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    सूरए बक़रह; आयतें 187-189 (कार्यक्रम 58)

    सूरए बक़रह; आयतें 187-189 (कार्यक्रम 58)
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    सूरए बक़रह की आयत नंबर १८७ इस प्रकार है।أُحِلَّ لَكُمْ لَيْلَةَ الصِّيَامِ الرَّفَثُ إِلَى نِسَائِكُمْ هُنَّ لِبَاسٌ لَكُمْ وَأَنْتُمْ لِبَاسٌ لَهُنَّ عَلِمَ اللَّهُ أَنَّكُمْ كُنْتُمْ تَخْتَانُونَ أَنْفُسَكُمْ فَتَابَ عَلَيْكُمْ وَعَفَا عَنْكُمْ فَالْآَنَ بَاشِرُوهُنَّ وَابْتَغُوا مَا كَتَبَ اللَّهُ لَكُمْ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ مِنَ الْفَجْرِ ثُمَّ أَتِمُّوا الصِّيَامَ إِلَى اللَّيْلِ وَلَا تُبَاشِرُوهُنَّ وَأَنْتُمْ عَاكِفُونَ فِي الْمَسَاجِدِ تِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ فَلَا تَقْرَبُوهَا كَذَلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ آَيَاتِهِ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ (187)रमज़ान के महीनों की रातों में अपनी पत्नियों के पास जाना तुम्हारे लिए हलाल है, वे तुम्हारे लिए वस्त्र (समान हैं) और तुम उनके लिए वस्त्र (समान) हो। ईश्वर ने जान लिया कि तुम स्वयं से विश्वासघात करते थे और ये हराम काम किया करते थे, तो उसने तुम्हारा प्रायश्चित स्वीकार कर लिया और तुम्हें क्षमा कर दिया, तो अब तुम अपनी पत्नियों के पास जा सकते हो और जो कुछ ईश्वर ने तुम्हारे लिए निर्धारित किया है उसे चाह सकते हो और खा पी सकते हो यहां तक कि भोर का समय आ जाए फिर तुम रात तक रोज़ा रखो और (इस बीच) अपनी पत्नियों के समीप न जाओ, इस अवस्था में कि तुम एतेकाफ़ में हो, ये ईश्वर की सीमाएं हैं अतः तुम इनके समीप न जाना। इस प्रकार ईश्वर अपनी निशानियां लोगों को दिखाता है, शायद वे पापों से दूर हो जाएं। (2:187) इस्लाम के आरंभ में रोज़े के आदेश कड़े थे। रमज़ान के दिनों की ही भांति रातों में भी अपनी पत्नियों के समीप जाना वर्जित था, खाना पीना भी केवल रात में सोने से पहले वैघ था, परन्तु कुछ मुसलमान इस ईश्वरीय परीक्षा में विफल हो गए और रमज़ान की रातों में इन सीमाओं का पालन न कर सके। पवित्र क़ुरआन के शब्दों में उन्होंने अपने ही साथ विश्वासघात किया। ईश्वर ने यह आयत भेजकर रमज़ान की रातों में खाना पीना तथा पत्नी के समीप जाना हलाल कर दिया ताकि मुसलमान आदेश का उल्लंघन न करें और उसने उनके पिछले पापों को भी क्षमा कर दिया। अलबत्ता पत्नी के समीप जाना, रमज़ान की रातों में इस शर्त के साथ हलाल है कि व्यक्ति मस्जिद में एतेकाफ़ न कर रहा हो। एतेकाफ़ का अर्थ होता है मस्जिद में कम से कम निरंतर तीन दिन और तीन रातें उपासना के उद्देश्य से रहना। यह आयत इसी प्रकार दांपत्य जीवन के बारे में अति सुन्दर उपमा प्रस्तुत करते हुए कहती है कि पति और पत्नी एक दूसरे के लिए वस्त्र समान हैं, जैसा कि वस्त्र एक ओर तो मनुष्य के अवगुणों को छिपाता है और दूसरी ओर उसके सौन्दर्य का भी साधन है, उसी प्रकार पति और पत्नी एक दूसरे को पथभ्रष्टता से बचाते हैं और एक दूसरे की शांति आराम व सौन्दर्य का कारण बनते हैं, जिस प्रकार वस्त्र मनुष्य के शरीर को गर्म रखता है, उसी प्रकार पत्नी भी परिवार को उत्साहित रखती है और उसमें निराशा नहीं आने देती है तथा रोचक बात यह है कि ये भूमिका निभाने में पति और पत्नी दोनों पूर्ण रूप से एक समान हैं।इस आयत से मिलने वाले पाठः इस्लाम की एक विशेषता, आदेशों में सरलता है और जब भी कोई आदेश कठिन हुआ तो ईश्वर ने उसमें ढील दी है। ईश्वर के आदेशों का पालन न करना तथा पाप करना स्वयं अपने प्रति विश्वासघात और अत्याचार है क्योंकि उसका नुक़सान हमें ही होता है न कि ईश्वर को। इस्लाम, संसार और आनंदों को छोड़ देने का धर्म नहीं है बल्कि उसने उपासना के साथ ही उचित मानदंडों के अनुसार वैध आनंदों को जायज़ माना है। ये इस्लाम की व्यवस्था तथा मनुष्य के हर पहलू पर ध्यान दिये जाने की निशानी है। जब ईश्वर ने इच्छाओं की पूर्ति के लिए वैघ मार्ग रखे हैं तो फिर उनकी पूर्ति के लिए पाप करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।, पाप के समीप होते ही मनुष्य उसमें फंस जाता है अतः इस आयत में ईश्वर ने पाप करने से रोकने के स्थान पर पाप के समीप जाने से ही हमें रोका है। रोज़ा रखना या दांपत्य जीवन सभी ईश्वरीय आदेश पवित्रता के समीप जाने और पाप से दूर रहने की भावना उत्पन्न करने के लिए हैं।सूरए बक़रह की आयत संख्या १८८ इस प्रकार है।وَلَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ وَتُدْلُوا بِهَا إِلَى الْحُكَّامِ لِتَأْكُلُوا فَرِيقًا مِنْ أَمْوَالِ النَّاسِ بِالْإِثْمِ وَأَنْتُمْ تَعْلَمُونَ (188)और एक दूसरे का माल अपने बीच बेईमानी से न खाओ और उसे (घूस के रूप में) न्याय करने वाले अधिकारियों को न दो ताकि तुम लोगों के माल के एक भाग को पाप द्वारा खा सको जबकि तुम जानते हो (कि तुम अपराध कर रहे हो।) (2:188) यह आयत समाज की अर्थव्यवस्था में अन्याय और असुरक्षा के विस्तार का कारण बनने वाले दो बड़े पापों की ओर संकेत करते हुए, मुसलमानों को उनसे रोकती है। पहला दूसरों की संपत्ति पर अवैध अधिकार और दूसरा लोगों के माल पर अवैध अधिकार के लिए न्याय अधिकारी को घूस देना। पवित्र क़ुरआन इन दोनों को “बातिल” तथा “इस्म” के नाम से याद करता है अर्थात ऐसे कार्य जो बुद्धि के अनुसार भी अनुचित हैं और धर्म के अन्तर्गत भी पाप एवं वर्जित हैं। अलबत्ता कुछ लोग अपने कार्य का औचित्य दर्शाने के लिए घूस को उपहार का नाम देते हैं। एक बार एक व्यक्ति हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घर उपहार लेकर इसलिए आया कि वे न्यायालय में शायद उसके पक्ष में फ़ैसला करेंगे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि यदि पुरा संसार भी मुझे केवल इसलिए दे दिया जाए कि मैं एक चींटी के मुंह से जौ का छिलका, अवैध रूप से ले लूं तो मैं कदापि यह कार्य नहीं करूंगा। इस आयत से मिलने वाले पाठः इस्लाम लोगों की संपत्ति और स्वामित्व का सम्मान करता है और दूसरों के माल पर नियंत्रण की अनुमति नहीं देता। स्वामित्व सही, नैतिक व हलाल मार्ग द्वारा होना चाहिए। अवैध रूप से लोगों के माल पर अधिकार, चाहे वो न्यायाधीश के आदेशानुसार ही क्यों न हो, स्वामी नहीं बनाता। घूस लेना और देना दोनों ही हराम हैं। यह घूस, उपहार, मेहनताना या दक्षिया आदि चाहे कि भी नाम से दी जाए हराम है।सूरए बक़रह की आयत संख्या १८९ इस प्रकार है।يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَهِلَّةِ قُلْ هِيَ مَوَاقِيتُ لِلنَّاسِ وَالْحَجِّ وَلَيْسَ الْبِرُّ بِأَنْ تَأْتُوا الْبُيُوتَ مِنْ ظُهُورِهَا وَلَكِنَّ الْبِرَّ مَنِ اتَّقَى وَأْتُوا الْبُيُوتَ مِنْ أَبْوَابِهَا وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ (189)(हे पैग़म्बर) लोग आपसे नए महीनों के चांद के बारे में पूछते हैं, कह दीजिए कि वे इसलिए हैं कि लोग अपने कार्य और हज के समय को पहचान सकें और पिछवाड़े के घरों में प्रविष्ट होना अच्छाई नहीं है बल्कि भला कार्य तो उसका है जो ईश्वर से भयभीत रहता है और घरों में, उनके दरवाज़ों से प्रेवश करो और ईश्वर से डरते रहो कि शायद तुम्हें मोक्ष प्राप्त हो जाए। (2:189) इस्लाम की एक विशेषता यह है कि उसने अपने आदेशों को संभावित और सार्वजनिक मानदंडों के आधार पर निर्धारित किया है। उदाहरण स्वरूप नमाज़ के समय को सूर्योदय, सूर्यास्त या सूर्य के दोपहर के बाद ढलने के आधार पर निर्धारित किया है या रमज़ान के महीने में रोज़े का समय आने या हज का समय आने को चांद पर आधारित किया है जो एक प्राकृतिक और साथ ही सार्वजनिक कैलेण्डर है। अपने जीवन के कार्यों के लिए, मनुष्य को भी एक कैलेंडर तथा वर्ष के दिनों की तारीख़ों की आवश्यकता है, अतः नए महीने के चांद का उदय लोगों के सांसारिक मामलों के लिए एक कैलेंडर भी है और उनके धार्मिक मामलों के समय निर्धारण का एक साधन भी। हज के समय के उल्लेख के पश्चात यह आयत जिस दूसरे विषय का वर्णन करती है वह एक ग़लत कार्य है जो इस्लाम से पूर्व के अनेकेश्वरवादी किया करते थे। और वह यह था कि चूंकि वे इस हज के समय पहने जाने वाले वस्त्र “एहराम” को दिनचर्या के सभी कार्यो को छोड़ने की निशानी समझते थे अतः एहराम पहनने के पश्चात वे सामान्य मार्ग से घर में प्रवेश नहीं करते थे और इसे एक अच्छा कार्य समझते थे। पवित्र क़ुरआन उनके उत्तर में कहता है, ये सब फ़ालतू कार्य हैं, जो तुमने उपासना के एक कार्य में शामिल कर दिए हैं और यदि तुम भले बनना चाहते हो तो ईश्वर से भयभीत रहो और हर कार्य को उसके सही मार्ग से ही किया करो। जिस प्रकार तुम समय को समझने और हज का समय जानने के लिए चांद से लाभ उठाते ही, उसी प्रकार ईश्वरीय आदेशों के सही पालन के लिए धार्मिक नेताओं से संपर्क करो कि वे असत्य से सत्य को समझने के मार्ग पर तथा ईश्वरीय दया के द्वार हैं, तथा अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के पालन से बचो कि तुम्हारी भलाई और कल्याण इसी में है।इस आयत से मिलने वाले पाठः मनुष्य को अपनी आयु को समय के आधार पर संगठित करना चाहिए जैसाकि ईश्वर ने भी लोगों के उपासना संबन्धी मामलों को समयबद्ध किया है। भला कर्म वो है जिसका आदेश बुद्धि और धर्म दे, न यह कि हम पूर्वजों के संस्कारों के आधार पर ग़लत बातों को भी भले कर्म मानें।