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    सूरए बक़रह; आयतें 180-182 (कार्यक्रम 56)

    सूरए बक़रह; आयतें 180-182 (कार्यक्रम 56)
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    सूरए बक़रह की आयत नंबर 180 इस प्रकार है।كُتِبَ عَلَيْكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ إِنْ تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ (180)जब भी तुममें से कोई मृत्यु के समीप हो जाए तो आवश्यक है कि वह अपने माल में से माता-पिता और अन्य परिजनों के लिए अच्छी वसीयत करे यह ईश्वर से डरने वालों पर उनका अधिकार है। (2:180)हम सभी लोग एक दिन इस संसार में आए हैं और एक दिन इस संसार से चले जाएंगे। जिस दिन हम इस संसार में आए थे ख़ाली हाथ थे और जिस दिन इस संसार से जाएंगे, उस दिन भी ख़ाली हाथ ही होंगे। उस दिन हमें अपनी सारी संपत्ति, धन, दौलत, मकान, गाड़ी और कारख़ाने और हर वस्तु को छोड़ कर जाना होगा।इस्लाम के क़ानून के अनुसार जो व्यक्ति भी संसार से जाता है, उसकी संपत्ति का दो तिहाई भाग उसकी संतान व दंपति या अन्य परिजनों के बीच बांटा जाता है और इसके लिए उस व्यक्ति को वसीयत की आवश्यकता नहीं होती।परंतु हर व्यक्ति अपनी संपत्ति के एक तिहाई भाग के लिए वसीयत कर सकता है। उसे किस मार्ग में ख़र्च किया जाए? यह बता सकता है। यह आयत इस बारे में कहती है कि ईश्वर से भय रखने वालों कि जिनकी संपत्ति हलाल एवं विभूतिपूर्ण है, मरते समय अपने माता-पिता तथा अन्य परिजनों का भी ध्यान रखना चाहिए और उनके लिए भी वसीयत करना चाहिए क्योंकि दंपति और संतान को तो स्वाभाविक रूप से उसकी संपत्ति का दो तिहाई भाग विरासत में मिलता ही है।अलबत्ता वसीयत को बौद्धिक व उचित होना चाहिए। ऐसा न हो कि कोई अनुचित प्रेम भावना या द्वेष एवं प्रतिशोध के कारण किसी को कोई वस्तु दे दे या किसी को वंचित कर दे।इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वसीयत, अभाव और वंचितता को दूर करने हेतु एक प्रकार की दूरदर्शिता है जो इस बात का कारण बनती है कि मृत्यु के पश्चात भी मनुष्य को पुण्य प्राप्त होता रहे।सूरए बक़रह की आयत नंबर 181 इस प्रकार है।فَمَنْ بَدَّلَهُ بَعْدَمَا سَمِعَهُ فَإِنَّمَا إِثْمُهُ عَلَى الَّذِينَ يُبَدِّلُونَهُ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (181)तो जो कोई सुनने के बाद वसीयत में परिवर्तन कर दे तो जान लो कि इसका पाप केवल उन्हीं लोगों पर है जिन्होंने इसको परिवर्तित किया। निश्चित रूप से ईश्वर सुनने वाला और जानकार है। (2:181)कभी कभी संतान या परिजन वसीयत सुनने के बावजूद उसे किसी कारण बदल देते हैं। उदाहरण स्वरूप किसी ने वसीयत की कि अमुक दरिद्र व्यक्ति को इतना पैसा दे दिया जाए किंतु उसकी संतान उक्त व्यक्ति के स्थान पर किसी दूसरे दरिद्र व्यक्ति को पैसे दे देती है।क़ुरआने मजीद कहता है कि ऐसे में वसीयत करने वाले को उसके भले कार्य पर पुण्य अवश्य मिलेगा। पैसा लेने वाले की भी कोई ग़लती नहीं है क्योंकि उसे तो किसी बात का पता ही नहीं था। केवल वसीयत को जानने के बाद भी बदलने वाला यहां पापी होगा क्योंकि स्वामित्व मरने के पश्चात भी आदरणीय है और किसी को भी मृतक के माल से अनुचित ख़र्च का अधिकार नहीं है चाहे वह उसकी संतान ही क्यों न हो।सूरए बक़रह की आयत नंबर 182 इस प्रकार है।فَمَنْ خَافَ مِنْ مُوصٍ جَنَفًا أَوْ إِثْمًا فَأَصْلَحَ بَيْنَهُمْ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (182) परंतु यदि वसीयत करने वाला किसी वारिस से अधिक प्रेम के कारण पथभ्रष्ठ हो जाए या पाप की वसीयत करे तो जो कोई भी उसकी वसीयत के लक्षणों से डरे और उसमें परिवर्तन द्वारा उनके बीच भलाई उत्पन्न करे तो उस पर कोई पाप नहीं है। निसंदेह ईश्वर क्षमा करने वाला और दयावान है। (2:182)पिछली आयत में हमने कहा था कि यदि कोई जान बूझ कर वसीयत में परिवर्तन या फेर बदल करे तो उसने पाप किया है किंतु कभी कभी वसीयत करने वाला ग़लत और तर्कहीन वसीयत करता है और परिवार में फूट और मतभेद का कारण बन जाता है।या कभी कभी अपने माल के एक तिहाई भाग से अधिक की वसीयत करता है जिसका उसे अधिकार नहीं है या कभी ऐसी बात की वसीयत करता है जिसका करना पाप हो।इन सभी स्थानों पर वसीयत को भलाई के लिए परिवर्ति किया जा सकता है और वारिसों के बीच उत्पन्न होने वाले संभावित मतभेद को समाप्त किया जा सकता है।इन आयतों से मिलने वाले पाठःमनुष्य पर उसके माता-पिता का बहुत बड़ा अधिकार है। अतः उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जताने के लिए मनुष्य को विरासत के अतिरिक्त भी उनके लिए वसीयत करनी चाहिए।वसीयत के अनुसार काम करना आवश्यक है और उसमें हर प्रकार का फेर बदल एसा विश्वासघात है जिसे ईश्वर जानता है और उसका बदला देने में सक्षम है।इस्लाम में कोई भी बंद गली नहीं है और जब कभी अधिक महत्वपूर्ण सामने हो तो उसके अनुसार काम करना चाहिए। वसीयत का सम्मान आवश्यक व महत्वपूर्ण है किंतु मतभेद को रोकना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार से कि झूठ बोलना हराम है किंतु कभी अत्याचारी से अपनी जान की रक्षा के लिए झूठ बोलना अनिवार्य हो जाता है।