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    सूरए बक़रह; आयतें 139-142 (कार्यक्रम 47)

    सूरए बक़रह; आयतें 139-142 (कार्यक्रम 47)
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    सूरए बक़रह की आयत नंबर 143 इस प्रकार है। وَكَذَلِكَ جَعَلْنَاكُمْ أُمَّةً وَسَطًا لِتَكُونُوا شُهَدَاءَ عَلَى النَّاسِ وَيَكُونَ الرَّسُولُ عَلَيْكُمْ شَهِيدًا وَمَا جَعَلْنَا الْقِبْلَةَ الَّتِي كُنْتَ عَلَيْهَا إِلَّا لِنَعْلَمَ مَنْ يَتَّبِعُ الرَّسُولَ مِمَّنْ يَنْقَلِبُ عَلَى عَقِبَيْهِ وَإِنْ كَانَتْ لَكَبِيرَةً إِلَّا عَلَى الَّذِينَ هَدَى اللَّهُ وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُضِيعَ إِيمَانَكُمْ إِنَّ اللَّهَ بِالنَّاسِ لَرَءُوفٌ رَحِيمٌ (143)और इस प्रकार हमने तुम्हें संतुलित समुदाय बनाया ताकि तुम लोगों पर गवाह रहो और पैग़म्बर तुम पर गवाह रहें। और (हे पैग़म्बर!) जिस क़िबले पर आप थे उसे हमने केवाल इसी लिए बदला कि पैग़म्बर का अनुसरण करने वालों को, उनकी ओर से मुंह मोड़ लेने वालों से अलग पहचानने के लिए और यद्यपि (क़िबले का) यह (परिवर्तन) अत्यंत कठिन था, सिवाए उन लोगों के लिए जिनका मार्गदर्शन ईश्वर ने कर दिया है। जान लो कि ईश्वर कदापि तुम्हारे ईमान को व्यर्थ नहीं जाने देगा क्योंकि वह लोगों के लिए अत्यंत कृपालु व दयावान है। (2:143)पिछले कार्यक्रमों में क़िबले के परिवर्तन के बारे में बनी इस्राईल की बहानेबाज़ियों का उल्लेख करते हुए हम यहां तक पहुंचे थे कि ईशवर ने उनके उत्तर में कहा कि पूरब और पश्चिम तथा सभी दिशाएं ईश्वर की हैं और सच्चा मार्गदर्शन ईश्वर के सीधे रास्ते पर चलने में है न यह कि हम सोचें कि ईश्वर संसार के पूरब या पश्चिम में है और हम केवल उसी की ओर मुख करें।यह आयत इस्लामी समुदाय का परिचय एक संतुलित समुदाय और हर प्रकार के चरमपंथ से दूर रहने वाले समुदाय के रूप में कराती है जो जीवन के हर भाग में चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक और चाहे आर्थिक हो या धार्मिक संतुलन बनाए रखता है और सभी मनुष्यों और मानव समाजों के लिए एक उचित आदर्श है।स्पष्ट सी बात है कि सभी मुसलमान ऐसे नहीं हैं और उनमें से बहुत से, विचार या व्यवहार में असंतुलन का शिकार होते हैं तो फिर इस आयत का तात्पर्य क्या है?तात्पर्य यह है कि इस्लामी विचारधार संतुलन वाली विचारधारा है और केवल उन्हीं लोगों को ईश्वर, जनता पर अपना गवाह बनाता है जो इस्लाम के सभी आदेशों का पालन करते हैं, केवल कुछ का नहीं।जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों ने जो ईश्वरीय आदेशों के सबसे बड़े ज्ञानी, उनका सर्वप्रथम पालन करने वाले और इस समुदाय का सबसे उत्तम उदाहरण थे, कहा है कि वह संतुलित समुदाय जिसे ईश्वर ने लोगों पर अपना गवाह बनाया है, हम हैं।आगे चलकर आयत इस महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करती है कि क़िबले के परिवर्तन का आदेश भी ईश्वर के अन्य आदेशों की भांति एक ईश्वरीय परीक्षा थी जिसने ईश्वर के प्रति समर्पित रहने वालों को, अपनी इच्छाओं का पालन करने वालों से अलग कर दिया था क्योंकि जिन लोगों को ईश्वर का विशेष मार्गदर्शन प्राप्त नहीं हुआ था उनके लिए यह आदेश स्वीकार करना अत्यंत कठिन था और वे इसके समक्ष बहानेबाज़ी कर रहे थे।सूरए बक़रह की आयत नंबर 144 इस प्रकार है। قَدْ نَرَى تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضَاهَا فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَحَيْثُ مَا كُنْتُمْ فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُ وَإِنَّ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ لَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّهِمْ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ (144)(हे पैग़म्बर!) हमने तुम्हें देखा कि तुम वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश की प्रतीक्षा में किस प्रकार आकाश की ओर अपना मुंह घुमा रहे थे, तो अब हम तुम्हें ऐसे क़िबले की ओर मोड़ देंगे जिससे तुम राज़ी रहो, तो तुम अपना मुख मस्जिदुल हराम की ओर करो और (हे मुसलमानो! तुम) जहां भी रहो अपना मुख उसकी ओर मोड़ दो और निसंदेह जिन लोगों को आसमानी किताब दी गई है, भली भांति जानते हैं कि यह सत्य आदेश उनके पालनहार की ओर से है और जो कुछ वे करते हैं उससे ईश्वर निश्चेत नहीं है। (2:144)यहूदियों द्वारा यह ताना दिए जाने के बाद कि मुसलमानों का अपना अलग क़िबला नहीं है, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम क़िबले के परिवर्तन के आदेश की प्रतीक्षा में थे, यहां तक कि ज़ुहर की नमाज़ में ईश्वर ने यह आदेश उनके पास भेजा और उनके बैतुलमुक़द्दस से मक्के की ओर दिशा परिवर्तन के कारण उनके पीछे नमाज़ पढ़ने वाले भी काबे की ओर घूम गए।रोचक बात यह है कि पिछली आसमानी किताबों में कहा गया था कि पैग़म्बरे इस्लाम की एक निशानी यह है कि वे दो क़िबलों की ओर नमाज़ पढ़ेंगे, अतः यह आयत आसमानी किताब रखने वालों को सचेत करती है कि तुम, जो जानते हो कि यह आदेश सत्य है, क्यों उस पर आपत्ति करते हो?सूरए बक़रह की आयत नंबर 145 इस प्रकार है। وَلَئِنْ أَتَيْتَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ بِكُلِّ آَيَةٍ مَا تَبِعُوا قِبْلَتَكَ وَمَا أَنْتَ بِتَابِعٍ قِبْلَتَهُمْ وَمَا بَعْضُهُمْ بِتَابِعٍ قِبْلَةَ بَعْضٍ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُمْ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ إِنَّكَ إِذًا لَمِنَ الظَّالِمِينَ (145)और (हे पैग़म्बर! जान लीजिए कि) आप आसमानी किताब रखने वालों के लिए जो भी तर्क और चमत्कार प्रस्तुत करेंगे, वे आपके क़िबले को स्वीकार नहीं करेंगे और आप भी उनके क़िबले के अनुसरणकर्ता नहीं हैं, जैसा कि उनमें से कुछ दूसरों के क़िबले के अनुयाई नहीं हैं और यदि सत्य से अवगत होने के पश्चात आप उनकी इच्छाओं का पालन करेंगे तो निसंदेह उस स्थिति में आप अत्याचारियों में से होंगे। (2:145)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सान्तवना देती है कि यदि आसमानी किताब रखने वाले आपके क़िबले को स्वीकार नहीं करते तो दुखी मत हों क्योंकि सांप्रदायिक द्वेष उन्हें सत्य स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता अतः आप जो भी तर्क प्रस्तुत करेंगे वे स्वीकार नहीं करेंगे।परंतु उनकी ओर से सत्य को स्वीकार न करना इस बात का कारण ने बने कि आप अपने क़िबले की बारे में ढीले पड़ जाएं बल्कि दृढ़तापूर्वक कहिए कि हम तुम्हारी इन आपत्तियों के समक्ष नहीं झुकेंगे तथा हमारी नीति में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।चूंकि इस्लाम में सबके लिए एक समान क़ानून है, अतः ईश्वर अपने पैग़म्बर को सचेत करता है कि यदि वे भी उनके साथ मिल कर अपने क़िबले की सत्यता से हाथ उठा लेंगे तो अपने अनुयाइयों पर बहुत बड़ा अत्याचार करेंगे।सूरए बक़रह की आयत नंबर 146 और 147 इस प्रकार है।الَّذِينَ آَتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَاءَهُمْ وَإِنَّ فَرِيقًا مِنْهُمْ لَيَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ (146) الْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِينَ (147)जिन्हें हमने आसमानी किताब दी है वे पैग़म्बरे इस्लाम को अपने पुत्रों की भांति पहचानते हैं किंतु उनका एक गुट सत्य को जानने के बावजूद उसे छिपाता है। (2:146) सत्य आपके पालनहार की ओर से है, अतः कभी भी उसमें संदेह करने वालों में से न हो जाइएगा। (2:147)तौरैत व इंजील अर्थात बाइबल में पैग़म्बरे इस्लाम की निशानियों तथा विशेषताओं का उल्लेख था अतः उन्हें मानने वाले पैग़म्बर को पहचानते थे परंतु सांप्रदायिक द्वेष और हठधर्मी के कारण उनका एक गुट इस वास्तविकता को दूसरों से छिपाता था।अलबत्ता उनमें से कुछ लोग पैग़म्बर की विशेषताओं को देख कर उन पर ईमान ले आते थे क्योंकि ये शारीरिक व आत्मिक विशेषताएं इस प्रकार उनकी पुस्तकों में वर्णित हुई थीं कि क़ुरआने मजीद के शब्दों में वे पैग़म्बर को अपने बच्चों की भांति पहचानते थे।यह आयत इस महत्वपूर्ण बात पर बल देती है कि केवल वही सत्य है जो ईश्वर की ओर से आया है और लोगों द्वारा उसे अस्वीकार किया जाना या उसकी ओर से मुंह मोड़ लेना, ईश्वरीय संदेश अर्थात वहि की सत्यता में संदेह का कारण नहीं बनना चाहिए।इन आयतों से मिलने वाले पाठ कुछ इस प्रकार हैं। क़िबला स्वाधीनता की भी निशानी है और समर्पण की भी, हर उस धर्म और विचारधारा से स्वाधीनता जो मुसलमानों पर नियंत्रण करना चाहता है तथा ईश्वर के समक्ष समर्पण कि वह जो आदेश दे उसे बिना आपत्ति किए स्वीकार कर लिया जाए।इस्लाम संतुलन का धर्म है और यदि मुसलमान ईश्वर के बताए हुए सीधे मार्ग पर चलें तो वे समुदायों के लिए आदर्श बन सकते हैं।हठधर्म और सांप्रदायिक द्वेष, विचार, तर्क तथा सत्य स्वीकार करने में बाधा बनता है, अतः धर्म इस साम्राज्यवादी भावना से मुक़ाबला करता है।यदि सत्य स्वीकार करने की भावना न हो तो केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है क्योंकि मनुष्य की इच्छाएं कभी-2 ज्ञान को छिपाती या उसमें फेर-बदल कर देती हैं।