islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए बक़रह; आयतें 196-199 (कार्यक्रम 60)

    सूरए बक़रह; आयतें 196-199 (कार्यक्रम 60)

    सूरए बक़रह; आयतें 196-199 (कार्यक्रम 60)
    Rate this post

    सूरए बक़रह की आयत नंबर १९६ इस प्रकार है।وَأَتِمُّوا الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلَّهِ فَإِنْ أُحْصِرْتُمْ فَمَا اسْتَيْسَرَ مِنَ الْهَدْيِ وَلَا تَحْلِقُوا رُءُوسَكُمْ حَتَّى يَبْلُغَ الْهَدْيُ مَحِلَّهُ فَمَنْ كَانَ مِنْكُمْ مَرِيضًا أَوْ بِهِ أَذًى مِنْ رَأْسِهِ فَفِدْيَةٌ مِنْ صِيَامٍ أَوْ صَدَقَةٍ أَوْ نُسُكٍ فَإِذَا أَمِنْتُمْ فَمَنْ تَمَتَّعَ بِالْعُمْرَةِ إِلَى الْحَجِّ فَمَا اسْتَيْسَرَ مِنَ الْهَدْيِ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ فِي الْحَجِّ وَسَبْعَةٍ إِذَا رَجَعْتُمْ تِلْكَ عَشَرَةٌ كَامِلَةٌ ذَلِكَ لِمَنْ لَمْ يَكُنْ أَهْلُهُ حَاضِرِي الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ (196)हज और उमरे को ईश्वर के लिए पूर्ण करो और यदि तुम घेर लिए गए (तथा एहराम बांधने के बाद मक्के जाने में बाधा उत्पन्न कर दी गई। तो ईश्वर के समक्ष बलि के लिए जो कुछ उपलब्ध हो (उसे ज़िबह करो और एहराम उतार दो) और अपने बाल न मुंडवाओ यहां तक कि बलि अपने स्थान तक पहुंच जाए और (बलिदान के स्थान पर ज़िबह हो) परन्तु यदि कोई बीमार हो या उसके सिर में कोई पीड़ा (और वे अपने बालों को जल्दी मुंडवा ले) तो उसे रोज़े या सदक़े या क़ुरबानी (बलि) के रूप में फ़िदया अर्थात (प्रतिदान) देना चाहिए। और जब शांति हो तो जो कोई हज का समय आने तक उमरे से लाभ उठाए तो, वह जो भी बलि सुलभ हो (ज़िबह करे) और जिसे सुलभ न हो तो वह तीन दिन के रोज़े हज के दिनों में रखे और सात रोज़े तब रखे जब तुम वापस आ जाओ, ये पूरे दस हुए। ये आदेश उनके लिए हैं जिनका परिवार मस्जिदे हराम के निकट न रहता हो और ईश्वर से डरते रहो तथा जान लो कि ईश्वर कड़ी यातना देने वाला है। (2:196) जैसा कि आप जानते हैं कि हज के संस्थापक हज़रत इब्राहीम थे और उन्हीं के समय से अरबों के बीच ये संस्कार प्रचलित है। इस्लाम ने भी इसे मान्यता दी है अतः हर मुसलमान के लिए आवश्यक है कि आर्थिक संभावना होने की स्थिति में अपनी आयु में एक बार हज करने के लिए जाए। परन्तु उमरा, जिसका अर्थ है तीर्थ यात्रा, केवल उसी पर अनिवार्य है जो मक्के में प्रेवश करता है, उसे काबे के तवाफ़ अर्थात परिक्रमा और नमाज़ सहित कुछ संक्षिप्त कार्य करने पड़ते हैं। हज और उमरे के आदेश के पश्चात, चूंकि उपासना की इस यात्रा में संभावित रूप से कुछ लोगों को कठिनाइयां हो सकती हैं। इसलिए ये आयत कुछ आदेशों का वर्णन करती है ताकि ये स्पष्ट हो जाए कि ईश्वरीय कर्तव्य मनुष्य की शक्ति व क्षमता के अनुसार ही हैं और ईश्वर ने उसकी शक्ति से बढ़कर कभी कोई चीज़ नहीं चाही है।सूरए बक़रह की आयत संख्या १९७ इस प्रकार है।الْحَجُّ أَشْهُرٌ مَعْلُومَاتٌ فَمَنْ فَرَضَ فِيهِنَّ الْحَجَّ فَلَا رَفَثَ وَلَا فُسُوقَ وَلَا جِدَالَ فِي الْحَجِّ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ يَعْلَمْهُ اللَّهُ وَتَزَوَّدُوا فَإِنَّ خَيْرَ الزَّادِ التَّقْوَى وَاتَّقُونِ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ (197)हज के कुछ निर्धारित महीने हैं तो जिस किसी ने इसमें हज का निश्चय कर लिया वो जान ले कि हज में पत्नी के पास जाना, पाप या अवज्ञा करना तथा (अन्य लोगों से) लड़ाई झगड़ा वैध नहीं है और मार्ग सामग्री ले लो कि सबसे अच्छी मार्ग सामग्री ईश्वर का भय है, तो केवल मुझसे डरते रहो, हे बुद्धि वालो! (2:197) हज एक वर्ष में एक बार, वह भी निर्धारित समय में किया जाता है और जो भी हज के लिए जाए तो आरंभ से ही उसे पवित्रता को इस आध्यात्मिक यात्रा में अपनी मार्ग सामग्री बनाना चाहिए तथा भले कर्म करने चाहिए और पाप व लड़ाई झगड़े से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए।सूरए बक़रह की आयत संख्या १९८-१९९ इस प्रकार है।لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ فَإِذَا أَفَضْتُمْ مِنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِنْدَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ وَاذْكُرُوهُ كَمَا هَدَاكُمْ وَإِنْ كُنْتُمْ مِنْ قَبْلِهِ لَمِنَ الضَّالِّينَ (198) ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ وَاسْتَغْفِرُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (199)इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं है कि तुम अपने पालनहार से कृपा चाहो, तो जब अरफ़ात से चलो तो “मश्अरे हराम” में ईश्वर को याद करो। उसे याद करो कि इससे पूर्व तुम पथभ्रष्ट थे और उसने तुम्हारा मार्गदर्शन किया। (2:198) फिर जहां से लोग चलते हैं तुम (किसी ओर) चलो और ईश्वर से क्षमा चाहो, निःसन्देह वो अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (2:199) पिछली आयतों में आपने सुना कि हज में ऐसे हर कार्य से रोका गया था कि जो मुसलमानों की एकता और सुरक्षा को ख़तरे में डाल दे, परन्तु यह आयत जाहिलियत अर्थात अज्ञानता के काल के अरबों के विश्वास के विरुद्ध, जो आर्थिक लेन देन को हज में पाप समझते थे, कहती है कि आर्थिक लेन देन जो इस महान कार्यक्रम से जुड़े हुए हैं, न केवल यह कि वैध है बल्कि आवश्यक भी हैं। इसके पश्चात, आयत हज के एक अन्य आदेश, अरफ़ात से मशअर की ओर चलने का वर्णन करते हुए कहती है कि प्रथम तो यह कि इस मार्ग में सदैव ही ईश्वर को याद करते रहो कि किस प्रकार उसने तुम्हें पथभ्रष्टता से मुक्ति दिलाकर सत्य की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन किया और दूसरे गुट के रूप में और लोगों के साथ मिलकर आगे बढ़ो तथा स्वयं के लिए कोई विशिष्टता न चाहो।इन आयतों से मिलने वाले पाठः इस्लाम में कोई बंद गली नहीं है। इस्लाम विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार और उनके अनुकूल आदेश देता है। जो व्यक्ति हज को जारी रखने में अक्षम है वो उसके स्थान पर रोज़ा रख सकता है या सदक़ा दे सकता है अर्थात दान कर सकता है या एक भेड़ को ज़िबह करके दरिद्रों को खाना खिला सकता है। मक्के की धरती सुरक्षा एकता व उपासना का केन्द्र है अतः हज के दिनों में इस केन्द्र को हर प्रकार के लड़ाई झगड़े, पाप या यौन संबन्धों से दूर रहना चाहिए ताकि ईश्वर के सामिप्य की भूमि समतल हो सके। इस्लाम एक व्यापक धर्म है और उसने हज सरीखी उपासनाओं के साथ ही लोगों के भौतिक जीवन तथा आय प्राप्ति पर भी ध्यान दिया है। यात्रा में भौतिक नेमतों से लाभ उठाना चाहिए परन्तु ईश्वर की याद की ओर से निश्चेत नहीं होना चाहिए। हज में लोगों के पदों या उनकी विशेषताओं को अलग रखना चाहिए तथा सबको मिलकर और एक दूसरे के समान, हज को पूरा करना चाहिए। {