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    सूरए बक़रह; आयतें 211-214 (कार्यक्रम 63)

    सूरए बक़रह; आयतें 211-214 (कार्यक्रम 63)
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    सूरए बक़रह की आयत नंबर २११ इस प्रकार है।سَلْ بَنِي إِسْرَائِيلَ كَمْ آَتَيْنَاهُمْ مِنْ آَيَةٍ بَيِّنَةٍ وَمَنْ يُبَدِّلْ نِعْمَةَ اللَّهِ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَتْهُ فَإِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ (211)(हे पैग़म्बर!) बनी इस्राईल से पूछिए कि हमने उन्हें कितनी खुली हुई निशानियां दीं (और उनसे कह दीजिए कि) जो ईश्वर की विभूति को उसे पाने के पश्चात बदल डाले तो निःसन्देह, ईश्वर कड़ा दण्ड देने वाला है। (2:211) इतिहास सबसे अच्छा शिक्षास्रोत है। ईश्वर ने बनी इस्राईल को अनेक भौतिक व आध्यात्मिक विभूतियां प्रदान कीं, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जैसा पैग़म्बर दिया जिसने उन्हें फ़िरऔन के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई, उनके सांसारिक जीवन के लिए ईश्वर ने उन्हें अच्छी संभावनाएं प्रदान कीं परन्तु उन्होंने ईश्वरीय संभावनाओं को पाप, अत्याचार व ग़लत मार्गों में प्रयोग किया। ईश्वर के स्थान पर बछड़े की उपासना आरंभ की और हज़रत मूसा के स्थान पर “सामेरी” जादूगर से जा मिले। परिणाम स्वरूप उन्हें ईश्वरीय क्रोध व कोप का पात्र बनना पड़ा और उन्होंने इसी संसार में अन्धकारमय भविष्य स्वयं के लिए ख़रीद लिया। आज के संसार में भी यद्यपि मनुष्य को उद्योग के क्षेत्र में अनेक विभूतियां व संभावनाएं प्राप्त हैं परन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि ईश्वरीय शिक्षाओं से दूरी के कारण वो उन्हें पाप, अत्याचार तथा समाज की तबाही के मार्ग में प्रयोग कर रहा है।सूरए बक़रह की २१२वीं आयत इस प्रकार है।زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَيَسْخَرُونَ مِنَ الَّذِينَ آَمَنُوا وَالَّذِينَ اتَّقَوْا فَوْقَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَاللَّهُ يَرْزُقُ مَنْ يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ (212)सांसारिक जीवन काफ़िरों के लिए अत्यन्त शोभनीय बना दिया गया है, इसी कारण वे ईमान वालों का परिहास करते हैं, जबकि प्रलय के दिन, ईश्वर का भय रखने वाले उनसे ऊपर होंगे और ईश्वर जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है। (2:212) संसार की तड़क भड़क ने काफ़िरों की आंखों में इस प्रकार चकाचौंध मचा दी है कि वे घमण्डी हो गए हैं और वे ईमान वालों का, जो इन बातों पर ध्यान नहीं देते, मूर्ख कह कर परिहास करते हैं जबकि मनुष्य की वरीयता और श्रेष्ठता का मानदंड सांसारिक संपत्ति व पद नहीं है बल्कि ईश्वर से भय और ईमान जैसी आध्यात्मिक व ईश्वरीय मान्यताएं हैं, जिनके महत्व का प्रलय में पता चलेगा।सूरए बक़रह की आयत संख्या २१३ इस प्रकार है।كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنْذِرِينَ وَأَنْزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ وَمَا اخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا الَّذِينَ أُوتُوهُ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ فَهَدَى اللَّهُ الَّذِينَ آَمَنُوا لِمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِهِ وَاللَّهُ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (213)(सारे) लोग (आरंभ में) एक ही समुदाय थे। (उनके बीच कोई मतभेद नहीं था, फिर धीरे-२ विभिन्न समाज बने और उनके बीच मतभेद उत्पन्न होने लगे) तो ईश्वर ने पैग़म्बरों को भेजा जो शुभ सूचना देने तथा डराने वाले थे और उनके साथ, सत्य के आधार पर आसमानी किताब उतारी ताकि वह लोगों के बीच, जिन बातों के बारे में उनमें मतभेद हैं, फ़ैसला करे, (मोमिनों ने किताब की सत्यता में शक नहीं किया) और केवल उन लोगों (के एक गुट) ने जिन पर यह उतारी गई थी, एक दूसरे पर अत्याचार करने के लिए इसमें मतभेद किया जबकि उनके पास खुली निशानियां आ चुकी थीं तो ईश्वर ने अपनी आज्ञा से, उन लोगों को जो ईमान ला चुके थे, उस सत्य का मार्गदर्शन कर दिया जिसमें लोगों ने मतभेद किया था (और ईमान न लाने वाले अपने मतभेद और पथभ्रष्टता में बाक़ी रहे) और ईश्वर जिसे चाहता है, सीधा मार्ग दिखा देता है। (2:213) यह आयत मानव समाजों की व्यवस्था चलाने में धर्म तथा ईश्वरीय क़ानूनों की महत्वपूर्ण भूमिका की ओर संकेत करते हुए कहती है, आरंभ में मनुष्य का जीवन बहुत सादा व सीमित था, परन्तु जैसे-जैसे लोगों की संख्या बढ़ती गई और विभिन्न समाज सामने आते गए वैसे-वैसे स्वाभाविक रूप से उनके बीच मतभेद उत्पन्न होने लगे और क़ानून तथा शासक की आवश्यकता स्पष्ट होती गई। यहीं पर पैग़म्बरों को ईश्वर की ओर से लोगों के कल्याण व मार्गदर्शन के लिए नियुक्त किया गया और उन्होंने आसमानी किताबों के आधार पर लोगों के बीच न्याय व शासन किया। यद्यपि उन्होंने समाजों में स्थिरता व सुरक्षा उत्पन्न करने का अथक प्रयास किया परन्तु कुछ लोग आंतरिक इच्छाओं, ईर्ष्या तथा हथधर्मी के कारण सत्य को स्वीकार करने पर तैयार नहीं हुए। इस बीच केवल मोमिन ही ईश्वर, पैग़म्बरों तथा आसमानी किताबों पर ईमान की छाया में एकता और शांति प्राप्त कर पाते हैं तथा सत्य और मार्गदर्शन की ओर बढ़ते हैं परन्तु काफ़िर अपने भौतिक मतभेदों में ही फंसे रहते हैं जो उनकी पथभ्रष्टता का कारण है। सूरए बक़रह की आयत संख्या २१४ इस प्रकार है।أَمْ حَسِبْتُمْ أَنْ تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُمْ مَثَلُ الَّذِينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلِكُمْ مَسَّتْهُمُ الْبَأْسَاءُ وَالضَّرَّاءُ وَزُلْزِلُوا حَتَّى يَقُولَ الرَّسُولُ وَالَّذِينَ آَمَنُوا مَعَهُ مَتَى نَصْرُ اللَّهِ أَلَا إِنَّ نَصْرَ اللَّهِ قَرِيبٌ (214)क्या तुम यह सोचते हो कि तुम स्वर्ग में प्रवेश कर जाओगे जबकि अभी तो तुम लोगों के साथ वैसी घटनाएं हुई ही नहीं हैं जो तुमसे पहले वालों के साथ हुई थीं। तंगी और कठिनाइयों ने उन्हें घेरे रखा और उन्हें बेचैन किया तथा झिंझोड़ा जाता रहा यहां तक कि पैग़म्बर और उनके साथ के मोमिन पुकार उठे कि ईश्वर की सहायता (कब आएगी)? जान लो कि ईश्वर की सहायता निकट ही है। (2:214) पिछली आयत में मार्गदर्शन व कल्याण की प्राप्ति तथा मतभेदों से दूरी में ईश्वर पर ईमान की भूमिका के वर्णन के पश्चात यह आयत कहती है कि केवल दिल से ईमान रखना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि व्यवहार में भी कटु व संकटमयी घटनाओं के समक्ष ईश्वर पर भरोसा करते हुए अपने ईमान की सुरक्षा करनी चाहिए और जीवन के उतार-चढ़ाव में ईश्वर के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए क्योंकि सारी घटनाएं और कठिनाइयां, परीक्षाए हैं और लोगों के ईमान को आंकने का साधन।इन आयतों से मिलने वाले पाठः संसार के प्रेम व मोह, मनुष्य के घमण्ड व दूसरों के परिहास का काण है जबकि ईश्वर का प्रेम व भय लोक व परलोक में मुक्ति व कल्याण तथा ईश्वर की असीम कृपा की प्राप्ति का कारण है। समाज को क़ानून व शासक की आवश्यकता होती है और बेहतरीन क़ानून आसमानी किताबों तथा सबसे अच्छे शासक ईश्वरीय पैग़म्बर और धार्मिक नेता हैं। विभिन्न पारिवारिक व सामाजिक मामलों में मतभेद समाप्त करने का सबसे अच्छा मार्ग, ईश्वरीय क़ानूनों के समक्ष सिर झुकाना है। बिना कठिनाई उठाए स्वर्ग में जाने की आशा रखना अनुचित आशा है। सभी मनुष्यों के लिए परीक्षा एक अटल ईश्वरीय परंपरा है ताकि हर कोई अपने वास्तविक मूल्य को समझ सके और उसे दर्शा सके।