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    सूरए बक़रह; आयतें 19-20 (कार्यक्रम 10)

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    सूरए बक़रह की 19वीं आयत इस प्रकार हैः-أَوْ كَصَيِّبٍ مِنَ السَّمَاءِ فِيهِ ظُلُمَاتٌ وَرَعْدٌ وَبَرْقٌ يَجْعَلُونَ أَصَابِعَهُمْ فِي آَذَانِهِمْ مِنَ الصَّوَاعِقِ حَذَرَ الْمَوْتِ وَاللَّهُ مُحِيطٌ بِالْكَافِرِينَ (19)या उनका उदाहरण उन लोगों जैसा है जो आकाश से हो रही तेज़ वर्षा, अंधकार तथा गरज व चमक में फंस गए हों या बिजली की कड़क के कारण मृत्यु के भय से अपने कानों में उंगलियां ठूंसे ले रहे हों हालांकि अल्लाह काफ़िरों को अपने घेरे में लिए हुए है। (2:19) १७वीं आयत में ईश्वर ने मिथ्याचारियों की उपमा, मार्ग भटक जाने वाले ऐसे लोगों से दी है जो अपना प्रकाश खो चुके हैं तथा अन्धकार में हाथ-पैर मार रहे हैं और उनकी वापसी का कोई मार्ग नहीं है। यह आयत कहती है कि मिथ्याचारी कीचड़ में फंसे उस व्यक्ति की भांति है जिसे मूसलाधार वर्षा, रात का अंधकार, कान फाड़ देने वाली बिजली की गरज, आखों को चकाचौंध कर देने वाली चमक तथा मृत्यु का भय घेरे में लिए हुए है किंतु उसके पास न वर्षा से बचने का कोई साधन है न ही अंधकार का मुक़ाबला करने के लिए कोई प्रकाश और न ही ख़तरनाक बिजली से बचने का कोई मार्ग।इस आयत से हमने यह सीखाः मिथ्याचारी सदा ही कठिनाइयों और समस्याओं में घिरे रहते हैं। इस संसार में भी वे सदैव ही परेशानी और घबराहट का शिकार रहते हैं। उनको सदा ही मौत का धड़का लगा रहता है तथा उनकी आत्मा को चैन नहीं मिलता। ईश्वर मिथ्याचारियों पर हावी है तथा उनके रहस्यों और षड्यंत्रों से पर्दा उठाता रहता है। मिथ्याचार का परिणाम कुफ़्र होता है क्योंकि इस आयत में कहा गया है कि ईश्वर, काफ़िरों को अपमान में ग्रस्त करता है। यह नहीं कहा गया है कि अल्लाह मिथ्याचारियों को अपमानित करता है। आकाश की वर्षा से मिथ्याचारियों को केवल बिजली की कड़क और चमक मिलती है। पवित्र क़ुरआन ईश्वर की दया और कृपा का कारण है जो मनुष्य पर उतारा गया है परन्तु मिथ्याचारी या मुनाफ़िक़ के लिए ख़तरे की घंटी है और अपमान का साधन।सूरए बक़रह की 20वीं आयत इस प्रकार हैः-يَكَادُ الْبَرْقُ يَخْطَفُ أَبْصَارَهُمْ كُلَّمَا أَضَاءَ لَهُمْ مَشَوْا فِيهِ وَإِذَا أَظْلَمَ عَلَيْهِمْ قَامُوا وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَذَهَبَ بِسَمْعِهِمْ وَأَبْصَارِهِمْ إِنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (20)शीघ्र ही बिजली की चमक उनकी आखों को चकाचौंध कर देगी। जब उस अंधकारमय मरुस्थल में बिजली चमकती है तो वे उसके प्रकाश में कुछ क़दम आगे बढ़ते हैं परन्तु जैसे ही अंधेरा हो जाता है वे ठहर जाते हैं और यदि अल्लाह चाहे तो उनकी देखने और सुनने की शक्ति समाप्त कर सकता है। निःसन्देह, वह हर चीज़ पर सक्षम है। (2:20) बिजली, उसकी चमक तथा वर्षा, धरती व धरती वासियों के लिए हर्ष व उल्लास की निशानी है परन्तु सबके लिए नहीं बल्कि केवल उन्हीं के लिए जो इस ईश्वरीय उपहार से लाभ उठाने के लिए तैयार हों किंतु राह भटके हुए एक अकेले यात्री के लिए इसका क्या लाभ है? यह मिथ्याचारियों का मार्गदर्शन नहीं कर सकते क्योंकि पहला प्रकाश अस्थाई तथा दूसरा, वर्षा होने का सुखद समाचार देता था जो मिथ्याचारियों और राह भटके हुए लोगों के लिए केवल एक मुसीबत ही थी। ईश्वर की वहि या संदेश आकाश की चकाचौंध कर देने वाली बिजली है जिसे देखने की शक्ति मिथ्याचारियों में नहीं है तथा वे उसके उपहार पैग़म्बर से प्राप्त करना नहीं चाहते। यद्यपि वे ईमान का दिखावा करके इस प्रकाश से लाठ उठाना चाहते हैं परन्तु यह बिजली उनके नेत्रों का प्रकाश छीनती है और सही रास्ता उनके लिए अंधकारमय हो जाता है। क़ुरआन उन्हें इस प्रकार अपमानित करता है कि वे ईमान वालों के साथ आगे न बढ़ने पर विवश हो जाते हैं अब न उनके पास आगे बढ़ने का मार्ग है न पीछे हटने का मोह, वे व्याकुल, परेशान तथा आश्चर्यचकित है। अलबत्ता ये सब ईश्वर तथा मोमिनों से मिथ्याचार के केवल सांसारिक परिणाम हैं और यदि ईश्वर उन्हें वास्तविक दंड दे तो न केवल वे आगे चल नहीं पाएंगे बल्कि उनकी देखने व सुनने की शक्ति भी समाप्त हो जाएगी।इस आयत से हमने जो कुछ सीखा वह यह हैः-मिथ्याचारी ईश्वर के प्रकाश को देखने की क्षमता नहीं रखते तथा ईश्वर का कथन बिजली की भांति उनकी आंखों को चकाचौंध कर देता है।मुनाफ़िक़ या मिथ्याचारी के पास स्वयं अपना कोई प्रकाश नहीं होता और वह ईमान वालों के प्रकाश की छाया में आगे बढ़ता है। यद्यपि मिथ्याचारी कभी-कभी कुछ क़दम आगे बढ़ जाता है परन्तु उसमें प्रगति नहीं होती और वह रुक जाता है।अपने दुष्कर्मों के कारण मिथ्याचारियों को कभी भी ईश्वरीय दंड का सामना करना पड़ सकता है। मिथ्याचारी ईश्वर को धोखा नहीं दे सकता और न उसके दंड से बच सकता है क्योंकि अल्लाह हर काम की क्षमता एवं शक्ति रखता है।