईमान की सुरक्षा के लिए आदेश देता है कि वे ईश्वर से अपने संपर्क को नमाज़ द्वारा और अन्य मुसलमानों विशेषकर वंचितों के साथ ज़कात द्वारा अपने संबन्ध और संपर्क को सुदृढ़ बनाए। साधारणतयः क़ुरआन में नमाज़ का आदेश, ज़कात के साथ आया है, शायद इसका तात्पर्य ये हो कि ईश्वर की उपासना, जनता की सेवा के बिना पर्याप्त नहीं है और दूसरी ओर दरिद्रों और वंचितों की सहायता यदि ईश्वर की उपासना के साथ न हो तो, वंचित लोगों के समक्ष घमंड, अहंकार, उनपर उपकार जमाने और उन्हें ग़ुलाम बनाने की भावना उत्पन्न करेगी। मनुष्य की एक चिंता ये है कि लोग उसकी मेहनत कष्ट और सेवा को समझ नहीं पाएंगे और यदि समझेंगे तो उसका महत्व नहीं समझेंगे। अतः वो अच्छा कार्य करने में ढीला पड़ जाता है। ये आयत कहती है कि चिंता मत करो क्योंकि जो कुछ तुम करते हो ईश्वर उसे देखता है तथा उसका बदला ईश्वर के पास सुरक्षित है।सूरए बकरह की १११वीं और ११२वीं आयतें इस प्रकार है।وَقَالُوا لَنْ يَدْخُلَ الْجَنَّةَ إِلَّا مَنْ كَانَ هُودًا أَوْ نَصَارَى تِلْكَ أَمَانِيُّهُمْ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (111) بَلَى مَنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَلَهُ أَجْرُهُ عِنْدَ رَبِّهِ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (112)उन्होंने कहा कि स्वर्ग में केवल वही जा सकता है जो यहूदी या ईसाई हो, ये उनकी कल्पनाएं हैं, हे पैग़म्बर उनसे कह दो कि यदि तुम सच्चे हो तो अपना तर्क प्रस्तुत करो। (2:111) हां, जो कोई अपना मुख ईश्वर के समक्ष झुका ले और वो नेक भी हो तो उसका बदला, उसके पालनहार के पास है और उनके लिए न कोई भय होगा और न भी वे दुखी होंगे। (2:112) मुसलमानों की भावनाओं को कमज़ोर बनाने के लिए आसमानी किताबों के मानने वालों की एक अन्य शैली ये थी कि वे कहते थे, स्वर्ग पर हमारा अधिकार है अतः यदि तुम स्वर्ग में जाना चाहते हो तो यहूदी या ईसाई धर्म की ओर पलट आओ। क़ुरआन उनके उत्तर में कहता है, तुम्हारी यह बात कल्पना और कामना के अतिरिक्त कुछ नहीं है और तुम्हारे पास इसका कोई प्रमाण और तर्क नहीं है क्योंकि स्वर्ग किसी भी जाति या समुदाय के अधिकार में नहीं है, उसका एक मानदंड है, जो भी उस मानदंड पर पूरा उतरेगा वो स्वर्ग में जाएगा। स्वर्ग में प्रेवश की कुंजी, ईश्वर के प्रति समर्पित रहना है, मनुष्य केवल उसी की ओर आकृष्टि रहे और उसके मार्ग में भले कर्म करता रहे। अतः ईश्वरीय आदेशों में से जो अपनी इच्छा के अनुसार हों उसे स्वीकार करना, जो इच्छा के अनुकूल न हों उसको छोड़ देना, ईश्वर के प्रति समर्पित रहने से मेल नहीं खाता। नैतिक रूप से भेदभाव और एकाधिकारप्रेम, ईश्वरीय आदेशों के सामने नतमस्तक रहने के विपरीत है और जो लोग इस्लाम की सत्यता को समझने के बाद भी सांप्रदायिकता के कारण ईमान लाने के लिए तैयार नहीं हुए वे स्वर्ग में नहीं जाएंगे चाहे वो आसमानी किताब के मानने वाले ही क्यों न हों। यह आयत अंत में कहती है कि जो कोई भी केवल ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहता है उसे कोई भी भय नहीं होता, वो सदैव अपने साथ ईश्वर की उपस्थिति का आभास करता है और स्वयं को उसकी शरण में पाता है।आइए अब देखते हैं कि हमने इन आयतों से क्या सीखा। धर्म गुरुओं से रखी जाने वाली कुछ अनुचित अपेक्षाएं और कामनाएं, कुफ़्र की भूमि समतल करती हैं, क्योंकि वे इन अनुचित कामनाओं से प्रभावित नहीं होते और उन्हें पूरा नही करते, परिणाम स्वरूप मांग करने वाले व्यक्ति का ईमान डगमगा जाता है। क्षमा और उदारता, काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों के प्रति हिंसा और आक्रामक व्यवहार पर प्राथमिक्ता रखती है और ये क्षमा, कमज़ोरी की निशानी नहीं है बल्कि उन्हें आकृष्ट करने और उनमें सुधार लाने की भूमि समतल करती है। लोगों की सेवा करनी चाहिए, यद्यपि वे ध्यान न दें या आभार प्रकट न करें क्योंकि ईश्वर देखने वाला है और वो भला कर्म उसके पास सुरक्षित है, यहां तक कि प्रलय में वो उसका बदला दे। ये नहीं सोचना चाहिए कि स्वर्ग किसी विशेष जाति या समुदाय के नियंक्षण में है या हम इस विचार में रहें कि चूंकि हम मुसलमान हैं इसलिए स्वर्ग हमारे लिए विशेष है, क्योंकि ईश्वर पर आस्था और भले कर्म स्वर्ग का मानदंड हैं न कि मुसलमान होने का शीर्षक। लोक व परलोक में वास्तविक शांति, ईमान, निःस्वार्थता और भले कर्म की छाया में प्राप्त होगी। जो भी ईश्वर के प्रति समर्पित रहेगा और केवल उसी पर भरोसा करेगा उसे ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी भय नहीं होगा और वो सदैव स्वयं को ईश्वर की शरण मे पाएगा।