islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए बक़रह; आयतें 124-127 (कार्यक्रम 44)

    सूरए बक़रह; आयतें 124-127 (कार्यक्रम 44)

    सूरए बक़रह; आयतें 124-127 (कार्यक्रम 44)
    Rate this post

    पहले सूरए बक़रह की १२४वीं आयत इस प्रकार है।وَإِذِ ابْتَلَى إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ (124)(हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब इब्राहीम की उनके पालनहार ने, विभिन्न घटनाओं से परीक्षा ली और वे सबमें सफल रहे तो ईश्वर ने कहा, मैंने तुम्हें लोगों का इमाम अर्थात नेता व अगुवा बनाया, इब्राहीम ने कहा, प्रभुवर मेरी संतान में से भी (इमाम बना) ईश्वर ने कहा, मेरी प्रतिज्ञा अत्याचारियों को नहीं मिलेगी। अर्थात मेरे द्वारा दिया गया पद अत्याचारियों को नहीं मिलेगा। (2:124) पैग़म्बरों के बीच हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का विशेष स्थान है। पवित्र क़ुरआन के २५ सूरों में उनहत्तर बार उनका नाम आया है। और उनका भी पैग़म्बरे इस्लाम के समान ही, प्रतीक और “आइडियल” के रूप में उल्लेख हुआ है। इस सूरे में भी इस आयत के बाद अट्ठारह आयतों में एकेश्वरवाद के महान प्रतीक काबा के निर्माणकर्ता तथा महान ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम का उल्लेख हुआ है जो विभिन्न ईश्वरीय परीक्षाओं के पश्चात इमामत के पद पर आसीन हुए। परीक्षा सभी लोगों के लिए ईश्वर की स्थाई परंपराओं में से एक है, परन्तु ईश्वर की परीक्षाएं मानव परीक्षाओं के समान नहीं हैं कि जो ज्ञान प्राप्ति के लिए होती हैं क्योंकि ईश्वर हर बात से परिचित है। ये परीक्षाएं मनुष्यों की योग्यताएं प्रकट होने तथा उनकी अच्छाई या बुराई के स्पष्ट होने के लिए होती हैं कि हर व्यक्ति चयन के उस अधिकार द्वारा जो ईश्वर ने उसे प्रदान किया है, कौनसा मार्ग अपनाता है, ताकि उसे उसका दंड या इनाम दिया जा सके। इस आयत में आने वाले शब्द “कलेमात” से तात्पर्य ऐसे भारी कर्तव्य हैं जो ईश्वर ने इब्राहीम के लिए नियुक्त किये थे, और उन्होंने उन सभी को पूरा किया, हम उनमें से कुछ का उल्लेख कर रहे हैं। अपने परिवार और नातेदारों में हज़रत इब्राहीम अकेले एकिश्वरवादी थे परन्तु उन्होंने अनेकिश्वरवाद तथा मूर्तियों को ईश्वर मानने के विरुद्ध संघर्ष किया और सभी मूर्तियों को तोड़ दिया। यद्यपि मूर्ति पूजा करने वालों ने दंड स्वरूप उनको आग में डाल दिया परन्तु वे पूर्णतः धैर्य के साथ और ईश्वर पर विश्वास रखते हुए आग में गए और ईश्वर के आदेश से आग उनके लिए ठंडी व सुरक्षित हो गई। यद्यपि वे लम्बे समय तक निःसंतान रहे और बुढ़ापे में ईश्वर ने उनको पुत्र दिया था परन्तु जब ईश्वर का आदेश आया तो वे अपने पुत्र इस्माईल को ईश्वर के लिए बलि चढ़ाने पर तैयार हो गए। हज़रत इब्राहीम ने इमामत का पद अपनी संतान के लिए भी मांगा परन्तु ईश्वर ने उत्तर में कहा कि ये पद पारिवारिक नहीं है बल्कि जिसमें भी क्षमता और योग्यता होगी उसे ये पद दिया जाएगा। हज़रत इब्राहीम पहले केवल केवल रसूल थे परीक्षाओं में सफल होने के पश्चात उन्हें इमामत का पद भी मिला। इमामत का पद रेसालत के पद से बड़ा है, रसूल ईश्वरीय आदेशों को लोगों तक पहुंचाने तथा उन्हें डराने व शुभ सूचना देने के लिए नियुक्त होता है जबकि इमाम, उन आदेशों को व्यवहारिक बनाने तथा जनता के बीच समाजिक न्याय लागू करने के लिए भेजा जाता है। यह आयत स्पष्ट रूप से बताती है कि इमामत, ईश्वरीय प्रतिज्ञा और धरोहर है जो अत्याचारियों और पापियों को नहीं मिल सकती। इस आधार पर हमारा विश्वास है कि, इमाम को भी पैग़म्बर की भांति मासूम होना चाहिए जिसने भी अतीत में पाप किया हो वो इमामत के योग्य नहीं है।सूरए बक़रह की १२५वीं आयत इस प्रकार है।وَإِذْ جَعَلْنَا الْبَيْتَ مَثَابَةً لِلنَّاسِ وَأَمْنًا وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى وَعَهِدْنَا إِلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ أَنْ طَهِّرَا بَيْتِيَ لِلطَّائِفِينَ وَالْعَاكِفِينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ (125)और (याद कीजिए उस समय को) जब हम ने अपने घर काबा को लोगों के एकत्रित होने का स्थान और शांति का केन्द्र बनाया और (कहा) मक़ामे इब्राहीम से नमाज़ के लिए एक स्थान ग्रहण करो। और हम ने इब्राहीम और इस्माईल से प्रतिज्ञा ली कि तुम दोनों मेरे घर को तवाफ़ करने वालों, एतेकाफ़ करने वालों तथा रुकू व सज्दा करने वालों के लिए पवित्र व स्वच्छ करोगे। (2:125) पिछली आयत में हज़रत इब्राहीम के उच्च स्थान व उनकी इमामत का उल्लेख किया गया था, इस आयत में उनकी महान यादगार अर्थात काबे की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि ये घर लोगों का घर तथा इतिहास के एकेश्वरवादियों के मिलने का स्थान है, शांत, सुरक्षित तथा पवित्र स्थान जहां तवाफ़ किया जाता है और नमाज़ पढ़ी जाती है। जो हाजी मक्के जाते हैं उन्हें काबे के तवाफ़ अर्थात उसके चारों ओर सात फेरे लगाने के पश्चात दो रक्अत नमाज़ पढ़नी होती है। ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम के संघर्षों की सराहना हेतु, उस पत्थर को, जिसपर वे काबे की दीवार उठाते समय खड़े होते थे, नमाज़ की मेहरबान की भांति हाजियों के सामने रखा है ताकि वे हज़रत इब्राहीम के स्थान से आगे खड़े होकर नमाज़ न पढ़ें। इब्राहीम और इस्माईल ने केवल काबे के निर्माणकर्ता बल्कि उसके सेवक भी थे वे ईश्वर के आदेश से मस्जिदुल हराम को उपासना करने वालों तथा नमाज़ पढ़ने वालों के लिए हर प्रकार की गंदगी से स्वच्छ व पवित्र रखते थे। मस्जिद चूंकि ईश्वर का घर है इसीलिए उसके सेवकों को भी पवित्र तथा ईश्वर के प्रेमी बंदों में से होना चाहिए, हर किसी को मस्जिद के मामलों की देख-भाल का अधिकार नहीं है।सूरए बक़रह की १२६वीं आयत इस प्रकार है।وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ اجْعَلْ هَذَا بَلَدًا آَمِنًا وَارْزُقْ أَهْلَهُ مِنَ الثَّمَرَاتِ مَنْ آَمَنَ مِنْهُمْ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ قَالَ وَمَنْ كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُ قَلِيلًا ثُمَّ أَضْطَرُّهُ إِلَى عَذَابِ النَّارِ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ (126)और (याद को उस समय को जब इब्राहीम ने कहा प्रभुवर इस धरती को एक सुरक्षित शहर बना दे, और इसमें रहने वालों को जो ईश्वर और प्रलय पर विश्वास रखते हों, विभिन्न फलों और लाभों से रोज़ी दे। ईश्वर ने उत्तर में कहा, अलबत्ता मैं काफ़िरों को भी थोड़े से लाभ दूंगा परन्तु उन्हें उनके कर्मों के बदले में नरक की आग की ओर ले जाऊंगा और ये कितना बुरा अंजाम है। (2:126) हज़रत इब्राहीम ने जिन्होंने काबे का निर्माण किया था और उसे उपासना के लिए बनाया था, मक्का शहर में रहने वालों के लिए दो प्रार्थानाएं की थीं। पहली सुरक्षा व शांति और दूसरी रोज़ी व विभूति और जीवन में आराम। अलबत्ता उन्होंने केवल ईमान वालों के लिए प्रार्थना की थी परन्तु ईश्वर उनके उत्तर में कहता है कि मैं भौतिक रोज़ी सबको दूंगा चाहे वह मोमिन हो या काफ़िर। मैं काफ़िरों को उनके कुफ़्र के कारण सांसारिक विभूति से वंचित नहीं रखूंगा, भले ही प्रलय में अपने दुषकर्मों के कारण वे नरक में जाएंगे। यह आयत दो बातें बताती है, एक यह कि भौतिक विभूतियों और सांसारिक आराम से लाभान्वित होना, ईमान वालों के लिए बुरी बात नहीं है, इसी कारण हज़रत इब्राहीम ने ईश्वर से इसकी प्रार्थना की। दूसरे यह कि भौतिक आनंदों से काफ़िरों का लाभान्वित होना, उनकी सत्यता की निशानी नहीं है बल्कि ईश्वर के समीप सांसारिक संपत्ति के तुच्छ व महत्वहीन होने की निशानी है।सूरए बक़रह की १२७वीं आयत इस प्रकार है।وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَاهِيمُ الْقَوَاعِدَ مِنَ الْبَيْتِ وَإِسْمَاعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (127)और (याद करो) उस समय को जब इब्राहीम और इस्माईल (ईश्वर के घर) की बुनियादें उठा रहे थे और इस प्रकार प्रार्थना कर रहे थे, प्रभुवर हमारे इस कार्य को स्वीकार कर ले कि निःसन्देह तू सुनने वाला और ज्ञानी है। (2:127) ईश्वर का घर काबा हज़रत आदम के समय से ही था परन्तु हज़रत इब्राहीम ने उसका पुनर्निर्माण किया। इसका तर्क ये है कि उन्होंने मक्के में अपनी पत्नी व बच्चे को ठहराते समय यह कहा था, हे प्रभुवर! मैंने अपने परिवार को इस शुष्क व बंजर धरती में तेरे घर के समीप ठहराया है। अतः ज्ञात होता है कि जब हज़रत इब्राहीम मक्के पहुंचे तो ईश्वर का घर अर्थात काबा मौजूद था। इसके अतिरिक्त ईश्वर सूरै आले इमरान की छियानवेवीं आयत में, लोगों से पहले घर के रूप में काबे का परिचय कराता है। ये आयत बताती है कि यदि कार्य ईश्वर के लिए हो तो राजगीरी और मज़दूरी भी उपासना है। मूलतः ये बात महत्वपूर्ण नहीं है कि कार्य किस प्रकार का है बल्कि ईश्वर द्वारा उसका स्वीकार किया जाना महत्वपूर्ण है। यहां तक कि यदि हम काबे का निर्माण करें और ईश्वर उसे स्वीकार न करे, तो उस निर्माण का कोई महत्व और मूल्य नहीं है।अब देखते हैं कि हमने इन आयतों से क्या सीखा। ईश्वर आध्यात्मिक पदों को, योग्यताओं के आधार पर मनुष्यों को देता है और विभिन्न घटनाएं, वे परीक्षाएं हैं जो ईश्वर लोगों की योग्यता को आंकने के लिए निर्धारित करता है ताकि वे आध्यात्मिक पदों तक पहुंच सके। इमामत या जनता का नेतृत्व, ईश्वरीय पद है न कि सांसारिक पद अतः हर व्यक्ति को इस्लामी समाज पर शासन या उसके नेतृत्व का अधिकार नहीं है बल्कि उसे ईश्वर की ओर से नियुक्त और निर्धारित होना चाहिए। मस्जिदें ईश्वर से संबन्धित स्थान हैं अतः उनका विशेष सम्मान होना चाहिए तथा भले और पवित्र लोगों को उनका मामला देखना चाहिए न कि भ्रष्ट और अयोग्य लोगों को। आदर्श इस्लामी शहर मक्का, उपासना का भी स्थल है और शांति व सुरक्षा का भी। मूल रूप से ईश्वर की उपासना सुरक्षा व शांत हृदय के साथ ही की जा सकती है, क्योंकि धर्म, संसार से अलग नहीं है।