islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए बक़रह; आयतें 128-133 (कार्यक्रम 45)

    सूरए बक़रह; आयतें 128-133 (कार्यक्रम 45)

    सूरए बक़रह; आयतें 128-133 (कार्यक्रम 45)
    Rate this post

    सूरए बक़रह की १२८वीं आयत इस प्रकार है।رَبَّنَا وَاجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِنَا أُمَّةً مُسْلِمَةً لَكَ وَأَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبْ عَلَيْنَا إِنَّكَ أَنْتَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ (128)(हज़रत इब्राहीम और इस्माईल ने कहा) प्रभुवर हम दोनों को अपना आज्ञाकारी बना और हमारे वंश से एक ऐसा समुदाय बना जो तेरा आज्ञाकारी रहे और हमें उपासना की विधि बता और हमारी तौबा या प्रायश्चित स्वीकार कर, निःसन्देह तू तौबा स्वीकार करने वाला (व) कृपाशील है। (2:128) सभी परीक्षाओं में हज़रत इब्राहीम की सफ़लता का रहस्य, ईश्वरीय आदेशों के समक्ष उनका नतमस्तक रहना था, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण उन्होंने ईश्वर के आदेश पर अपने बेटे इस्माईल को ज़िब्ह करने के लिए अपनी तत्परता के रूप में प्रस्तुत किया। इसी कारण हज़रत इब्राहीम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह न केवल उन्हें और उनके पुत्र इस्माईल को बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियों को भी ईश्वरीय आदेशों के समक्ष नतमस्तक रहने वाला बनाए क्योंकि सभी परिपूर्णताएं ईश्वर की दासता और उसकी उपासना में निहित हैं। अलबत्ता ईश्वर की उपासना विशेष रूप से होनी चाहिए ताकि हर प्रकार के फेरबदल और अंधविश्वास से बचा जा सके, इसी कारण हज़रत इब्राहीम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि प्रभुवर तू ही हमें अपनी उपासना का वैसा मार्ग और तरीक़ा सिखा जिस प्रकार कि तू चाहता है कि हम तेरी उपासना करें।सूरए बक़रह की १२९वीं आयत इस प्रकार है।رَبَّنَا وَابْعَثْ فِيهِمْ رَسُولًا مِنْهُمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آَيَاتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَيُزَكِّيهِمْ إِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ (129)प्रभुवर! उनके बीच उन्हीं में से एक पैग़म्बर भेज जो उन्हें तेरी आयतें सुनाए और उन्हें किताब और हिकमत अर्थात तत्वदर्शिता की शिक्षा दे और उन्हें (पापों और अपराधों से) पवित्र करे, निःसन्देह तू प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (2:129) आगामी पीढ़ियों पर ध्यान देना तथा भविष्य के बारे में विचार करना इस बात का कारण बनता था कि हज़रत इब्राहीम अपनी प्रार्थनाओं में ईश्वर से अपने लिए कोई वस्तु मांगने से पूर्व आगामी पीढ़ियों के मार्गदर्शन और कल्याण का विचार करें। चूंकि मनुष्य का कल्याण ईश्वरीय मार्गदर्शन के बिना संभव नहीं है इसी कारण हज़रत इब्राहीम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वो लोगों के लिए एक पैग़म्बर भेजे जो उनकी शिक्षा व प्रशिक्षण का दायित्व संभाले और उनमें ज्ञान व तत्वदर्शिता को विकसित करे।सूरए बक़रह की १३०वीं और १३१वीं आयत इस प्रकार है।وَمَنْ يَرْغَبُ عَنْ مِلَّةِ إِبْرَاهِيمَ إِلَّا مَنْ سَفِهَ نَفْسَهُ وَلَقَدِ اصْطَفَيْنَاهُ فِي الدُّنْيَا وَإِنَّهُ فِي الْآَخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِحِينَ (130) إِذْ قَالَ لَهُ رَبُّهُ أَسْلِمْ قَالَ أَسْلَمْتُ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ (131)कौन है जो इब्राहीम के मार्ग और धर्म से मुंह तोड़ ले सिवाय उसके कि जो स्वयं को मूर्ख व बुद्धिहीन बताए और निःसन्देह हमने इब्राहीम को संसार में चुना और निश्चित ही वो प्रलय में भले लोगों में से होंगे। (2:130) याद करो उस समय को जब इब्राहीम के पालनहार ने उनसे कहा कि मेरे प्रति समर्पित हो जाओ, उन्होंने कहा मैं ब्रहमांड के पालनहार के प्रति समर्पित हूं। (2:131) यह आयत हज़रत इब्राहीम को एक आदर्श तथा ईश्वर द्वारा चुने गए मनुष्य के रूप में परिचित कराती है जिनका मार्ग व धर्म एक ईश्वरीय विचारधारा के रूप में अन्य लोगों के लिए आदर्श बन सकता है। क्या से मूर्खता नहीं है कि मनुष्य इस प्रकार के पवित्र धर्म को छोड़कर अनेकेशवरवाद तथा कुफ़्र के ग़लत मार्गों का चयन करे। ऐसा धर्म जो मानव प्रकृति के अनुकूल है और बुद्धि भी उसे स्वीकार करती है। हज़रत इब्राहीम की विचारधारा इतनी मूल्यवान है कि पैग़म्बरे इस्लाम उस पर गर्व करते हैं कि उनकी विचारधारा इब्राहीम की विचारधारा है। हज़रत इब्राहीम वे व्यक्ति हैं जो तर्क में काफ़िरों को विवश कर देते हैं। ईश्वर के प्रति समर्पण में अपनी पत्नी और बच्चे को मक्के के तपते मरुस्थल में छोड़ देते हैं और कभी अपने युवा पुत्र को बलि चढ़ाने के लिए ले जाते हैं ताकि ये दर्शा सकें कि उनका हृदय अपनी पत्नी और पुत्र से नहीं बल्कि ईश्वर से जुड़ा हुआ है। स्पष्ट है कि ईश्वर इस प्रकार की विशेषताएं रखने वाले मनुष्य को चुनता है और उसे पैग़म्बर तथा इमाम के रूप में अन्य लोगों के लिए आदर्श बनाता है तथा उसके मार्ग से हटने को मूर्खता बताता है।सूरए बक़रह की १३२वीं आयत का अनुवाद सुनते हैं।وَوَصَّى بِهَا إِبْرَاهِيمُ بَنِيهِ وَيَعْقُوبُ يَا بَنِيَّ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَى لَكُمُ الدِّينَ فَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (132)और इब्राहीम व याकू़ब ने अपने बच्चों को उसी एकेश्वरवादी धर्म की वसीयत की और कहा हे पुत्रों ईश्वर ने तुम्हारे लिए एकेश्वरवाद का धर्म चुना है अतः अपनी आयु के अंत तक उस पर चलते रहना और उसके आज्ञापालन करने की दशा में ही मरना। (2:132) कृपालु और शुभचिंतक पिता वह नहीं है जो केवल अपने बच्चों के भौतिक जीवन की आवश्यक्ताओं की पूर्ति का ध्यान रखे बल्कि बच्चों के विचार और आस्था को स्वस्थ रखने और उन्हें पथभ्रष्टता से बचाने पर माता पिता का बसे अधिक व्यय होना चाहिए। ईश्वरीय दूतों ने सदैव अपने बच्चों को ईश्वर की ओर आमंत्रित किया है और मरते समय उनकी वसीयत न केवल सांसारिक माल को बांटने के बारे में होती थी बल्कि वे एकिश्वरवाद तथा उपासना के बारे में भी सिफ़ारिश करते थे।सूरए बक़रह की १३३वीं आयत इस प्रकार है।أَمْ كُنْتُمْ شُهَدَاءَ إِذْ حَضَرَ يَعْقُوبَ الْمَوْتُ إِذْ قَالَ لِبَنِيهِ مَا تَعْبُدُونَ مِنْ بَعْدِي قَالُوا نَعْبُدُ إِلَهَكَ وَإِلَهَ آَبَائِكَ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ إِلَهًا وَاحِدًا وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ (133)क्या तुम (यहूदी) लोग उस समय उपस्थित थे जब याक़ूब को मौत आई? जब उन्होंने अपने बेटों से कहाः मेरे पश्चात तुम किसकी उपासना करोगे? उन्होंने कहा, आपके और आपके पूर्वजों इब्राहीम, इस्माईल व इस्हाक़ के ईश्वर की जो एकमात्र ईश्वर है और हम उसके प्रति समर्पित हैं। (2:133) यहूदियों के एक गुट का विश्वास था कि हज़रत याक़ूब ने मरते समय अपने बेटों को उस धर्म की सिफ़ारिश की थी जिसका पालन यहूदी कर रहे थे। ईश्वर इस दावे को रद्द करते हुए कहता है। क्या तुम याक़ूब की मृत्यु के समय उपस्थित थे जो इस प्रकार का दावा करते हो? बल्कि उन्होंने तो अपने बेटों से एक ईश्वर के प्रति समर्पित रहने को कहा और उनके बेटों ने वादा किया कि वे केवल एक ईश्वर की उपासना करेंगे। जैसा कि हमने पिछली आयत में कहा पिताओं को अपने बच्चों की आस्था और उनके वैचारिक भविष्य के बारे में ज़िम्मेदारी का आभास करना चाहिए और उचित अवसरों तथा संवेदनशील परिस्थितियों में अपनी इस देख रेख को लागू करना चाहिए। एकेश्वरवाद का एक तर्क ये है कि सभी पैग़म्बरों ने एक ही ईश्वर की सूचना दी है और इब्राहीम, इस्माईल तथा इस्हाक़ का ईश्वर एक ही है जबकि यदि कोई दूसरा ईश्वर होता तो वह भी लोगों के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बर भेजता और स्वयं को परिचित करवाता।आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा। केवल ईश्वर के प्रति समर्पित रहना चाहिए कि ईश्वरीय परीक्षाओं में सफलता का रहस्य ईश्वर के प्रति समर्पित रहने और उसके आज्ञापालन की भावना है। प्रार्थनाओं में केवल अपनी भौतिक आवश्यकताओं का विचार नहीं रखना चाहिए बल्कि अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के सौभाग्य के लिए भी प्रार्थना करनी चाहिए। मूर्ख वह नहीं है जिसके पास बुद्धि न हो बल्कि मूर्ख वह है जो बुद्धि रखने के बावजूद ग़लत मार्ग पर चले और अपनी तथा अपने परिवार की पथभ्रष्टता का कारण बने। अच्छा अंत और मृत्यु तक ईमान पर बाक़ी रहना महत्वपूर्ण है। बहुत से ऐसे लोग थे जो मुसलमान थे परन्तु मरते समय मुसलमान नहीं रहे अतः हमें अपने और अपने बच्चों के ईमान की सुरक्षा के विचार में रहना चाहिए और आज अपने मुसलमान होने से ही प्रसन्न नहीं होना चाहिए।