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    सूरए बक़रह; आयतें 177-179 (कार्यक्रम 55)

    सूरए बक़रह; आयतें 177-179 (कार्यक्रम 55)
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    सूरए बक़रह की १७७वीं आयत इस प्रकार है। لَيْسَ الْبِرَّ أَنْ تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ قِبَلَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ وَلَكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آَمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالْكِتَابِ وَالنَّبِيِّينَ وَآَتَى الْمَالَ عَلَى حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَالسَّائِلِينَ وَفِي الرِّقَابِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآَتَى الزَّكَاةَ وَالْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَاهَدُوا وَالصَّابِرِينَ فِي الْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ وَحِينَ الْبَأْسِ أُولَئِكَ الَّذِينَ صَدَقُوا وَأُولَئِكَ هُمُ الْمُتَّقُونَ (177)भलाई (केवल) यह नहीं है कि तुम नमाज़ पढ़ते समय अपने मुख को पूरब और पश्चिम की ओर घुमाओ (और क़िबले तथा उसके परिवर्तन के विषय के बारे में सोचो) बल्कि वास्तविक भलाई करने वाला वह है जो ईश्वर, प्रलय, फ़रिश्तों, आसमानी किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और अपने माल को आवश्यकता रखने के बावजूद नातेदारों, अनाथों, दरिद्रों, मार्ग में रह जाने वालों तथा मांगने वालों को और ग़ुलामों को स्वतंत्र कराने के मार्ग में ख़र्च करता है, नमाज़ पढ़ता है, ज़कात देता है और जब कोई वचन देता है तो उसे पूरा करता है और दरिद्रता, वंचितता, पीड़ा व रोग, दुर्घटनाओं और युद्ध में दृढ़तापूर्वक संयम से काम लेता है। हां, यही लोग हैं जिन्होंने ईमान का सच्चा दावा किया है तथा उनका कथन, व्यवहार और आस्था एक ही है और यही लोग ईश्वर से डरने वाले हैं। (2:177) इस आयत में इस्लाम में आस्था, व्यवहार और शिष्टाचार की दृष्टि से भलाई के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि जो कोई इस आयत पर अमल करेगा उसका ईमान पूरा है। जैसा कि हमने क़िबले के परिवर्तन से संबन्धित आयतों में कहा था कि यहूदियों ने इस विषय पर बहुत जंजाल खड़ा किया और इसे बहुत महत्वपूर्ण मामला दर्शाया, यह आयत उन्हें एक अन्य उत्तर देते हुए कहती है। यह मत सोचो कि ईश्वर का धर्म केवल क़िबले के विषय तक ही सीमित है और अपने सारे विचार उसी पर केन्द्रित रखो, बल्कि ईश्वरीय धर्म तीन मूल भागों से मिलकर बने हैं और सही अर्थों में भला व्यक्ति वही है जो धर्म के सभी भागों पर पूर्ण रूप से ध्यान रखे। धर्म का पहल भाग आस्था और ईमान से संबन्धित हैं कि मनुष्य, ईश्वर, फ़रिश्तों आस्मानी किताबों और पैग़म्बरों पर हृदय से आस्था रखे। स्पष्ट है कि ऐसी उपासना को व्यवहार में उपासना संबंधी कर्तव्यों जैसे नमाज़ और ज़कात तथा वंचितों और दरिद्रों की सहयता के रूप में प्रकट होना चाहिए जो धर्म का दूसरा भाग है। परन्तु केवल ईश्वर और मनुष्यों से संपर्क पर्याप्त नहीं है बल्कि इस संपर्क को अच्छे व सुदृढ़ ढंग से सुरक्षित रखने के लिए संयम, विनम्रता और वफ़ादारी जैसे शिष्टाचारिक सिद्धांतों और सभी ईश्वरीय व मानवीय वचनों के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहिए। यह आयत उस व्यक्ति को वास्तविक मोमिन बताती है जो अनिवार्य दान अर्थात ज़कात के अतिरिक्त एसे दान भी करते हैं जो अनिवार्य नहीं होते। कुछ लोगों के विपरीत जो यदि किसी दरिद्र की सहायता करते हैं तो अपने अनिवार्य अधिकारों को पूरा नहीं करते और कुछ अन्य, ज़कात देने के पश्चात दरिद्रों और ग़रीबों की ओर से आंखें मूंद लेते हैं।सूरए बक़रह की १७८वीं आयत इस प्रकार है।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِصَاصُ فِي الْقَتْلَى الْحُرُّ بِالْحُرِّ وَالْعَبْدُ بِالْعَبْدِ وَالْأُنْثَى بِالْأُنْثَى فَمَنْ عُفِيَ لَهُ مِنْ أَخِيهِ شَيْءٌ فَاتِّبَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ وَأَدَاءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَانٍ ذَلِكَ تَخْفِيفٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَرَحْمَةٌ فَمَنِ اعْتَدَى بَعْدَ ذَلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ (178)हे वे लोगो जो ईमान लाए हो! तुम्हारे लिए हत्या किये गए लोगों के बारे में क़ेसार का क़ानून निर्धारित किया गया है, कि स्वतंत्र व्यक्ति के बदले स्वतंत्र व्यक्ति, ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम और महिला के बदले महिला को क़ेसास किया जाए परन्तु यदि क़ेसास के अपराधी को यदि उसके धार्मिक भाई की ओर से क्षमा कर दिया जाए तो वो मृत्युदंड के स्थान पर पैसा देने में अच्छी पद्धति अपनाए और उसे मृतक के उत्तराधिकारियों को दे, यह तुम्हारे पालनहार की ओर से ढील तथा दया की निशानी है तो यदि कोई इससे आगे बढ़ना चाहे तो उसके लिए कड़ा दंड होगा। (2:178) इस्लाम एक व्यापक धर्म है जिसने मनुष्यों के लिए उनके व्यक्तिगत पहलू से ही नहीं बल्कि सामाजिक मामलों के लिए भी विशेष आदेश और क़ानून बनाए हैं ताकि मानव समाज में आवश्यक सुरक्षा व व्यवस्था स्थापति रहे। हर समाज में कभी-कभी सामने आने वाली एक समस्या, हत्या है। इस्लाम ने हत्या तथा उसके दुहराए जाने को रोकने के लिए कि जो लोगों की असुरक्षा का कारण है, क़ेसास अर्थात जीवन के बदले जीवन का क़ानून निर्धारित किया है। इस क़ानून के अंतर्गत यदि हत्या जान बूझकर की गई हो तो हत्यारे को मृत्युदंड दिया जाता है ताकि मरने वाले निर्दोष व्यक्ति का ख़ून व्यर्थ न जाए पाए और अन्य लोग भी दूसरों की हत्या की हिम्मत न कर सकें। अलबत्ता क़ेसास में न्याय होना चाहिए अतः हत्यारे और मृतक के बीच समानता के आधार पर मर्द के मुक़ाबले मर्द और महिला के मुक़ाबले महिला को के़सास दिया जाता है और यदि हत्यारा और मृतक एक लिंग के ने हों तो उनके अंतर का पैसा देना चाहिए।इस क़ानून का महत्व तब स्पष्ट होता है जब हमें यह पता चलता है कि इस्लाम से पूर्व के अरब समाज में यदि एक क़बीले के किसी एक व्यक्ति की हत्या हो जाती थी तो उसके क़बीले वाले हत्यारे के पूरे क़बीले की हत्या करने और लंबे समय तक युद्ध करने के लिए तैयार रहते थे। परन्तु इस्लाम ने जिसका आधार न्याय व संतुलन पर रखा गया है, एक ओर एक व्यक्ति के बदले एक से अधिक व्यक्ति की हत्या की अनुमति नहीं दी है और दूसरी ओर मृतक के उत्तराधिकारियों को भी यह अधिकार दिया है कि वे यदि चाहें तो हत्या के बदले पैसा लेकर या उसके बिना ही हत्यारे को क्षमा कर दें। अलबत्ता यदि मृतक के उत्तराधिकारियों ने पैसा लेने का निर्णय किया तो उन्हें अन्याय नहीं करना चाहिए और रिणि को तंग नहीं करना चाहिए जैसा कि हत्यारे को भी पैसा देने में आनाकानी और ढिलाई नहीं करनी चाहिए। बल्कि दोनों ही को अच्छा मार्ग अपनाना चाहिए और जानना चाहिए कि ईश्वरीय क़ानूनों का किसी भी प्रकार का उल्लंघन, प्रलय में कड़े दंड का कारण बनेगा। सूरए बक़रह की १७९वीं आयत में मानव समाज में इस क़ानून की महत्वपूर्ण भूमिका की ओर संकेत किया गया है।وَلَكُمْ فِي الْقِصَاصِ حَيَاةٌ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ (179)हे बुद्धिमानो! क़ेसास के क़ानून में तुम्हारा जीवन छिपा हुआ है, शायद तुम ईश्वर का भय अपनाओ। (2:179) कुछ लोग जो स्वयं को बुद्धिमान और विचारक समझते हैं वे क़ेसास के क़ानून के परिणामों पर ध्यान दिये बिना ही ये आपत्ति करते हैं कि क्या हत्यारे को मारने से मृतक जीवित हो जाएगा? इसका परिणाम इसके अतिरिक्त और क्या है कि क़ेसास द्वारा आप स्वयं एक अन्य हत्या करते हैं। क़ुरआन इस आपत्ति के उत्तर में जो कि आजकल मानवाधिकार की आड़ में की जाती है, एक महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करते हुए कहता है कि मानव समाज का जीवन न्याय व सुरक्षा के बिना संभव नहीं है और इन दोनों बातों की पूर्ति के लिए हत्यारे को मृत्युदंड देना आवश्यक है, जैसाकि एक रोगी के स्वास्थ्य के लिए उसके ख़राब अंग को आपरेशन द्वारा काट कर निकालना आवश्यक है। मूल रूप से क़ेसास का क़ानून व्यक्तिगत प्रतिशोध से पहले समाज की सुरक्षा का रक्षक है। आज किन देशों में अपराध की दर अधिक है? उन देशों में जहां पर क़ेसास का क़ानून लागू हैं या उन देशों में जो स्वयं को मानवाधिकारों का रक्षक समझते हैं और यहां तक कि क़ेसास को मानव हत्या कहते हैं?इन आयतों से मिलने वाले पाठः ईश्वर पर आस्था, वंचितों और दरिद्रों की सहायता तथा जनता के अधिकारों के सम्मान के बिना लाभदायक नहीं है।ईश्वर के मार्ग मे अपने धन से आंखे मोड़ लेना, ईमान की सच्चाई की एक निशानी है।ईमान के लिए आवश्यक है कि मनुष्य दरिद्रता, कठिनाई और युद्ध की मुसीबतों के समय संयम और विनम्रता से काम ले वरना केवल सुरक्षा व ऐश्वर्य के समय ईमान रखना ईमान की सुदृढ़ता की निशानी नहीं है। कुछ क़ानूनों की भांति इस्लाम, क़ेसास को एकमात्र मार्ग समझता है और न कुछ अन्य की भांति क्षमा को सबसे अच्छा मार्ग मानता है बल्कि हत्यारे की सज़ा मृत्युदंड मानता है परन्तु क्षमा या हत्या के बदले पैसे को भी स्वीकार करता है।