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    सूरए बक़रह; आयतें 113-117 (कार्यक्रम 42)

    सूरए बक़रह; आयतें 113-117 (कार्यक्रम 42)
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    सूरए बक़रह की ११३वीं आयत इस प्रकार है।وَقَالَتِ الْيَهُودُ لَيْسَتِ النَّصَارَى عَلَى شَيْءٍ وَقَالَتِ النَّصَارَى لَيْسَتِ الْيَهُودُ عَلَى شَيْءٍ وَهُمْ يَتْلُونَ الْكِتَابَ كَذَلِكَ قَالَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ مِثْلَ قَوْلِهِمْ فَاللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ (113)यहूदी कहते हैं ईसाई हक़ अर्थात सत्य पर नहीं हैं और ईसाई कहते हैं कि यहूदी हक़ अर्थात सत्य पर नहीं हैं जबकि दोनों गुट आसमानी किताब की तिलावत करते हैं, इसी प्रकार जो लोग ईश्वर की किताब के बारे में कोई ज्ञान नहीं रखते उन्हीं के समान बातें करते हैं परन्तु ईश्वर प्रलय के दिन उनके बीच, उन बातों के बारे में फ़ैसला करेगा जिनमें वे मतभेद रखते हैं। (2:113) पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि यहूदी और ईसाई दोनों गुट स्वर्ग को अपनी जागीर समझते थे और दूसरों के लिए कोई अधिकार स्वीकार नहीं करते थे, ये आयत इस ग़लत विचार के मूल कारण का उल्लेख करते हुए कहती है कि अकारण सांप्रदायिक्ता इस बात का कारण बनी है कि ये दोनों एक दूसरे को हक़ पर नहीं मानते, जबकि दोनों ही गुट आस्मानी किताब की तिलावत करते हैं और ईश्वरीय पैग़म्बरों के अनुसरणकर्ता हैं। रोचक बात यह है कि अनेकेश्वरवादी भी जिनके पास ईश्वरीय किताब नहीं है, इनके बारे में यही बातें करते हैं क्योंकि सांप्रदायिक्ता और तर्कहीन एकाधिकार की भावना मनुष्य को सत्य स्वीकार करने से रोक देती है और वो केवल स्वयं को हक़ पर समझता है और अन्य लोगों को चाहे वो जो भी हों, ग़लत समझता है। यह आयत स्पष्ट रूप से बताती है कि अकारण सांप्रदायिकता से परिपूर्ण वातावरण में ज्ञानी और अनपढ़ एक ही समान विचार करते हैं। तौरेत व इंजील अर्थात बाइबिल के बारे में ज्ञान रखने वाले भी वही बातें करते थे जो अनपढ़ एकेश्वरवादी करते थे। हर एक बिना तर्क के दूसरे को ग़लती पर बताता था। सूरए बक़रह की ११४वीं आयत इस प्रकार है।وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنْ مَنَعَ مَسَاجِدَ اللَّهِ أَنْ يُذْكَرَ فِيهَا اسْمُهُ وَسَعَى فِي خَرَابِهَا أُولَئِكَ مَا كَانَ لَهُمْ أَنْ يَدْخُلُوهَا إِلَّا خَائِفِينَ لَهُمْ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ وَلَهُمْ فِي الْآَخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ (114)उससे बड़ा अत्याचारी कौन है जिसने ईश्वर की मस्जिदों में उसका नाम लेने से रोका तथा उन्हें तोड़ने का प्रयास किया, ये ऐसे लोग हैं जिन्हें मस्जिदों में भय के अतिरिक्त प्रवेष करने का अधिकार नहीं है। संसार में उनके लिए अपमान होगा तथा प्रलय में महान दंड। (2:114) इतिहास में सदैव मस्जिदों को बंद करने या उन्हें तोड़ने और ढहाने का प्रयास किया गया है क्योंकि मस्जिद और उपासना के अन्य स्थान ईश्वरीय धर्मों के शासन के केन्द्र और उनके मानने वालों के एकत्रित होने और आपसी प्रेम बढ़ाने के स्थान रहे हैं अतः अत्याचारी शासकों और वैचारिक रूप से पथभ्रष्ट लोगों ने मस्जिदों की विदित और आध्यात्मिक बनावट को तोड़ने का प्रयास किया है जैसा कि मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने वर्षों तक मुसलमानों को मस्जिदुल अक़सा में जाने नहीं दिया था। आज भी इस्लाम के शत्रु बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदुल अक़सा को तोड़ने के प्रयास कर रहे हैं और भारत की एतिहासिक बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया है। अलबत्ता मस्जिदों को तोड़ने का अर्थ केवल उनके विदित ढांचे को ढहाना नहीं है बल्कि हर वह कार्य जो मस्जिदों की चहल-पहल को कम करने और लोगों को ईश्वर की याद से निश्चेत करने और उनके मस्जिदों से दूर रहने का कारण बने, मस्जिद तोड़ने के समान है। वीडियो या सिनेमा पर गंदी फ़िल्मों का प्रचलन इस्लामी देशों के युवाओं को मस्जिदों और धार्मिक केन्द्रों से दूर रखने के लिए शत्रु का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। सूरए बक़रह की ११५वीं आयत इस प्रकार है।وَلِلَّهِ الْمَشْرِقُ وَالْمَغْرِبُ فَأَيْنَمَا تُوَلُّوا فَثَمَّ وَجْهُ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ وَاسِعٌ عَلِيمٌ (115)इस आयत का अनुवाद है। पूरब और पश्चिम ईश्वर के ही हैं अतः तुम जिस ओर भी मुख करोगे वहीं ईश्वर का चेहरा मौजूद है। निःसन्देह, ईश्वर बढ़ोत्तरी करने वाला और अत्यधिक जानकार है। (2:115) जब ईश्वर के आदेश से मुसलमानों का क़िब्ला बैतुल मुक़द्दस की ओर से काबे की ओर परिवर्तित हुआ तो यहूदियों ने यह संदेह उत्पन्न किया कि यदि पहला क़िब्ला ठीक था तो उसे क्यों परिवर्तित किया गया और यदि वह ठीक नहीं था तो तुम्हारे पहले के कर्मों का क्यो होगा जो तुमने उसकी ओर मुख करके किये थे? यह आयत इस संदेह के उत्तर में एक महत्वपूर्ण वास्तविकता का उल्लेख कर रही है कि ईश्वर का कोई विशेष स्थान नहीं है बल्कि पूरब-पश्चिम और सारी दिशाएं उसी की हैं तुम जिधर भी मुंह करोगे ईश्वर उसी ओर है। यदि काबे या बैतुल मुक़द्दस को क़िबला बनाया गया है तो इस कारण है कि नमाज़ और सार्वजनिक उपासनाओं की एक दिशा रहे जो मुसलमानों के बीच एकता और समन्वय का कारण बने और सदैव उनका ध्यान आकृष्ट करती रहे। जब तक यहूदियों ने अपने क़िबले के रूप में बैतुल मुक़द्दस का मुसलमानों के विरुद्ध दुरुपयोग नहीं किया था, मुसलमान भी उसी दिशा में नमाज़ पढ़ते थे परन्तु जब यह क़िबला मुसलमानों के अपमान और उनकी कमज़ोरी का कारण बनने लगा तो ईश्वर ने काबे को अपना क़िबला बना दिया जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की यादगार था। सूरए बक़रह की ११६वीं और ११७वीं आयतें इस प्रकार हैं।وَقَالُوا اتَّخَذَ اللَّهُ وَلَدًا سُبْحَانَهُ بَلْ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ كُلٌّ لَهُ قَانِتُونَ (116) بَدِيعُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَإِذَا قَضَى أَمْرًا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ (117)और (यहूदियों, इसाइयों और अनेकेश्वरवादियों ने) कहा कि ईश्वर ने स्वंय के लिए पुत्र ग्रहण किया है वह तो इस बात से पाक है बल्कि जो कुछ आकाशों में है या धरती में है वह सब उसी का है और सभी उसके आदेशों का पालन करते हैं। (2:116) वही आकाशों और धरती को अस्तित्व में लाने वाला है और जब भी वह किसी वस्तु को अस्तित्व में लाने के लिए आदेश देता है तो कहता है हो जा तो वह वस्तु तत्काल हो जाती है। (2:117) आसमानी किताबों के मानने वालों की एक अन्य आस्था जो वे अपने धर्म के सत्य होने के लिए प्रस्तुत करते थे यह थी कि वे अपने-अपने पैग़म्बर को ईश्वर का पुत्र कहते थे।यहूदी कहते थे कि उज़ैर ईश्वर के पुत्र हैं और इसाई कहते थे कि ईसा मसीह ईश्वर के पुत्र हैं। रोचक बात यह है कि मक्के के अनेकेश्वरवादी फ़रिश्तों को ईश्वर की ऐसी बेटियां समझते थे जो उसके कार्यों को पूरा करती हैं। यह आयत आम लोगों के बीच प्रचलित होने वाली ग़लत और तर्कहीन आस्था को रद्द करती है तथा ईश्वर को हर प्रकार की संतान से मुक्त बताते हुए कहती है कि जो ईश्वर आकाशों और धरती का सृष्टिकर्ता भी है और उन पर शासन करने वाला भी है उसे ऐसी कौन सी कमी और आवश्यकता है जिसकी पूर्ति संतान द्वारा हो सकती है।नैतिक रूप से ईश्वर और स्वयं की तुलना करना और ईश्वर को मनुष्यों के समान समझना एक ग़लत कल्पना है जिसके कारण मनुष्य ईश्वर के लिए भी उन आशाओं और सीमितता को आवश्यक समझता है जो स्वयं के लिए आवश्यक समझता है जबकि कोई भी वस्तु उसके समान नहीं है। इन आयतों से हमें यह सीख मिलती है कि अकारण सांप्रदायिकता और गुटबाज़ी मनुष्य को ग़लत बातों की ओर ले जाती है वह केवल स्वयं को सत्य पर समझता है और अन्य लोगों के अधिकारों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता। मस्जिदें कुफ़्र और अनेकेश्वरवाद से मुक़ाबले के मोर्चे हैं अतः शत्रु उनकी विदित व आध्यात्मिक बनावट और ढांचे को तोड़ना चाहते हैं इसलिए हमें यह प्रयास करना चाहिए कि मस्जिदों में इतनी अधिक संख्या में आएं कि शत्रु उनमें घुसने से डरें।माता-पिता, अभिभावकों, प्रशिक्षकों तथा मस्जिद के सेवकों को न केवल यह कि बच्चों और युवाओं को मस्जिदों में आने से रोकना नहीं चाहिए बल्कि सदैव उनको धार्मिक समारोहों में जाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।ईश्वर का कोई विशेष स्थान या दिशा नहीं है। हम जिस ओर भी देखें वहीं ईश्वर है। क़िबले की नीति यह है कि उपासना के बड़े-बड़े समारोह समन्वित और एक दिशा में रहें और वह भी एकेश्वरवाद के सबसे पहले केन्द्र अर्थात काबे की दिशा में।ईश्वर मनुष्य नहीं है जिसे संतान या पत्नी की आवश्यकता हो। वह मनुष्य संतान और पत्नी का सृष्टिकर्ता है जिस प्रकार से वह हर वस्तु का रचयिता और शासक है। जो कुछ हमारे मन में ईश्वर की कल्पना है वह हमारी रचना है न कि हमारा रचयिता।