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    सूरए बक़रह; आयतें 148-152 (कार्यक्रम 49)

    सूरए बक़रह; आयतें 148-152 (कार्यक्रम 49)
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    सूरए बक़रह की आयत संख्या १४८ इस प्रकार है। وَلِكُلٍّ وِجْهَةٌ هُوَ مُوَلِّيهَا فَاسْتَبِقُوا الْخَيْرَاتِ أَيْنَ مَا تَكُونُوا يَأْتِ بِكُمُ اللَّهُ جَمِيعًا إِنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (148)और हर किसी के लिए क़िब्ला वह दिशा है जिस ओर वह अपना मुख करता है अतः (हर गुट के क़िब्ले के बारे मे व्यर्थ बहस करने के स्थान पर) भलाई करने में एक दूसरे से आगे बढ़ो और जान लो कि तुम जहां कहीं भी रहोगे, ईश्वर (प्रलय के दिन) तुम्हें हाज़िर करेगा, निःसन्देह ईश्वर हर बात में सक्षम है। (2:148) जैसाकि हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि क़िबले की दिशा महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि इतिहास के विभिन्न कालों में अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग क़िबले थे। महत्वपूर्ण बात ईश्वर के आदेश का पालन है अतः व्यर्थ में उन बातों पर बहस नहीं करना चाहिए जो धर्म के सिद्धांत से नहीं हैं। ईश्वर की दृष्टि में मानदण्ड अच्छा कर्म है कि इस कार्य में मनुष्य को दूसरों से आगे बढ़ना चाहिए और बात के स्थान पर कार्य करना चाहिए। मुक़ाबला उन बातों में से है जिसपर मनुष्य ने प्राचीन काल से ध्यान दिया है कभी वो खेल के मैदान में मुक़ाबले आयोजित करता है तो कभी ज्ञान के मैदान में। परन्तु क़ुरआन मुक़ाबले के लिए किसी विशेष मैदान का उल्लेख किए बिना कहता है कि उस कार्य में जो मनुष्य और समाज के लिए बेहतर हो मुक़ाबला करो और दूसरों से आगे बढ़ने का प्रयास करो। परन्तु इन मुक़ाबलों को ईश्वरीय रंग देने के लिए हर कार्य में प्रलय का भी ध्यान रखो वहां के लिए कार्य करो क्योंकि तुम्हारा वास्तविक बदला तो नहीं है। सूरए बक़रह की आयत १४९-१५० इस प्रकार है।وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَإِنَّهُ لَلْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ (149) وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَحَيْثُ مَا كُنْتُمْ فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَيْكُمْ حُجَّةٌ إِلَّا الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ فَلَا تَخْشَوْهُمْ وَاخْشَوْنِي وَلِأُتِمَّ نِعْمَتِي عَلَيْكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ (150)(हे पैग़म्बर!) जहां से भी (यात्रा के लिए) बाहर निकलो तो (नमाज़ के समय) अपना मुख मस्जिदुल हराम की ओर कर लो कि निःसन्देह, यह तुम्हारे पालनहार की ओर से सत्य आदेश है और जो कुछ तुम लोग करते हो ईश्वर उसकी ओर से निश्चेत नहीं है। (2:149) (हे पैग़म्बर मैं एक बार फिर बल देकर कहता हूं कि) जहां से भी निकलो तो केवल मस्जिदुलहराम की ओर मुख करो और (हे मुसलमानो) तुम भी जहां कहीं भी हो उसी की ओर मुख करो ताकि लोग तुम्हारे विरूद्ध कोई तर्क न ला सकें सिवाए अत्याचारियों के (कि जो किसी भी दशा में हठधर्मी और बहानेबाज़ी को नहीं छोड़ते) तो उनसे मत डरो और केवल मेरा भय रखो ये (क़िबले का परिवर्तन) इस लिए था कि मैं तुम लोगों पर अपनी नेमत अर्थात विभूति को पूरा कर दूं और शायद तुम लोग सुधर जाओ। (2:150) यह दो आयतें एक बार फिर क़िबले के रूप में मक्के की ओर ध्यान देने के विषय को पैग़म्बर व मुसलमानों के समक्ष बलपूर्वक वर्णित करती है कि जिसके विभिन्न कारण और तर्क हो सकते हैं। प्रथम यह कि यहूदियों की ओर से ताने और अपमान के भय से बहुत से मुसलमानों के लिए क़िबले के परिवर्तन का आदेश स्वीकार करना कठिन था, अतः आयत कहती है कि यहूदियों से मत डरो और केवल ईश्वर से डरो और उसके आदेश में ढीलापन न बरतो। दूसरे यह कि आस्मानी किताब रखने वालों ने अपनी किताब में पढ़ रखा था कि पैग़म्बरे इस्लाम दो क़िब्लों की ओर नमाज़ पढ़ेंगे अतः यह बात यदि व्यवहारिक न होती तो वे आपत्ति करते कि पैग़म्बर में वह निशानियां नहीं है जो आस्मानी किताबों में आई हैं। तीसरे यह कि पिछली आयतें शहर में निवास के समय नमाज़ पढ़ने से संबंधित थी और ये आयत यात्रा में पढ़ी जाने वाली नमाज़ से संबंधित है कि जिसे मस्जिदुलहराम की ओर पढ़ना चाहिए और हर स्थिति में इस्लामी समुदाय की स्वाधीनता की जो एक बड़ी ईश्वरीय कृपा है, रक्षा करनी चाहिए।सूरए बक़रह की आयत १५१ इस प्रकार है।كَمَا أَرْسَلْنَا فِيكُمْ رَسُولًا مِنْكُمْ يَتْلُو عَلَيْكُمْ آَيَاتِنَا وَيُزَكِّيكُمْ وَيُعَلِّمُكُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَيُعَلِّمُكُمْ مَا لَمْ تَكُونُوا تَعْلَمُونَ (151)(हे मुसलमानों हम ने तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध करा दिए हैं) जिस प्रकार हमने तुम्हारे बीच तुम्ही में से एक रसूल भेजा ताकि वो तुम्हे हमारी आयतें पढ़कर सुनाए, तुम्हें पवित्र बनाए और तुम्हे किताब और हिकमत की शिक्षा दे और तुम्हें वो सिखाए जो तुम नहीं जान सकते थे। (2:151) पिछली आयत में ईश्वर ने क़िबले के परिवर्तन का एक कारण मुसलमानों पर अपनी नेमत को पूर्ण करना तथा उनका मार्गदर्शन बताया था, यह आयत कहती है कि ईश्वर ने तुम्हें अन्य कई बड़ी नेमतें दी हैं कि जिनमें से एक पैग़म्बर के असित्तव की नेमत है। वे पैग़म्बर जो जनता के शिक्षक भी थे और लोगों को ईश्वरीय आयतों तथा आदेशों की शिक्षा देते थे और एक कृपालु प्रशिक्षक की भांति उनके सुधार व विकास का भी ध्यान रखते थे। क़ुरआन की आयतों की तिलावत, आत्मा की पवित्रता की भूमि समतल करती है जिसके पश्चात ईश्वरीय आदेशों, हिक्मत तथा सही दृष्टिकोण की शिक्षा, मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए ईश्वरीय पैग़म्बरों के महत्वपूर्ण कार्य हैं। ईश्वरीय पैग़म्बर लोगों के केवल शिष्टाचारिक व धार्मिक नेता ही नहीं थे बल्कि वे समाज के वैज्ञानिक व वैचारिक विकास का भी ध्यान रखते थे, परन्तु वे ऐसे ज्ञान का प्रचार करते थे जो ईमान और ईश्वर पर विश्वास का छाया में हो, न उससे अलग और उसके समान।सूरए बक़रह की १५२वीं आयत इस प्रकार है।فَاذْكُرُونِي أَذْكُرْكُمْ وَاشْكُرُوا لِي وَلَا تَكْفُرُونِ (152)तो तुम मेरी याद में रहो कि मैं तुम्हारी याद में रहूं और मेरी नेमतों के प्रति आभार प्रकट करो और मेरा इन्कार न करो। (2:152) अब जब कि ईश्वर ने हमें ऐसी बड़ी नेमतें दी हैं तो बुद्धि और प्रकृति हमें आदेश देती है कि हम अपने उपहार दाता पर भी ध्यान रखें और जो कुछ हमारे पास है उसे सका समझें और उसकी दी हुई नेमतों को उन मार्गों में प्रयोग करे जिनसे वह प्रसन्न होता हो। यदि मनुष्य ने ईश्वर को भुला दिया तो उसने सभी भलाइयों के स्रोत को भुला दिया और स्वाभाविक रूप से ईश्वर भी उसे भुला देगा और उसे उसके हाल पर छोड़ देगा। ईश्वर को याद करने का अर्थ केवल उसे ज़बान से याद करना नहीं है बल्कि वास्तव में ईश्वर को याद करने का अर्थ ये है कि जब मनुष्य कोई पाप कर सकता है तो उसे ईश्वर के लिए छोड़ दे। जैसा कि ईश्वर का आभार प्रकट करने का अर्थ केवल ज़बान से आभार प्रकट करना नहीं है बल्कि वास्तविक आभार यह है कि मनुष्य हर नेमत को उसी के स्थान पर प्रयोग करे और उसी उद्देश्य के लिए उससे काम ले जिसके लिए उसकी रचना की गई है। आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा। विभिन्न धर्मों के बीच निर्थक और विवादास्पद बहस छेड़ने के स्थान पर हमे सकारात्मक बातों और भले कार्यों के प्रचलन का विचार करना चाहिए और इस कार्य में एक दूसरे से आगे बढ़ना चाहिए। मुसलमानों को हर ऐसे कार्य से दूर रहना चाहिए जो शत्रु के हाथ कोई बहाना दे दे, उन्हें इस बात की अनुमति नहीं देनी चाहिए कि शत्रु उनके विरुद्ध कोई तर्क प्रस्तुत कर सके। क़िबले का परिवर्तन मुसलमानों की आंतरिक एकता का भी कारण बना और अन्य लोगों की ज़ोर ज़बरदस्ती के प्रति उनकी स्वाधीनता का रहस्य भी था। पैग़म्बर, मनुष्यों का भला चाहने वाले शिक्षक व प्रशिक्षक हैं जो ज्ञान दे कर व मनुष्य को पवित्र बना कर उसे शारीरिक आराम तथा आत्मिक शांति देने के विचार में रहते थे।