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    सूरए बक़रह; आयतें 153-157 (कार्यक्रम 50)

    सूरए बक़रह; आयतें 153-157 (कार्यक्रम 50)
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    सूरए बक़रह की आयत संख्या १५३ इस प्रकार है।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا اسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ (153)हे वे लोगों जो ईमान लाए (कठिनाइयों और संकट के समय) धैर्य और नमाज़ से सहायता चाहो (कि) निःसन्देह, ईश्वर धैर्य रखने वालों के साथ है। (2:153) अपने जीवन में मनुष्य को अनके कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और यदि उसमें उनका मुक़ाबला करने की शक्ति न हो तो वो पराजय स्वीकार करने पर विवश हो जाता है। परन्तु ईमान वाले लोग संकटों के मुक़ाबले में दो बातों पर भरोसा करते हैं एक धैर्य और एक नमाज़ तथा ईश्वर से संपर्क। वे अपनी आंतरिक क्षमता पर भी भरोसा करते हैं तथा ईश्वर की असीम शक्ति पर भी। ईश्वर ने भी वादा किया है कि वो नमाज़ पढ़ने वाले धैर्यवानों की सहायता करेगा और हर स्थिति में उनके साथ रहेगा कि यही ईश्वर का साथ, कठिनायों के मुक़ाबले में मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा है।सूरए बक़रह की आयत संख्या १५४ इस प्रकार है।وَلَا تَقُولُوا لِمَنْ يُقْتَلُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتٌ بَلْ أَحْيَاءٌ وَلَكِنْ لَا تَشْعُرُونَ (154)और जो लोग ईश्वर के मार्ग में मारे जाते हैं उन्हें मरा हुआ न कहो बल्कि वे जीवित हैं परन्तु तुम नहीं समझ पाते। (2:154) पिछली आयत में धैर्य एवं संयम की बात करने के पश्चात यह आयत जेहाद अर्थात धर्मयुद्ध और ईश्वर के मार्ग में शहादत के विषय की ओर संकेत करती है कि जिसमें अनेक जानी व माली कठिनाइयां हैं तथा इसके लिए कड़े संयम और संघर्ष की आवश्यकता है। कुछ अज्ञानी या शत्रु लोग न केवल यह कि स्वयं जेहाद और प्रतिरोध के मैदान में नहीं जाते बल्कि लोगों के मनोबल को समाप्त करने तथा इस पवित्र संघर्ष को निर्थक बताने का प्रयास करते हैं। वे हमदर्दी करने वालों जैसा चेहरा बनाकर ईश्वर के मार्ग में शहीद होने वालों के प्रति खेद प्रकट करते हैं और यह कहते हैं कि बुरा हुआ कि अमुक व्यक्ति मारा गया और व्यर्थ में अपनी जान गंवा बैठा। बद्र नामक युद्ध में कि जिसमें १४ मुसलमान शहीद हुए, कुछ लोगों ने उन्हें मरा हुआ कह कर संबोधित किया, उस समय यह आयत उतरी और उन्हें इस ग़लत विचार से रोका क्योंकि शहीद जीवित हैं परन्तु उनका जीवन इस प्रकार का है कि हम उसे समझ नहीं पाते।सूरए बक़रह की १५५वीं आयत इस प्रकार है।وَلَنَبْلُوَنَّكُمْ بِشَيْءٍ مِنَ الْخَوْفِ وَالْجُوعِ وَنَقْصٍ مِنَ الْأَمْوَالِ وَالْأَنْفُسِ وَالثَّمَرَاتِ وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ (155)(जान लो कि) हम अवश्य ही भय, भूख, जानी व माली क्षति और फ़सलों की कमी इत्यादि से तुम्हारी परीक्षा लेते हैं और (हे पैग़म्बर!) आप धैर्य व संयम रखने वालों को शुभ सूचना दे दीजिए (कि धैर्य रखकर वे ईश्वरीय परीक्षा में उत्तीर्ण होंगे और बड़ा बदला पाएंगे।) (2:155) परीक्षा लेना ईश्वर की एक अटल परंपरा है जो सभी मनुष्यों पर लागू होती है परन्तु सभी लोगों की परीक्षाएं एकसमान नहीं होती बल्कि हर व्यक्ति की परीक्षा, ईश्वर द्वारा उसे दी गई संभावनाओं और योग्यताओं के आधार पर ली जाती है। कुछ लोगों के लिए आर्थिक कठिनाई, परीक्षा होती है कि उनका व्यवहार किस प्रकार का होता है और कुछ लोगों के लिए जान का ख़तरा तथा युद्ध के मैदान में उतरना, परीक्षा का विषय होता है कि वे इसके लिए कितने तैयार हैं। अलबत्ता ईश्वरीय परीक्षाएं इसलिए नहीं हैं कि ईश्वर हमें पहचानना चाहता है क्योंकि वह तो हमको हमसे बेहतर जानता है बल्कि यह परीक्षाएं इसलिए हैं कि हम अपने आप को पहचानें और अपनी आंतरिक योग्यताओं को सामने लाएं तथा ईश्वरीय उपहार या दंड पाने की भूमि समतल हो जाए। बहुत सी अच्छी मानवीय योग्यताएं जैसे धैर्य, संयम, ईश्वर से भय तथा बलिदान केवल समस्याओं और कठिनाइयों में घिरने के पश्चात सामने आती हैं कि जो मनुष्य की आत्मा के प्रशिक्षण और विकास का कारण बनती है।सूरए बक़रह की आयत संख्या १५६ इस प्रकार है।الَّذِينَ إِذَا أَصَابَتْهُمْ مُصِيبَةٌ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ (156)(धैर्यवान) वे लोग हैं कि जिनपर जब भी कोई मुसीबत पड़ती है तो वे कहते हैं कि निःसन्देह, हम ईश्वर के लिए हैं और उसी की ओर लौटने वाले हैं। (2:156) पिछली आयत में धैर्यवानों को सफलता की शुभसूचना देने के पश्चात ईश्वर इस आयत में धैर्यवानों का परिचय कराते हुए कहता है कि धैर्यवान वे हैं जो मुसीबतों और कठिनाइयों में फंसने पर निराश होने और हिम्मत हारने के स्थान पर ईश्वर से आशा रखते हैं। जो अपने आरंभ और अंत को ईश्वर से संबन्धित समझता है, वह भी ऐसे ईश्वर से जो दया व कृपा तथा तर्क के आधार पर संसार की व्यवस्था चलाता है, उसकी दृष्टि में सभी वस्तुएं सुन्दर हैं और संसार के प्रति वो प्रसन्न रहता और अच्छी दृष्टि रखता है। मूल रूप से संसार रहने का स्थान नहीं है, यह सोने और ऐश्वर्य व विलास की जगह नहीं है कि मनुष्य यहां पर आराम के विचार में रहे बल्कि यह परीक्षा का स्थान है और कठिनाइयां परीक्षा का साधन हैं। परीक्षा, ईश्वरीय क्रोध की निशानी नहीं है बल्कि हमारे प्रयासों का साधन है। कठिनाइयों के मुक़ाबले लोगों के कई गुट हैं। एक गुट कम धैर्य वाला है जो रोता पीटता है। दूसरा गुट कठिनाइयों का धैर्य से मुक़ाबला करता है और ईश्वर के प्रति अपशब्द बोलने और शिकायत करने के स्थान पर वह ईश्वर की ही शरण लेता है। एक अन्य गुट धैर्य करने के साथ ही साथ ईश्वर के प्रति आभार भी प्रकट करता है क्योंकि वह मुसीबतों को अपनी आत्मा के विकास और सुदृढ़ता का कारण मानता है। जिस प्रकार एक परिवार में बच्चा, इन्जेक्शन लगने पर रोता पीटता है जबकि बड़े उसे बर्दाश्त करते हैं परन्तु पिता इन्जेक्शन ख़रीदने के लिए पैसा भी देता है। सूरए बक़रह की आयत संख्या १५७ की तिलावत सुनते हैंأُولَئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَاتٌ مِنْ رَبِّهِمْ وَرَحْمَةٌ وَأُولَئِكَ هُمُ الْمُهْتَدُونَ (157)इन धैर्यवानों पर उनके पालनहार की ओर से विभूति और दया है और यही लोग मार्गदर्शन प्राप्त हैं। (2:157) यह आयत घैर्यवानों का बड़ा बदला, ईश्वर की ओर से विभूतियों और दया को बताती है जो उन्हें हर प्रकार की पथभ्रष्टता से बचाती है और उन्हें वास्तविक मार्गदर्शन दिलाती है। यद्यपि संसार की सभी वस्तुओं पर ईश्वर की कृपा है परन्तु यह दया और विभूति एक ख़ास पद है और धैर्यवानों के लिए विशेष है। ऐसी दया जो उन्हें निश्चित मार्गदर्शन दिलाएगी।आइए अब देखें कि इन आयतों में हमने क्या सीखा। नमाज़ बोझ नहीं बल्कि मुसीबतों पर धैर्य का साधन है अतः ईश्वर धैर्य का आदेश देते हुए नमाज़ की बात कही है जो सीमित मनुष्य को असीमित ईश्वरीय शक्ति से जोड़ने का कारण है। यद्यपि सभी मनुष्य मरने के पश्चात “बरज़ख़” में जीवन व्यतीत करेंगे जो वास्तव में आत्मा का जीवन है परन्तु शहीदों के लिए अन्य सभी मरने वालों से अलग एक विशेष जीवन है। मृत्यु एवं प्रलय के बीच की अवधि को बरज़ख़ कहा जाता है। ईश्वरीय परीक्षाओं में केवल धैर्यवान ही सफल होते हैं और दूसरों के पास भी परीक्षा से भागने का कोई मार्ग नहीं होता क्योंकि ईश्वरीय परीक्षा व्यापक होती है। धैर्य का स्रोत ईश्वर व प्रलय पर भरोसा एवं विश्वास है कि जो कठिनाइयां झेलना मनुष्य के लिए सरल बना देता है। धैर्य एवं दृढ़ता इसी संसार में मनुष्य के कल्याण का कारण है जबकि प्रलय में इसके आध्यात्मिक प्रतिफल भी बहुत अधिक हैं।