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    सूरए बक़रह; आयतें 118-123 (कार्यक्रम 43)

    सूरए बक़रह; आयतें 118-123 (कार्यक्रम 43)
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    सूरए बक़रह की ११८वीं और ११९वीं आयतें इस प्रकार हैं।وَقَالَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا اللَّهُ أَوْ تَأْتِينَا آَيَةٌ كَذَلِكَ قَالَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ مِثْلَ قَوْلِهِمْ تَشَابَهَتْ قُلُوبُهُمْ قَدْ بَيَّنَّا الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ (118) إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ بِالْحَقِّ بَشِيرًا وَنَذِيرًا وَلَا تُسْأَلُ عَنْ أَصْحَابِ الْجَحِيمِ (119)जो लोग नहीं जानते (और न ही सत्य को पहचान कर उसे स्वीकार करना चाहते हैं) कहते हैं, ईश्वर स्वयं हमसे सीधे-सीधे क्यों नहीं बात करता या कोई आयत अर्थात निशानी हमारे लिए क्यों नहीं आती? इनसे पहले जो गुट था उसने भी इन्ही के समान बात कही थी, इनके हृदय और सोच एक दूसरे के समान है। निःसन्देह, हमने विश्वास रखने वालों ( और सत्य की खोज में रहने वालों) के लिए अपनी आयतें और निशानियां (पर्याप्त मात्रा में) स्पष्ट कर दी है। (2:118) हे पैग़म्बर! निश्चित रूप से हमने आपको सत्य पर भेजा है ताकि आप शुभ सूचना देने वाले और डराने वाले रहें और आप नरक में जाने वालों की पथभ्रष्टता के उत्तरदायी नहीं हैं। (2:119) कुछ शत्रु व अज्ञानी लोग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर जो आपत्ति करते थे उनमें से एक यह थी कि इस बात की क्या आवश्यकता है कि ईश्वर हमारे और अपने बीच पैग़म्बरों को माध्यम बनाए? वह सीधे हमसे बात क्यों नहीं करता, और हम पर अपनी आयतें क्यों नहीं उतारता कि इस दशा में हम ईश्वर के संदेश को स्वीकार कर लेते। क़ुरआन इन बातों और अनुचित मांगों के मुक़ाबले में पैग़म्बर और मुसलमानों को दिलाया देते हुए कहता है कि यह कोई नई बात नहीं है बल्कि इससे पूर्व भी अन्य लोगों ने ऐसी ही ग़लत आकांक्षाएं बांध रखी थीं, क्योंकि इन लोगों का हृदय भी अन्य लोगों की भांति रोगी व सत्य का शत्रु है। इन लोगों पर जो ईश्वरीय आयतों को प्राप्त करने की क्षमता व योग्यता नहीं रखते, यदि आयतें उतारी भी जातीं तो ये स्वीकार नहीं करते क्योंकि ये बहाना ढूंढना चाहते हैं न कि सत्य को स्वीकार करना वरना मनुष्य को सत्य स्वीकार करना चाहिए चाहे वो दूसरों की ज़बान से क्यों न हो। सत्य का मानदंड यह नहीं है कि मैं कहूं या समझूं। यदि हमने कहा कि चूंकि ईश्वरीय आयतें मुझ पर नहीं उतरी हैं अतः मैं स्वीकार नहीं करूंगा तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि हमारे मामले में जो बात महत्वपूर्ण है वह “मैं” या “अहं” है न कि सत्य। स्पष्ट है कि पैग़म्बरों का कर्तव्य, ईश्वरीय आयतें लोगों तक पहुंचाने और उनकी नसीहत करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है, वे अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए भेजे गए हैं न कि परिणाम के ज़िम्मेदार हैं, इसी कारण वे लोगों को सत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं करते, इस आधार पर जो लोग पथ भ्रष्ट हों और नरक में जाएं वे अपने चयन से नरक में गए हैं और इस संबंध में पैग़म्बरों का कोई दायित्व नहीं है।सूरए बक़रह की १२०वीं आयत इस प्रकार है।وَلَنْ تَرْضَى عَنْكَ الْيَهُودُ وَلَا النَّصَارَى حَتَّى تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْ قُلْ إِنَّ هُدَى اللَّهِ هُوَ الْهُدَى وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُمْ بَعْدَ الَّذِي جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ (120)(हे पैग़म्बर!) यहूदी और ईसाई कदापि तुम से राज़ी नहीं होंगे यहां तक कि आप उनकी मांगों के सामने झुक जाएं और उनकी विचारधारा का अनुसरण करें। कह दीजिए कि मार्गदर्शन केवल ईश्वर का मार्गदर्शन है और जान लो कि यदि तुम अपने पास ज्ञान और वास्तविकता आने के बाद उनकी अनुचित इच्छाओं का पालन करोगे तो ईश्वर की ओर से तुम्हारे लिए कोई सहायक और अभिभावक नहीं आएगा। (2:120) क़िबले के परिवर्तन की घटना के पश्चात, मुसलमानों के प्रति यहूदियों का क्रोध और द्वेष अधिक बढ़ गया, कुछ मुसलमानों की भी इच्छा एवं रुचि यह थी कि क़िबला बैतुल मुक़द्दस ही रहे ताकि वे मदीने के यहूदियों के साथ मित्रतापूर्ण एवं प्रेमपूर्ण ढंग से रहे सकें। उन्हें इस बात का पता नहीं था कि क़िबले के परिवर्तन का मामला, मुसलमानों का विरोध करने के लिए यहूदियों का एक बहाना था और न केवल ये कि वे स्वयं इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार न थे बल्कि चाहते थे कि मुसलमान अपना धर्म छोड़ कर यहूदी बन जाएं। यह आयत एक मूल सिद्धांत बताती है कि तुम मुसलमान अपनी सही नीतियों से जितना पीछे हटते जाओगे उतना ही शत्रु अपनी ग़लत नीतियों को आगे बढ़ाता रहेगा, अतः तुम शत्रुओं से सांठ-गांठ का प्रयास न करो।सूरए बक़रह की १२१वीं आयत इस प्रकार है।الَّذِينَ آَتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِهِ أُولَئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِ وَمَنْ يَكْفُرْ بِهِ فَأُولَئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ (121)जिन लोगों को हमने आसमानी किताब दी और वे उसकी वैसी तिलावत करते हैं जैसा उसका हक़ है, वही लोग क़ुरआन और पैग़म्बर पर ईमान लाते हैं और जिन लोगों ने उसका इन्कार किया तो वही लोग घाटा उठाने वाले हैं। (2:121)चूंकि विरोधियों के मुक़ाबले में क़ुरआन सदैव न्याय से काम लेता है अतः ये आयत कहती है कि यद्यपि आस्मानी किताब रखने वाले अधिकांश लोग इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए परन्तु जो लोग आस्मानी किताबों को सत्य स्वीकार करने की दृष्टि से पढ़ते हैं वो इस्लाम और पैग़म्बर पर ईमान लाते हैं। यह आयत स्पष्ट रूप से बताती है कि केवल क़ुरआन के शब्दों की तिलावत, चाहे सुन्दर आवाज़ ही में क्यों न हो, पर्याप्त नहीं है बल्कि जो बात मनुष्य के मार्गदर्शन व कल्याण का कारण बनती है वो क़ुरआन के अर्थों पर विचार है कि हम इस दशा में उसकी तिलावत का उद्देश्य पूरा हो जाता है।सूरए बक़रह की १२२वीं और १२३वीं आयतें इस प्रकार हैं।يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّتِي أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّي فَضَّلْتُكُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ (122) وَاتَّقُوا يَوْمًا لَا تَجْزِي نَفْسٌ عَنْ نَفْسٍ شَيْئًا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا تَنْفَعُهَا شَفَاعَةٌ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ (123)हे बनी इस्राईल! याद करो मेरी उन नेमतों अर्थात विभूतियों को जो मैंने तुमको दीं और ये कि मैंने तुम्हें संसार वालों पर वरीयता दी। (2:122) और डरो उस दिन से जब कोई भी, किसी को ईश्वर के दण्ड से बचा नहीं पाएगा और उससे कोई विकल्प स्वीकार नहीं किया जाएगा और कोई सिफ़ारिश उसे लाभ नहीं पहुंचा सकेगी, और उनकी सहायता नहीं होगी। (2:123) आपको अवश्य याद होगा कि इसी सूरे की ४७वीं और ४८वीं आयतें भी यही थीं और हमने वहां इन आयतों की तफ़्सीर अर्थात व्याख्या की थी, समय की कमी के कारण हम उसे यहां पर नहीं दुहरा रहे हैं।आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा। सत्य को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वो दूसरों की ओर से क्यों न हो, ये नहीं सोचना चाहिए कि जो कुछ मैं या मेरा गुट बोलता है वही सत्य है और जो कुछ अन्य लोग बोलते हैं वो ग़लत है। हमें सत्य और झूठ को लोगों की पहचान का मानदंड बनाना चाहिए न कि लोग हमारे लिए सत्य और झूठ का मानदंड बन जाएं। ईश्वरीय दूत अर्थात पैग़म्बर लोगों को नसीहत करने, स्वर्ग की शुभ सूचना देने और नकर से डराने के लिए आए हैं न कि लोगों को ईमान लाने पर विवश करने के लिए, इसी कारण पथभ्रष्ट लोग अपने कर्मों के स्वयं ज़िम्मेदार हैं जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से पथभ्रष्टता को स्वीकार किया है। लोगों को धर्म की ओर आमंत्रित करने हेतु सिद्धांतों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए क्योंकि हमें अन्य लोगों के मार्गदर्शन का ध्यान रखना चाहिए न कि उनकी आत्मिक व अनैतिक इच्छाओं का। न्याय से काम लेना अति आवश्यक है यहां तक कि अपने विरोधियों के बारे में भी। इसी कारण जिन आयतों में बनी इस्राईल की आलोचना हुई है उनमें “कसीर” अर्थात अधिकांश और “फ़रीक़” अर्थात गुट जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है ताकि उनके बीच मौजूद भले व पवित्र लोगों के अधिकार का हनन न होने पाए।